“इसने मेरी ब्रा उठाके उनकी बालकनी में फेंक दी और उसपे शायरी भी लिख दी।” यह था डीयू के कमला नेहरू कॉलेज के नाटक ‘शाहिरा के नाम’ का वह डायलाग जिस पर हुई कंट्रोवर्सी ने अब सोशल मीडिया को भी अपनी गिरफ्त में ले लिया है।

नाटक के डायलॉग में ब्रा, पैंटी जैसे शब्द के इस्तेमाल की वजह से बेहतरीन परफॉर्मेंस के बावजूद प्ले को साहित्य कला परिषद के महाविद्यालय रंगमंच महोत्सव से डिसक्वॉलिफाई कर दिया गया। ऑर्गनाइजर्स का कहना है कि नाटक में कई शब्द ऐसे थे, जो अश्लील थे। आर्गनाइजर्स के इस फैसले की ज्यादातर लोगों ने कड़ी निंदा की है।

‘शाहिरा के नाम’ कॉमिडी के तड़के वाली एक भावनात्मक लव स्टोरी है। कहानी छह महिलाओं के इर्द-गिर्द घूमती है। थिएटर सोसायटी की कॉर्डिनेटर मोनामी बासु ने कहा, ‘नाटक के एक सीन में डायलॉग में ‘ब्रा’, ‘पैंटी’ जैसे शब्द थे। इनकी वजह से ऑर्गनाइजर्स इतने परेशान हुए कि हमें क्वॉलिफाई न करने की वजह तक नहीं बता पाए। हम ऐसे पाखंड भरे विचारों का विरोध करते हैं। हम ऐसी पांबदी का भी विरोध करते हैं, जो महिलाओं की जिंदगी से जुड़ी नॉर्मल चीजों जैसे पीरियड, सेक्सुअल डिजायर, ब्रा, पैंटी पर बात करने पर लगाई जाती है।’

नाटक के समर्थन में खड़े लोगों का तर्क है कि हम रोजाना सेक्सुअली वॉयलेंट शब्दों का इस्तेमाल कर सकते हैं, मगर महिलाओं की रोजाना की जिंदगी नहीं दिखा सकते। ‘नाटक में इन शब्दों का इस्तेमाल सामान्य ढंग से किया गया है, जो कि लड़कियों की रोजमर्रा की जिंदगी के कुछ पल को दिखाता है। क्या नाटक के किसी डायलॉग में अंडरगारमेंट्स का जिक्र नहीं हो सकता?’

नाटक से जुड़ी अलीशा चोपड़ा लिखती हैं-

अंत में इस पूरे मुद्दे पर स्टैंड लेने वाली मोनामी बसु ने एक सकारात्मक खबर दी है-

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