बहुत कुछ गल गया था उस रोज़, जिस रोज़ कोई ‘पौरुष का घोल’ मुझ पर फेंक कर चलता बना। सड़क पर झुलसती मैं और इक मूक भीड़ जो ‘तेज़ाब -तेज़ाब’ सा कुछ चीख़ रही थी। पर जलन बता रही थी और मैं भोग भी रही थी- उस सौ गुना ज्वलनशील भावना को जो वो मुझ पर तेज़ाब में मिला कर उड़ेल गया था।

रिस रही चमड़ी भी लाचार होकर अंगों का साथ छोड़ रही थी। दर्द ने होश गवां दिए थे। अँधेरा इतना काला कैसे हो गया भरी दोपहरी में?

कुछ ग्रहण बने होते है- चाँद सूरज के लिए और कुछ बना दिए जाते हैं बिना कारण, बिना तारीख, बिना सोचे समझे। उस दिन कई अखबारों में सिर्फ एक ही खबर छपी- ”इक चाँद… भरी दोपहरी सड़क पर झुलस गया”। ऐसी कई दिनों तक फिर बस खबरें छपती रही। चाँद झुलसता रहा और दिन रात रुके रहे। साथ में दर्द और दवा भी।

हर ग्रहण की तरह इस ग्रहण का भी गुज़र जाना तय था। तारीखें जब बढ़ती हैं तो बहुत कुछ संग सरका ले जाने का माद्दा रखती हैं। कब तक रेंगता मुझ पर दर्द। इक सीमा के बाद दर्द के पैर पर भी लकवा मार गया।

फिर रिसना बंद। रिसाव बंद। आँसू बंद। बहाव बंद।

सब ठोस हो गया। जैसे तेज़ाब संग सारे भावनात्मक और शारीरिक द्रव्य भाप बनकर उड़ गए हों। शरीर के चीथड़ों में कुछ था अब भी बाक़ी जो शायद काफी गहरा धंसा होने की वजह से बच गया था… ‘मेरा अंतस’।बस वही साबुत रहा। थोड़े छींटे पड़े भी होंगे शायद… पर अब मैं इतनी भी बदनसीब नहीं थी। या फिर भगवान ने खूबसूरती का वही इक सामान मुझ पर छोड़ने का मन बना लिया होगा। ऐन मौके पर बदल लिया होगा उसने भी अपना मन… शायद।

बस उसी ‘अंतस’ को एक दिन झुलसे हाथों से उठाकर आईने के सामने नग्न होकर अपने क्षत विक्षत शरीर पर मल डाला। जख्म भरे तो नहीं उस रोज़ भी पर एक परत महसूस हुई अपने जले अंगों पर जो अदृश्य थी पर जाने क्यों मुझे दिख पा रही थी। शायद जिजीविषा थी मेरी।

मरने के लिए छोड़ जाना और मर जाने का अंतर पाट लिया था मैंने। मैं थी और इक आइना था जो पहले से और खूबसूरत नज़र आ रहा था। आइना ही ‘खूबसूरत’ हो सकता था अब क्योंकि मेरे शब्दकोष में ये शब्द बरसों पहले सो चुका था। अपने मायने खो चुका था। आखिरी बार बस आँखों के रास्ते बचा-खुचा तेज़ाब बहाने के लिए रोई। चीत्कार कर रोई।

जब रहा-सहा समेटो तो ढेरी ही बनती है, जो मुठ्ठी से उठायी जा सकती है। मुट्ठी में हौसले भी होते हैं और तकदीर भी। तकदीर पर कब ज़ोर चला था मेरा… अच्छा हुआ जल गई। हौसले चिपके रहे जली हथेलियों पर।

आज इक बार फिर खड़ी हूँ
अब ज्वालामुखी हूँ ….
क्योंकि धधक पहन कर चलती हूँ
तेज़ाब ढोती हूँ रोज़
रिहाई बरसों पहले हो गयी थी मेरी पर आज मैं रिहा हूँ
पहले से ज्यादा पूर्ण हूँ ।बल्कि तेज़ाब में भीगने के बाद से संपूर्ण हो गयी हूँ।

कुछ अंग नहीं हैं मेरे
अब वो… रंग भी नहीं हैं मेरे
पर… रिक्त नहीं हूँ
पहले भी नहीं थी… गलने से पहले
ना अब गल जाने के बाद

अपनी पुरानी पहचान पर खुद तेज़ाब डाल कर मैंने ‘स्वयं’ खोज लिया है अपना।अपने बदन के हर झुलसे अंग पर एक टैटू दिखता है… ‘औरत’
चलो इसका नया अर्थ भी बताती चलूँ…

औ….और भी ढ़ेर
र….रवायतें लाद दो
त….तय कर लूँगी

ठीक इसी ढब में गोदा है अपने ऊपर… डाल कर देखो अब अपना पौरुष वाला तेज़ाब। बेअसर होगा…और शर्मिंदा भी।

और हाँ! जाते-जाते एक बात और… अब फ़िदा नहीं होती खुद पर। अब… रिदा रहती हूँ खुद से।

यह लेख भेजा है कल्पना पाण्डेय ने। पिछले कई सालों से लेखन से जुड़ी हैं। कुछ पत्रिकाओं और साझा संकलनों में रचनाएं प्रकाशित। उनके शब्दों में – औरत ,शब्द ,इश्क़, ज़िन्दगी… पर लिखती हूँ। चित्र देखकर उस पर लिखना बेहद पसंद है। कल्पना को कविता के पीछे नहीं… कविता के समकक्ष ढूंढा जाये। संप्रति- केंद्रीय विद्यालय, प्रगति विहार में मुख्य अध्यापिका।