आज जब हम शादी जैसे बंधन से बचना चाह रहे हैं वहीं ओके जानूँ फिल्म में शादी को रिश्ता न टूटने की एक मजबूत कड़ी माना गया है। फिल्म यह दिखाती है कि आदि (आदित्य कपूर) और तारा (श्रद्धा कपूर) रहते तो लिव-इन रिलेशनशिप में हैं, मगर जब अलग होते हैं तो एक रिश्ते में बंधकर अलग होने की बात करते हैं। फिल्म बहुत अच्छे तरीके से दिखाती है कि जब हम एक-दूसरे के साथ रहते हैं तो जुड़ते भी हैं और जुड़ते हैं तो एक-दूसरे की परवाह भी करने लगते हैं।

दरअसल फिल्म के नायक, नायिका दोनों ही शादी से डरते हैं और कोई जिम्मेदारी नहीं उठाना चाहते। वे अपने प्रोफेशन में तरक्की चाहते हैं। दोनों कहते हैं कि पहले कॅरियर है। आदि अमेरिका जाना चाहता है तो आर्किटेक्ट तारा फ्रांस जाने की तैयारी कर रही है। फिल्म में तारा का एक डॉयलाग भी है – नो हक जताइंग! यानी हम एक-दूसरे पर हक नहीं जताएंगे। हालांकि फिल्म में एक सिचुएशन ऐसी आती है कि दो दिन तक जब आदि की कोई खैर-खबर नहीं मिलती है तो तारा बुरी तरह परेशान हो जाती है, यहां तक कि मंदिर में मन्नत भी मांगती है और मिलने पर झगड़ा करती है।

फिल्म में जब दोनों के बीच शारीरिक संबंध बन जाते हैं तो तारा कहती है- ये जो हम कर रहे हैं ये ठीक है? यह एक ऐसा सवाल है जो शायद हर लड़की के मन में उठता है।तारा ने दरअसल बचपन में ही अपने मां-पिता के बीच अलगाव देखा है तो उसके मन में शादी को लेकर कोई उत्साह नहीं है। फिल्म में एक जगह तारा कहती है कि मैं जब सात साल की थी तो मेरे मां पिता अलग हो गए और मुझसे पूछा गया कि तुम किसके साथ रहोगी, और मैं किसी के साथ नहीं रहना चाहती। फिल्म में दिखाया गया है कि मां से बेटी के बीच ठीक तरह से संवाद भी नहीं होता। बेटी अहमदाबाद में उस जगह जाकर अपने पिता को याद करती है जहां उसके पिता हमेशा जाया करते थे। उसे लगता है कि शादी के बाद की जिंदगी बहुत अच्छी नहीं होती है। मगर जब वह गोपी (नसीरुद्दीन शाह) और चारू (लीला सैम्सन) के बीच लगाव और प्यार देखती है तो उसकी भी सोच बदलने लगती है।

यहां नसीर और लीला के रूप में एक ऐसा कपल दिखाया जो एक-दूसरे को बहुत प्यार करते हैं और एक-दूसरे की बहुत परवाह भी करते हैं। आदि उनके घर में रुका होता है और वहीं पर वह तारा के साथ लिव-इन रिलेशन में रहता है। इस दौरान कपल के बीच समर्पण देखकर वह प्रभावित होता है। यही सब देखकर आदि फिल्म में एक जगह तारा से कहता है कि तुम फ्रांस जाओ या कहीं भी… लेकिन शादी करके।

नसीर की पत्नी लीला को अल्जाइमर की बीमारी है और वह अक्सर बातें, लोगों को और रास्ता भूल जाती हैं। वे अक्सर घर से बाहर निकलकर भटक भी जाती हैं। बहुत कम समय रह हो गया होता है आदि के यूएसए जाने और तारा के फ्रांस जाने में, तभी एक दिन आंटी घर से निकल जाती हैं। आदि और तारा ही उन्हें खोजने निकलते हैं। उनको खोजते समय दोनों एक-दूसरे पर चिड़चिड़ाते हैं। खास तौर से आदि और उसमें तारा के प्रति पूरी परवाह झलकती है।

इस दौरान दोनों के बीच आपस में कहा-सुनी होती है तो तारा सवाल करती है- आंटी जैसी मेरी हालत हो जाएगी तो तुम मेरी देखभाल करोगो? मैं कहीं खो जाऊंगी तो तुम मुझे तलाश करोगे? यानी लिव इन में रहने वाले भी कहीं न कहीं मन से एक-दूसरे से जुड़ने लगते हैं। फिल्म में एक डॉयलाग है – जब दो लोग एक साथ प्यार में रहते हैं… तो आदत पड़ जाती है एक दूसरे की… और वक्त आने के पर ना आदत छूटती है ना प्यार। और सचाई यह है कि जब एक-दूसरे के प्रति लगाव होता है तो कहीं न कहीं हम हक भी जताने लगते हैं। यानी प्यार के साथ सिर्फ शरीर या सेक्स नहीं बल्कि एक-दूसरे के प्रति कमिटमेंट, समर्पण और जीवन भर साथ रहने का वादा होने लगता है।

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