सिमोन ने ही नहीं महादेवी वर्मा ने भी दबे स्वर मे यह बात कही है कि हमारे समाज की आंतरिक बनावट जिस तरह की रही है ,वहाँ स्त्री-पुरुष के बीच परस्पर प्रेम नहीं हो पाता।वह और जो कुछ हो जाए.. परम्परा-संस्कृति के नाम पर त्याग या बलिदान हो जाए. वामपंथी/मार्क्सवादी के यहाँ शोषक-शोषित हो जाए… प्रेम-सम्बन्धों मे कभी दोनों ही एक दूसरे के लिए ग्रंथियां बन जाते हैं और मनोवैज्ञानिक ग्रंथियों की गठान भी खोलते हैं.

ऐसा बहुत कम होता है या नहीं के बराबर होता है कि ऐसे सम्बन्धों मे एक रचनात्मक -परस्परता निर्मित हो जाए.भिन्न होकर भी..अपनी-अपनी विशिष्टताओं के साथ भी एक बराबरी का धरातल..एक सहज-संवाद की ज़मीन निर्मित हो सके।हमारी परंपरा मे तो स्त्री-पुरुष के बीच एक अच्छी दोस्ती की अवधारणा भी नहीं मिलती।कृष्ण-द्रौपदी के अतिरिक्त कहीं ध्यान नहीं जाता.कृष्ण और द्रौपदी के इस दोस्ताने को भी हमने कितनी गंभीरता से लिया है?महाभारत काल के श्वेतकेतु और उनकी पत्नी सुवर्चला ने अपने दांपत्य-संबंध मे इस तरह की धरातल की कल्पना की लेकिन वहाँ भी ढाँचा विवाह की एक विशेष तरह की परिधि और नैतिकता मे ही दिखाई पड़ता है.

हमारे लेखकों ने विशेष रूप से कवियों ने प्रेम और स्त्री-संबंधो पर खूब कवितायें लिखी हैं.वे अच्छी,संवेदनशील,भावुक और बड़े दायरे की भी रहीं हैं लेकिन परस्परता नहीं मिल पाती.प्रेमिका या पत्नी के प्रति जो सम्मान-भाव दिखता है वह भी सहानुभूति या पश्चाताप या महान दिव्य भाव और ज़्यादातर दैहिक ऐंद्रियता के सतही रूप मे बदल जाता है।यह भी कहना ज़रूरी है कि अनेक बड़े और महत्वपूर्ण कवियों के यहाँ भी प्रेमिका और पत्नी की तुलना है ।दोनों के प्रति महान भाव या पश्चाताप भाव या उपेक्षित भाव दिखाकर खुद को बरी कर एक कलाकार के खोल मे भाग जाने का रवैया ही रहा है.
सत्तर के दशक के कवियों मे भी प्रेम का एक रोमानी भाव ही ज़्यादा दिखाई देता है.

इन कवियों मे राजेश जोशी अकेले ऐसे कवि हैं जिनके यहाँ प्रेम की ऐसी रोमानियत कम है…और है भी तो इस संकोच के साथ कि ऐसी कविताएं खोजनी मुश्किल।इस संकोच ने उन्हे आपातकाल के बाद के लोकतन्त्र और राजनीति के बेहतरीन कवि के रूप मे स्थापित कर दिया है.यहाँ तक कि राजनीतिक नारों के रूप मे उनकी कवितायें खूब चली हैं..हालांकि उनके समकालीन स्त्री-पुरुष सम्बन्धों पर भी लिखते रहे.।प्रेम पर लिखते रहे..प्रशंसा पाते रहे.राजेश जोशी की ऐसी कवितायें कोड नहीं की गईं हैं.ऐसे मे राजेश जोशी की टाइप कविताओं से इतर दूसरी कविताओं की खोज करनी चाहिए।सम्बन्धों मे जिस दोस्तानेपन की ज़रूरत की बात हो रही थी,राजेश जोशी की यह कविता रेखांकित की जानी चाहिए,जबकि इसके शीर्षक मे राजेश जोशी का वही संकोच और अर्थ की गहराई है.—

शहद जब पकेगा/राजेश जोशी

लंबी उँगलियों वाला धूप है तुम्हारा प्यार
तुम छुट्टी ले लो कुछ दिन
और धूप से बोलो
एवज़ मे ऑफिस हो आए
टाइपराइटर पर बैठ जाए कुछ दिन

कमरे मे चहकती हुई चिड़िया है तुम्हारा प्यार
तुम छुट्टी ले लो कुछ दिन
और चिड़िया से बोलो
एवज़ मे ऑफिस चली जाए
रजिस्टर मे दर्ज़ कर आए
चिट्ठी-पत्री
संतरे का पेड़ है तुम्हारा प्यार
बोलो उससे कुछ दिन
कर आए मेरी एवज़ मे
मेरे ऑफिस का काम
अभी तो दूर है संतरों का मौसम
कई दिन हैं अभी पगार मिलने मे
और ठीक-ठाक करना है सारा घर
जुटाना है काम की कितनी सारी
छोटी-मोटी चीज़ें
एक पगार मे थोड़े न जुट जाएगा सारा सामान

शहद का छ्त्ता है तुम्हारा प्यार
हल्की-हल्की आंच के धुएँ मे
जिसे पकाएंगे हम
तुम छुट्टी ले लो कुछ दिन
और सात-साथ बाज़ार कर लो
मधुमक्खियों से बोलो

निपटा लेंगी घर का कामकाज
और शहद भी पक जाएगा तब तक

बजाज तो क्या देगा उधार!
पर हो सकता है एक काम
अपन कपास के पेड़ को ही पटा लें
उसकी धौंस-डपट से चल जाएगा काम
सीधे मिल से ही मिल जाएगा कपड़ा

अपन सिलाएंगे एक-एक नया जोड़ा
और नए जोड़े पहनकर इतराएंगे
कौन रोज़-रोज़ आता है यह दिन!

दर्ज़ी तो पटेगा क्या!
उधार करे जिस-तिस से तो चल ज्ञ धंधा
चल गया घर
सुई से करेंगे बातचीत
और तागे को बता देंगे जेब
सेमल का एक पेड़ है मेरा दोस्त
अभी नहीं आया तो कब आएगा काम?
बोलेंगे उससे भर दे एक तकिया
एक गद्दा ,एक रज़ाई

अभी दूर हैं वे दिन
जब ज़रूरत होगी हमे
अलग-अलग रज़ाई की
जब पृथ्वी हो जाएगा तुम्हारा पेट
जब आकाश के कान मे फुसफुसाएगी पृथ्वी
जब वृक्ष से आँख चुरा, चुराओगी तुम
मिट्टी
जब पहाड़ों की आड़ से
एक टुकड़ा आकाश चुरा लाओगी
तुम
अभी दिन हैं, अभी तारे गिनना हैं कई सारे
अनंत तक फैली ,बादलों को छूती
हरी-हरी घास है तुम्हारा प्यार
तुम छुट्टी ले लो कुछ दिन
और चलो घास मे लुक-छिप जाएँ अपन .

वंदना चौबे का वाराणसी के एक कालेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से शिक्षा हासिल की है। वे कविताएं और विचारोत्तेजक लेख लिखती रही हैं। उनका यह लेख बताता है कि आधुनिक समाज में स्त्री-पुरुष के बीच पनपने वाले प्रेम में भी बराबरी का भाव होने की बजाय एक किस्म का आंडबर दिखता है। उन्होंने साहित्य में भी इसी प्रवृति को रेखांकित किया है।