Monthly Archive: February 2017

निहलानी जी, फीमेल फैंटेसी से इतनी घबराहट क्यों हुई आपको?

पहलाज निहलानी जी, ‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’ फिल्म को मुंबई फिल्म फ़ेस्टिवल में जेंडर इक्वेलिटी के लिए ‘ऑक्सफेम’ अवार्ड मिल चुका है। यानी कि हम यह मानकर चलें कि फिल्म कुछ लोगों की नज़रों...

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मेरी जिंदगी के तमाम खूबसूरत पुरुषों को प्यार!

इन दिनों ज्ञान बांटने वालों की बाढ़ आई हुई है। हर इंसान लेखक है आलोचक है। पाठक गुमशुदा है। सलाह के नाम पर रेवड़ियां बाँटी जा रही है। कोई भी एक विषय उठा लिया...

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हर पुरुष के भीतर एक स्त्री होती हैः अविनाश

पत्रकार अविनाश दास ने फिल्म ‘अनारकली ऑफ आरा’ में एक ऐसी स्त्री को अपने स्वाभिमान के लिए संघर्ष करते दिखाया गया है, जो नाचने-गाने वाली है और जिसके बारे में हमारे समाज में मान...

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अच्छी लड़कियां गलतियाँ करके नहीं सीखतीं!

“मुझे सड़कों पर चाऊमीन और बिरयानी खाने वाली लड़कियां बहुत बुरी लगती हैं। सड़क पर खड़े होकर वह क्या दिखाना चाहती हैं कि हम भी ऐसे खा सकते हैं। अरे भई गोलगप्पे और टिक्की...

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हर महिला को जाननी चाहिए कोयंबटूर के मुरुगनाथम की कहानी

एसी नील्सन का एक सर्वे बताता है कि भारत में सिर्फ 12% महिलाएं ही सैनिटरी नैपकिन का प्रयोग करती हैं। ऐसा जागरुकता के अभाव और महंगे नैपकिन को खरीद पाने में असमर्थता के चलते...

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मुझको यौम-ए-मुहब्बत जैसे किसी दिन की याद नहीं

आज वैलेंटाइन डे है। मोहब्बत के इज़हार का दिन। अपना मुल्क अफ़ग़ानिस्तान छोड़ा तो उम्र काफ़ी कम थी। यौम-ए-मुहब्बत जैसे किसी दिन की याद नहीं आती। बीच के दिनों मे जब जाना हुआ तो...

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मुझमें जो भी अच्छा है सब तेरा है

जब तुम बाहर रहते हो… ऑफिस के काम से… तो और भी ज्यादा यह अहसास पुख्ता होता है कि तुमसे ही यह घर घर है। जरूरी नहीं कि यह बात सिर्फ स्त्री पर लागू...

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बदन के हर झुलसे अंग पर एक टैटू दिखता है… ‘औरत’

बहुत कुछ गल गया था उस रोज़, जिस रोज़ कोई ‘पौरुष का घोल’ मुझ पर फेंक कर चलता बना। सड़क पर झुलसती मैं और इक मूक भीड़ जो ‘तेज़ाब -तेज़ाब’ सा कुछ चीख़ रही...

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ये अंतिम रात मेरी तुम्हारे साथ थी…

कुछ प्रश्न मुझे हमेशा लहूलुहान कर देते हैं मैंने कभी अपना बचपन जिया ही नहीं। अनजाने ही अपने छोटे भाई-बहनों का दायित्व बड़ी बहन की जगह मां जैसा निभाने लग गई। 18-19 साल की...

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देह जो नदी बन चुकी…

एक लंबी कविता… जो रेड लाइट एरिया की बेबस और बदरंग जिंदगी को बयान करती  है।  (1) भूख से बेदम, किसी सड़क ने पिघलते सूरज की आड़ में, घसीट के फेंका एक ऐसी राह...

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