एक भाभी जब गर्भवती हुई, तब पूरे गर्भकाल आठवे महीने तक तैराकी, साइक्लिंग, ट्रेकिंग पर जाना करती थी । जब भतीजी पैदा हुई तो दर्द हुआ केवल 10 मिनट और डॉक्टर तक पहुंचने से पहले ही पैदा हो गयी, नाल बाद में कटवाने पहुंचे । मैंने कई कहानियों में पढ़ा है कि औरतों ने खुद ही नाल काटी , गांव में कई बार नित्य क्रिया करने खेत गयी बच्चा हो गया।

जैसे जैसे सिजेरियन का चलन बढ़ता जा रहा है, उतना डॉक्टर श्रम करने को प्रोत्साहित नही करते, दवाइयां लिखते हैं, क्योकि इसमें उनका फायदा है । धीरे धीरे हम भी आदि हो गए हैं कि गर्भावस्था में ख्याल का मतलब बिस्तर है। बच्चा पैदा होने बाद जो देसी चीज़े खिलाई जाती जैसे हरीरा, हल्दी-जीरा लड्डू, बिस्वार आदि से हम दूर हो गए क्योंकि ऑपरेशन के बाद अधिकतर डॉक्टर यह सब खाने को मना करती हैं और इससे शरीर वीक हो जाता है, अनीमिया और अर्थराइटिस के चांसेज ऑपरेशन के बाद बढ़ जाते हैं। कितनी औरतों को खुद का प्रचुर मात्रा में दूध नही आता, फिर हम खरीदते हैं लैक्टोजन।

जब आप स्त्री रूप में जन्म लेते हो, तो आपको कई मानसिक, शारीरिक व सामाजिक चुनौतियाँ मिलती हैं और ये चुनौतियाँ तब और भी सघन हो जाती हैं जब आप भारत जैसे विकासशील देश में पैदा होते हैं जो स्त्री स्वास्थ्य के मामले में विकासशील देशों मे भी सबसे नीचे है, नाइजीरिया भी हमसे बेहतर हैं। पिछले दिनों सिजेरियन प्रसव पर कुछ लिखा था जिसमें सी सेक्शन का प्रमुख कारण बढ़ता बाजारवाद मैंने बताया था। इस से आगे नहीं थोड़ा पीछे चलते हैं।

जब हम स्त्रियॉं की खस्ताहालत पर मंथन शुरू करते हैं तो पाते हैं कि इसके पीछे सामाजिक रूढ़ियाँ बड़ा कारण है। जब लड़की पैदा होती है तभी से उसको बोझ मानने की प्रवृत्ति इस कदर हावी है कि उसको अच्छे न्यूट्रिशन की आवश्यकता है, इस पर ध्यान ही नहीं दिया जाता । इसका गरीबी प्रमुख कारण हैं और उससे भी ज्यादा जागरूकता की कमी।

स्त्री जब अपने मेनार्क पर पहुँचती है तब कई बदलाव होना शुरू होते हैं उनमें से महावारी भी एक है। एक अच्छा प्रतिशत ब्लड वो हर माह खोती है, इसकी भरपाई नहीं की जाती और उसमें कई छिपी हुई बीमारियाँ पनपना शुरू होती है। बीमारी को ले कर भी हमारे यहाँ एक रूढ़ि है कि बीमारी वही मानी जाती है जो दिखे, जैसे बुखार-चेचक वगैरह । किसी भी विटामिन-तत्व की कमी होना तो कोई इशु ही नहीं है यहाँ ! तो होता यह है कि जिन पोषक तत्वों की कमी होती है वो उस महिला को कमजोर, और कमजोर बनाते चले जाते हैं।

उसकी कम उम्र में ही शादी का चलन है और फिर 21 की होते होते तो वो माँ बन जाती है या बनने वाली होती है । जब एक नया शरीर उसके अंदर होता है तो डबल पोषण चाहिए क्यूंकी उसकी सबसे छोटी कोशिका से ले कर हड्डियाँ उस की माँ के शरीर के हिस्से बनते हैं । जो शरीर पहले से ही कमियों से घिरा हुआ है, वो यह सब उस भ्रूण को देने में असमर्थ है । गरीब घरों को छोड़ ही देते हैं, कई घरों में गर्भावस्था के दौरान बहुत-बहुत खिलाया जाता है लेकिन तब भी कई बार जननी मर जाती है क्यूंकि जिस तरह आप भले 5 दिन के भूखे हो किन्तु पांचों दिन का खाना इकट्ठे नही खाया जा सकता है उसी तरह जो औरत पहले से ही उल्टियाँ कर रही हैं, उसके सिर्फ उन नौ महीनों में खाया हुआ उतना काम नहीं आता।

अगर गरीब-निम्न मध्यम वर्गीय आबादी में एक फैक्टर जो जननी मृत्यु मे कारक है, वो है उनका पहले से ही मलेरिया-डेंगू से ग्रस्त होना, indirect एड्स भी एक बड़ा कारण है , भारत में एक साल मे लगभग साढ़े तीन सौ औरतें गर्भकाल में एड्स के कारण मरती हैं । आप को जान कर अचरज नहीं होगा, ज़्यादातर औरतों की कुपोषण के कारण बचपन की अपेक्षा जवानी में दर्द सहने की क्षमता कम होती जाती है वहीं पुरुषों मे यह बढ़ती है । तो स्वाभाविक है कि सामान्य प्रसव के समय उसके मृत्यु को प्राप्त होने के चांस बेहद ज्यादा हैं । इन सब परिस्थितियों को नजर अंदाज़ करते हुए उसको शुरू से चिकित्सक के पास ले जाने में रुचि कम है, जिससे शिशु संबन्धित जटिलताओं का पता नहीं चल पाता।

अब ऑप्शन आता है सिजेरियन डिलिवरी का, सरकार की ओर से सरकारी स्वास्थ्य केन्द्रों पर इसकी निशुल्क सुविधा है , जिसमें महिला को वजीफा भी मिलता है । गाँव मे ‘आशा’ होतीं हैं जो किसी इमरजेंसी मे सहयोग करती है । इतना सब होते हुए भी हर एक लाख में से 178 औरतें शिशु को जन्मते समय मर जाती हैं । पहले तो जागरूकता की कमी होने से घर वाले सामान्य डिलिवरी को ले कर लड़ना शुरू कर देते हैं जिससे देर होती है फिर इस में भी एक बड़ा हाथ उन सरकारी मिडवाइव्स और सरकारी डॉक्टर्स का सामने आया है जो बेहद पिछड़े इलाकों मे डिलिवरी के समय हजार दो हजार रु मांगते हैं जिसे देने में विवाद होते हैं और खामियाजा जच्चा भुगतती है ।

अगर इन सब से वो बच कर घर लौट के आती है तो अगले 10 दिनों में मरती है क्योंकि जहां बच्चा पैदा हुआ, घर या अस्पताल, सफाई और औजारों में उचित सफाई न होना । इस से जच्चा बुखारग्रस्त हो जाती है और फिर मृत्यु। सरकारी अस्पतालों में जननी मृत्यु दर अधिक होने का कारण एक और भी है, वो यह कि प्राइवेट अस्पताल अंत समय पर सरकारी अस्पताल रिफ़र कर देते हैं।

तो जब हम ओवर आल आंकड़ा देखते हैं तो पाते हैं कि महिलाएं नॉर्मल डिलिवरी में ज्यादा मर रही हैं । यकीनन इसके पीछे का फैक्टर उनका दर्द फिर बुखार सहने मे अक्षमता है, लेकिन जैसा मैंने ऊपर शुरू से बताया असल कारण बहुत महीन लेकिन मोटे हैं । लड़कियों में डाइटिंग की सनक बढ़ रही है और उच्च वर्गीय महिलाओं में सिजेरियन की और बढ्ने का कारण बाजारवाद भी है।

तो इस कारण यह मान लेना कि इन महीन कारणों की जद में केवल निम्न वर्ग की औरतें हैं, सही नहीं है । इससे यह भी मानना कि सिजेरियन एक बेहतर ऑप्शन है (अपवादों को छोड़), सही नहीं है । आज भले सिजेरियन आसान बनता जा रहा है लेकिन शरीर में तैर रही दवाइयाँ बच्चे पर गलत impact डालते हैं । चूंकि आज कोई बचा ही नहीं इन सब तत्वों से ग्रस्त होने से तो हम फर्क अब्ज़र्व नहीं कर पाते।

कई बार एक्टिव रहते हुए, खाते पीते भी बड़ी कोंप्लीकेशन्स आती हैं तो अपवाद हर जगह मौजूद हैं और इन अपवादों के पीछे पर्यावरण भी हो सकता है। हमें सबसे पहले कुपोषण हटाने और जागरूकता बढाने पर काम करने की आवश्यकता है, क्यूंकि यह परम आवश्यक है। जब तक हम इन सब से दूर हैं सिजेरियन हमें बेहतर प्रतीत होगा और कई दफा होता भी है।

आप को जान कर हैरानी होगी कि जिस तरह हम सारे विकासशील देशों मे ‘महिला’ मृत्यु दर मे सब से आगे हैं उसी तरह अमेरिका, विकसित देशों मे जननी मृत्युदर में सब से आगे खड़ा है। इसलिए वो वापिस नॉर्मल प्रसव की ओर लौट रहे हैं और उन्हें इसमे थोड़ी सफलता भी हाथ लगी है। (महिला और जननी में फर्क होता है।)

पर अभी भारत को बहुत ज्यादा चलना है, आप कोई भी दिक्कत उठा के देखिये उसमें गरीबी और जागरूकता में कमी जड़ में मिलेगी। कई बार कोई पौधा पनपता नहीं है या तो मिट्टी सूटेबल नहीं होती या जड़ में ही कीड़ा होता है। पौधा लगाना बंद करना कोई उपाय नहीं है। सामान्य प्रसव भी एक ऐसा ही पौधा है। गर्भवती स्त्री को बिस्तर तोड़ आराम की नहीं उन बुनियादी सुविधाओं की जरूरत जिनसे उसके प्रसव कुशल से हो जाये, कोई दिक्कत होने पर डॉक्टर हो उसके पास। अपने अपने हिसाब की जागरूकता जरूरत है इस क्षेत्र में गरीबों को भी और अमीरों को भी!

भारत में गर्भवती महिलाओं की स्थिति के साथ-साथ प्रेगनेंसी और बाजार के बीच पनप रहे समीकरणों का खुलासा करता यह लेख हमें भेजा है राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर अपूर्वा प्रताप सिंह ने। अपूर्वा आगरा की रहने वाली हैं। 

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प्रेगनेंसी, बाजार और दया

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