आज फिर चार बजे बाहर गैलरी में बनी खिड़की के पास कुर्सी बिछाकर बैठ गई। यह क्रम पिछले दो साल से अनवरत चल रहा। करूँ भी तो क्या? सुबह के काम की भागदौड़ और दोपहर दो घंटे आराम करने के बाद रात को पति के दुकान से वापस आने तक करने को कुछ खास तो होता नही। रात को दो लोगों का खाना बनाने में समय ही कितना लगता। फ्लैट तीसरी मंजिल पर होने के कारण घुटने के दर्द की वजह से नीचे उतरने को मन ही नही होता।

बाहर बालकनी से सामने का पार्क का नजारा साफ दिखाई देता था। वहाँ खेलते बच्चों को देख अभिनय और नीति के बचपन की स्मृतियाँ जीवंत हो जाती थी। नीति दो साल पहले ब्याह कर अपने पति के साथ आस्ट्रेलिया चली गई थी। और अभिनय तो पिछले चार सालों से ही उच्च शिक्षा के लिए जिद्द कर न्यूजीलैंड चला गया था। बहुत समझाया हम दोनों ने कि इकलौता बेटा है , तू भी दूर चला जाएगा , तो हमारे पास कौन होगा ? नीति तो ब्याह कर अपने घर चली जाएगी, पर कहाँ सुनते आजकल के बच्चे?

पतिदेव तो सारा दिन दुकान पर व्यस्त रहते। रात को थके हारे घर आते, तो बस खाना और फिर बिस्तर। वैसे भी कहाँ बातचीत करना पसंद उन्हें ज्यादा? मैंने सारा दिन क्या किया, कुछ खाया- पीया या नही, या मेरे दुख तकलीफ से उन्हें शुरू से ही कोई वास्ता नही था। खैर अब इस बात की आदत पड़ गई है और कोई शिकायत भी नही। करने का फायदा भी क्या।

काम वाली बाई सरला पाँच बजे आकर बर्तन कर जाती और मेरे साथ चाय का एक कप पीकर चली जाती और मैं उसके बाद भी आठ बजे तक वही खिड़की में बैठी रहती। सरला का पति शामलाल किसी दफ्तर मेम चपड़ासी लगा हुआ था, तो रोज वापसी पर सरला को हमारे यहाँ से आवाज लगा कर साइकिल पर पीछे बिठाकर ले जाता। दोनों खिलखिलाते, बातें करते जब सामने से निकलते तो मन में एक हल्की सी ईर्ष्या की भावना भी उत्पन्न होती।

आज साढ़े पाँच बजने को थे, पर सरला का पति अब तक उसे लेने नही आया था। वह भी मेरे साथ खिड़की पर बैठ उसके आवाज लगाने का इंतजार कर रही थी। हँसते हुए खुद ही कहने लगी,” बीबी जी मैं भी कितनी भुलक्कड़ हूँ। आज तो उस छिनाल गीता का जन्मदिन है। उसी के पास गए होंगे।”

” गीता कौन?”

“मेरी सौत, और कौन? वैसे तो सप्ताह में तीन रात उसके पास रुकने की बात मानी हूँ मैं, पर आज तो उसका जन्मदिन है, तो आज तो उसका हक बनता ही है ना? सही बोल रही न बीबी जी?”

” क्या तुम्हारे पति ने दूसरी शादी कर ली?”

” हाँ बीबी जी शादी को छह बरस हो गए और मैं कलमुँही उसे तीन बेटियाँ ही दे सकी। अब तीनों आपरेसन से हुई हैं , तो डाकटर बाबू भी बोल दिए कि चौथा बच्चा न हो सकेगा। अब वंस चलाने को छोरा तो चाहिए ना। तो पिछले महीने दूसरी सादी कर ली मेरे खसम ने। वैसे मुझे कोई परेसानी नही। अलग खोली ले दी है उसे। हफते में तीन रात ही रुके है वहाँ। पर आज तो उस छिनाल का जन्मदिन है। चलो कोई बात नही , मैं जाती खुद ही। राम राम!!”

सरला यह सब कह बड़े आराम से हँसते हुए चली गई और मैं उसे खिड़की से जाते देखती रही दूर तक। बस यही समझ नही पाई कि मजबूर कौन ज्यादा है? खिड़की के इस तरफ बैठी मैं या वो आजाद है जो अपनी खिड़की से बाहर?