हमारे समाज में नग्नता पर खूब बहस होती है। इसे न सिर्फ औरतों पर आरोपित कर दिया गया बल्कि भारतीय संस्कृति से भी जोड़ दिया गया है। पुरुष कैसे भी घूमे कोई दिक्कत नहीं मगर स्त्रियों को पुरुष सत्तात्मक समाज के बनाए एक खास ड्रेस कोड के भीतर ही रहना है।

यदि उनकी मर्जी से या किसी अन्य वजह से उनका शरीर दिख जाता है तो उसे संस्कृति या सामाजिक मर्यादा के खिलाफ मान लिया जाता है। सदियों से इसे स्वीकार करने के कारण भले हमें यह सहज लगता हो मगर हकीकत में यह बहुत ही घुटन भरा है। जरा सोचें यदि किसी पुरुष से कहा जाए कि वह सर से पांव तक खुद को ढककर रहे, यदि वह ऐसा न करे तो उसके साथ बदतमीजी की जाए, अपशब्द कहें जाएं या उस पर शारीरिक हमला किया जाए तो कैसा लगेगा?

इससे भी हास्यास्पद बात यह है कि जिस भारतीय संस्कृति की हम बात करते हैं उसी प्राचीन भारत में स्त्रियों को टॉपलेस घूमने की आजादी थी। यह हमारी सांस्कृतिक गरिमा थी कि इसे सहज भाव से स्वीकार किया जाता था। यह बकायादा एक ऐतिहासिक दस्तावेज है। तीन सौ से दो सौ ईसा पूर्व तक भारतीय स्त्रियां कपड़ों के मामले में पश्चिम से भी ज्यादा खुली हुई थीं। इस काल की मूर्तियों देखकर पता लगता है कि उस दौरान स्त्रियों के वक्ष आम तौर पर खुले होते थे और वे कमर में, हाथों में और गले में आभूषण पहनती थी। कमर के नीचे का हिस्सा भी नाममात्र को ढका मिलता है।

हमारी मूर्ति कलाओं में देवी से लेकर आम स्त्रियों को टॉपलेस दिखाया गया है। इस बारे में एक लेख का अंश दे रहा हूं। केआर श्रीनिवास बैंगलोर मिरर में लिखते हैं- Women walked around the streets topless and men accepted it as the norm. There were no untoward incidents. It was not until the Victorian era, when the British came to India that women were actually made to cover themselves up with blouse pieces. Blouses are actually a very Victorian concept. The British are the ones who made our women wear the cholis.So, are the Sri Rama Sene asking us to follow the Victorian tradition and deviate completely from the Indian tradition?

अब अगर कोई वास्तव में हिन्दू संस्कृति को लाना चाहते है तो हमारी स्त्रियों को इतनी आजादी तो दो कि वे भले ही टॉपलेस न हों मगर बिना दुपट्टे के या अपनी पसंद के चुस्त परिधान या (तथाकथित) छोटे, पारदर्शी, अंग दिखाने वाले आदि आदि आदि पहनकर निकलें तो बदतमीज आंखों और संस्कारविहीन जुमलों से उनका मन घायल न हो। मैं एक कदम आगे जाकर कहता हूं कि वह निगाह वापस लाओ…

जब मैंने यह बात फेसबुक पर लिखी तो हमारे बहुत से भारतीय संस्कृति का झंडा लेकर चलने वाले पुरातनपंथी लोगों को यह बात हजम नहीं हई कि प्राचीन भारतीय संस्कृति के बारे में कोई इतनी प्रमाणिकता से कैसे कह सकता है। मुझे अपमानित करने के लिहाज से किसी ने चिढ़कर मेरे इनबाक्स में लिखा कि क्या आजादी के नाम पर अपनी बहन को भी टापलेस घूमने की इजाजत दोगे? मैंने इस बात का जवाब उन सज्जन को देने की बजाय सार्वजनिक रूप से यह कहकर दिया कि मेरे विचारों में कोई दोगलापन नहीं है।

मैंने बताया मेरी कॉलेज जाने की उम्र में एक बहन है, और मैं दावे से कहता हूं कि वह क्या वस्त्र पहन रही है इससे मैं उसके आचार-व्यवहार का मूल्यांकन नहीं करता। मैं उसे निर्भीक, साहसी, प्रखर, विचारवान, भारतीय मूल्यों को समझने वाली जिम्मेदार नागरिक महिला बनाना चाहता हूं। वस्त्रों का चयन उसका अपना है। लोग अपने घर की स्त्रियों को अपनी प्रापर्टी समझते हैं। मैं यह समझ साफ करना चाहता हूं। जैसे इस समाज में बाकी लड़कियां हैं वैसे ही मेरी बहन है। वह समझदार है, मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह छोटे कपड़े पहने या अपना शरीर ढककर रखे। मेरे लिए हमेशा उसके प्रति एक ही भाव रहेगा।

मुझ पर बड़ा भार यह है कि मैं एक ऐसे समाज में उसको जीने दूं जहां उसकी आजादी को इज्जत और सम्मान मिले। कुछ असामाजिक लोगों का बात-बात आपके परिवार की स्त्रियों को घसीने का जो धमकी भरा अंदाज है उसे अब इग्नोर किया जाए। ये हमारी बेटियां हैं हम उनके फतवे से उनके जीने की शर्तें नहीं तय कर सकते। उन सज्जन से मैं यह भी कहना चाहता हूं कि जब आप काली मां या पुरानी मूर्तियों को देखते हैं तो क्या आपका सर श्रद्धा से नहीं झुकता। क्या यदि सचमुच प्राचीन काल में टॉपलेस का चलन था तो उस दौर की स्त्रियां किसी की मां या बहनें नहीं थीं। वे हमारे ही पुरखे रहे होंगे।

मेरे पास कुछ टिप्पणियां आईं जहां वस्त्र को स्त्री के सम्मान से जोड़कर देखा गया। मैंने इस बात से असहमति जताई और कहा कि स्त्री के अपमान के लिए एक निगाह ही काफी है। यहीं समझने की जरूरत है। पुरुषसत्तात्मक समाज ने खुद से स्र्त्री के मान और अपमान के मानक गढ़ दिए। हमारी देवियों को देखें- काली टॉपलेस हैं वे स्त्री का रौद्र और संहारकारी रूप हैं, मौर्यकालीन स्थापत्य में देवी पार्वती शिव के साथ टॉपलेस हैं और बहुत से चित्रों में ज्ञान की देवी सरस्वती भी।

यह पुरुण का संकीर्ण मानसिकता है कि वह स्त्री को एक सेक्स आब्जेक्ट के रूप में देखता है। वक्ष स्त्रित्व की गरिमा है। उसमें पोषण, ऊर्जा, प्रेम सबकुछ है- क्या यह गरिमामय शारीरिक अंग शर्म की चीज है। हम मजबूत भुजाओं की बात करते हैं, कंधों पर दुनिया के भार की बात करते हैं, मां का दूध पीकर बड़े होने की बात करते हैं तो अचानक स्त्री शरीर के प्रति इतने संवेदनशील कैसे हो जाते हैं कि लड़कियां उसे लेकर शर्म महसूस करें- नहीं यह उनकी गरिमा है- यह हमारी गरिमा है।

दुख की बात है कि खुद को सभ्य कहे जाने के बावजूद बहुत से मुद्दों पर हम या तो बात ही नहीं करते या चुप्पी साध जाते हैं। सोशल मीडिया पर न जाने कितना अनर्गल प्रलाप होता है। मेरी जिद है कि मैं भारतीय सभ्यता को ठेकेदारों के हवाले करने की बजाय आंख-कान खोलकर स्वीकार करना चाहता हूं।

One comment

पर्दे में नहीं टॉपलेस रहा करती थीं प्राचीन भारत में स्त्रियां

  1. पहले की बात कुछ और थी वक़्त के हिसाब से जब इंसान बदलता है तो कुछ सभ्यताए भी बदल जाती है , हां ये बात भी सही की पहले अच्छे इंसान ज्यादा थे और आज बुरे इंसान । अगर किसी महिला को ये ही कहा जाता की सरीर ढक कर रखो तो क्या गलत इससे उनकी इज़्ज़त कायम है तो क्या गलत ।और धीरे धीरे ही तो ये बात कही गयी समाज को देख कर हमारे पूर्वज ऐसे तो नही थे न हम जो महिलाओं से कोई निजी दुश्मनी । अब अच्छे सुझाव उन्हें बंदिश लगता है तो सौख से रहे जैसे रहना ।

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