कुछ प्रश्न मुझे हमेशा लहूलुहान कर देते हैं मैंने कभी अपना बचपन जिया ही नहीं। अनजाने ही अपने छोटे भाई-बहनों का दायित्व बड़ी बहन की जगह मां जैसा निभाने लग गई। 18-19 साल की होते-होते पिता ने अपने सर का बोझ किसी और को हस्तांतरित कर दिया।

मेरा विवाह करके मैं पिता की परिधि से निकलकर ससुराल की देहरी के अंदर बाँध दी गई और अनगिनत महत्वाकांक्षाओं और उम्मीदों के भार तले स्वयं को साबित करने की पुरजोर कोशिश में लग गई।

फिर वह समय आया जिसका इंतजार हर स्त्री को होता है। पूर्णता का अहसास। जब एक और जान मुझमें साँस लेने लग गई…

पर घर की सुगबुगाहट में एक साजिश सी सुनाई दे रही थी। मुझे डॉक्टर के पास ले गए और पहला बच्चा बेटा न होने पर गर्भपात तय कर दिया। (जाने किस परंपरा के तहत पहला बच्चा खानदान का वारिस ही होना चाहिए था…)

मैंने रोकर, गिड़गिड़ा कर, मिन्नतें करके एक असफल प्रयास किया। पति को ऐसा करने से मना करने के लिए, पर सब व्यर्थ… उनके चेहरे के भाव ऐसे थे जैसे मैंने अपने बच्चे के बदले उनकी जान माँग ली हो।

मैं नितांत अकेली थी एक अंतिम स्याह रात में अपनी बच्ची के साथ। आज वो भी शांत थी। मेरे अंदर का भय रक्त धमनियों से होता हुआ उसके मस्तिष्क तक पहुँच गया था। मैंने काँपती उँगलियों से अपने उभरे उदर को छुआ तो लगा वह सिमट कर मेरे हाथों के समीप आ गई जैसे कह रही हो। माँ मुझे बचा लो!

मेरा हृदय दुःख के कहीं गहरे आघात से क्षतिग्रस्त हो अर्धमूर्छित अवस्था में पड़ा है पर डर हावी हो गया है। डर…मेरी नन्ही कपोल का अंकुरण मसल जाने का। डर ….अनकहे बोल कभी न सुन पाने की। डर…तुम्हारी सुनहरी लटों में कभी उँगलियाँ न फिरा पाने का। डर ….तुम्हारे नर्म होंठों को कभी अपने सीने में महसूस न कर पाने का।

कैसे रोक पाउँगी वे खूनी औजार जो तुम्हें मेरी कोख से जीवित ही खंड-खंड कर अलग करेंगे और खुरच-खुरच निकालेंगे माँस के खुरचन।

मैं चीख कर रोना चाहती हूँ। मैं तुम्हें बचाना चाहती हूँ। मैं तुम्हारे खून से अपनी कोख को रक्तरंजित नहीं करना चाहती। तुम जहाँ कल तक आकार ले रही थी। कल की मनहूस सुबह पूर्ण विराम दे दोगी…और मेरे पास रह जाएँगी तुम्हारी मद्धिम होती अंतिम साँसों की जद्दोजहद…

स्वयं को बचाने की नाकाम कोशिश में जहाँ तहाँ नन्हे मुक्कों की कश्मकश के निशान मेरे गर्भ की दीवारों में। ये अंतिम रात मेरी तुम्हारे साथ। कल सुबह मैं साँसें तो लूँगी… पर जीवित नहीं रहूँगी। तुम्हारी हत्या के बोझ को लिए जीने को अभिशप्त हूँ।

मेरी अंतिम श्वास तक…

पूनम लाल सोशल मीडिया पर विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर अपनी बेबाक लेखनी के लिए जानी जाती हैं। यह आलेख हमने उनकी फेसबुक वॉल से लिया है।