हर महिला को जाननी चाहिए कोयंबटूर के मुरुगनाथम की कहानी

Muruganantham menstrual man

एसी नील्सन का एक सर्वे बताता है कि भारत में सिर्फ 12% महिलाएं ही सैनिटरी नैपकिन का प्रयोग करती हैं। ऐसा जागरुकता के अभाव और महंगे नैपकिन को खरीद पाने में असमर्थता के चलते है। ये उस देश का हाल है जहां लड़कियों को माहवारी की वजह से स्कूल जाने से रोक देना आम बात है। बावजूद इसके किसी भी पॉलिटिकल पार्टी को इस आंकड़े ने परेशान नहीं किया क्योंकि हम वो समाज हैं जो ‘छोटे मोटे’ मामलों पर सोचना पसंद नहीं करता मगर कोयंबटूर के एक आदमी ने इस बारे में सोचा।

छोटी सी उम्र में पिता को खो देने और 14 साल की उम्र में स्कूल से निकाले जानेवाले कोयंबटूर के अरुणाचलम मुरुगनाथम ने सस्ते सैनिटरी नैपकिन को ही जीवन का लक्ष्य बना डाला। वो गरीब था। छोटे-मोटे काम-धंधे करता था। 19 साल पहले एक दिन उसने अपनी पत्नी को कुछ छिपाते देखा तो पूछने लगा। मालूम चला कि वो गंदा सा कपड़ा छिपा रही थी जिसका इस्तेमाल वो माहवारी के दौरान कर रही थी।

मुरुगनाथम ने पत्नी से सैनिटरी नैपकिन खरीदने को कहा तो उसने बताया कि अगर वो ये करे तो घर का बजट ही बिगड़ जाएगा। मुरुगनाथम चौंका और पास की ही एक दुकान से सैनिटरी नैपकिन खरीदा। उसे अचंभा हुआ कि 40 पैसे की कॉटन के लिए कंपनियां 4 रुपए वसूल रही हैं। मुरुगनाथम ने फैसला किया कि वो खुद ही सस्ता सैनिटरी नैपकिन बनाकर पत्नी को देगा। मुरुगनाथम ने पत्नी को एक पैड बनाकर दिया और इस्तेमाल करके बताने को कहा।

चुनौती ये थी कि माहवारी महीने में एक ही बार होती है और मुरुगनाथम को पैड जल्दी से जल्दी बनाना था। उसने प्रयोग के लिए दूसरी महिलाओं से बात करने की ठानी। आम महिलाएं नैपकिन प्रयोग कर नहीं रही थीं तो उसने किसी तरह मेडिकल कॉलेज की 20 लड़कियों को राजी किया पर फीडबैक शीट्स पर उन्होंने अपना फीडबैक ठीक से नहीं दिया। तीन लड़कियों ने सबके फॉर्म भर डाले।

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परेशान मुरुगनाथम ने अब खुद पर प्रयोग करने की ठान ली। फुटबॉल ब्लैडर निकाल कर उसने एक नकली गर्भाशय बनाया। अपने एक कसाई दोस्त से लेकर उसमें बकरी का खून भरा। सैनिटरी नैपकिन बनाकर खुद पहना। इसके बाद वो साइकिल चलाने जैसा काम करके देखने लगा ताकि दबाव पड़ने से खून बहे और वो नैपकिन को टैस्ट कर सके। ये सब मालूम पड़ने पर दोस्तों और पड़ोसियों ने मुरुगनाथम से दूरी बनानी शुरू कर दी। कोई गाली देता तो कोई मज़ाक बनाता।

खुद उसकी पत्नी डेढ़ साल बाद घर छोड़कर चली गई। मुरुगनाथम ने प्रयोग जारी रखा। अब उसने सोचा कि इस्तेमाल किए हुए सैनिटरी नैपकिन देखे जाएं और मालूम किया जाए कि वो कामयाब क्यों हैं। उसने फिर मेडिकल कॉलेज की लड़कियों से उनके इस्तेमाल किए जा चुके नैपकिन मांगे। वो उन पर चुपके से घर के पीछे जाकर शोध करता था। इस सनक से परेशान होकर एक दिन मां भी चली गई। मोहल्ले में भी विरोध बढ़ने लगा।

माना गया कि मुरुगनाथम पर कोई भूत सवार है और तांत्रिक से इलाज कराया जाए। किसी तरह उसने काम जारी रखा। बार-बार असफल मुरुगनाथम ने अब नैपकिन बनानेवाली कंपनियों से ही पूछना शुरू किया कि वो नैपकिन कैसे बनाती हैं। ज़ाहिर है, कोई उसे क्यों बताता लेकिन कुछ ना कुछ झूठ बोल कर उसने मालूम कर लिया कि नैपकिन में सिर्फ कॉटन नहीं होती बल्कि पेड़ की छाल से निकले सैल्युलोज़ का इस्तेमाल भी होता है।

सवा दो साल बाद ये बात मालूम तो चल गई लेकिन दिक्कत ये थी कि ऐसा नैपकिन बनाने के लिए जैसी मशीन चाहिए थी वो बहुत महंगी थी। साढ़े चार साल की कड़ी मेहनत के बाद मुरुगनाथम ने ऐसी छोटी मशीनें बना लीं जो किसी तरह सस्ता सैनिटरी नैपकिन बना लेती थीं। इस काम को समझने और करने में एक घंटा लगता था।

दरअसल अब तक मुरुगनाथम की सोच बदल चुकी थी। उसने सस्ते सैनिटरी नैपकिन बनाने की बात तो सोची ही थी, साथ में अब वो ऐसा तरीका विकसित करना चाहते थे जिससे नैपकिन बनाने का काम महिलाएं ही सीख जाएं और उन्हें इस काम की अच्छी कीमत भी मिल सके। आखिर मुरुगनाथम ने अपनी मां की मजबूरियां भी देखी थीं। मुरुगनाथम लकड़ी की बनी अपनी मशीन को IIT मद्रास ले गए और काम दिखाया। मल्टीनेशनल के सामने अपनी लकड़ी की मशीन से लोहा लेने के उनके जज़्बे से वैज्ञानिक हक्के बक्के थे।

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IIT मद्रास के नेशनल इनोवेशन अवॉर्ड कंपटीशन की 943 मशीनों में मरुगनाथम की मशीन नंबर वन थी। तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने जब मुरुगनाथम को सम्मानित किया तो ये ड्रॉप आउट अचानक ही सुर्खियों में आ गया। आखिर साढ़े 5 साल बाद उसकी पत्नी का पहला फोन आया। वो वापस घर आना चाहती थी। दूरदर्शी मुरुगनाथम ने मशीन को पेटेंट कराने से इनकार कर दिया। डेढ़ साल बाद मुरुगनाथम ढाई सौ मशीनों के साथ खड़ा था जिन्हें उसने बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और यूपी पहुंचा दिया।

उसके सामने चुनौती थी कि पूर्वाग्रहों और शर्म से भरे इन इलाकों में महिलाओँ को इन मशीनों और सैनिटरी नैपकिन के बारे में कैसे बताए। हार ना माननेवाले मुरुगनाथम ने धीरे-धीरे ये भी किया और जल्दी ही 23 प्रदेशों के 1300 गांव में मुरुगनाथम की मशीन चमत्कार करने लगी। नैपकिन बनानेवालों ने खुद ही उसे बेचना शुरू कर दिया। यहां तक कि बदले में महिलाओँ ने पैसों के बदले घर का सामान तक खरीद लिया। एनजीओ और महिलाओं के दूसरे संगठन आगे आने लगे।

एक मशीन की कीमत 75 हज़ार रुपए थी। हर मशीन एक दिन में 200-250 नैपकिन बनाती है जिसमें प्रति नैपकिन ढाई रुपए का बेचा गया। हर ग्रुप ने खुद अपना ब्रांड नेम चुना और पैक करके बेचना शुरू कर दिया। 23% लड़कियों को माहवारी शुरू होते ही घरवाले स्कूल भेजना बंद कर देते थे। मुरुगनाथम ने स्कूलों को ये नैपकिन उपलब्ध करा दिए। सस्ता सैनिटरी नैपकिन अब देश से बाहर निकलकर केन्या, नाइजीरिया, मॉरिशस ,फिलीपींस, बांग्लादेश जा पहुंचा। सरकार ने घोषणा की कि सब्सिडाइज़्ड नैपकिन औरतों में बांटे जाएंगे।

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मुरुगनाथम जीप खरीद चुका है। एक शानदार अपार्टमेंट में परिवार के साथ रहता है। इससे ज़्यादा की चाह उसे नहीं है। वो पलट कर पूछता है कि, ‘अमीर होने के बाद आप एक एक्सट्रा बैडरूम का फ्लैट ले भी लेंगे तो क्या.. मरना तो है ही ना।‘ मुरुगनाथम यूनिवर्सिटी और कॉलेज में जाकर एक बात कहते हैं- ‘अच्छा हुआ कि मैं अनपढ़ हूं। अगर आप अनपढ़ की तरह रहते हैं तो ज़िंदगी भर कुछ ना कुछ सीखते रह सकते हैं।‘

मुरुगनाथम के साथ आज ना सिर्फ उनका पड़ोस है बल्कि सारा इलाका खड़ा है। एक बार उनसे पूछा गया कि क्या राष्ट्रपति से अवॉर्ड लेना उनकी ज़िंदगी का सबसे सुखद पल था तो उन्होंने इससे इनकार कर दिया। उन्होंने बताया कि सबसे गर्वीला क्षण वो था जब उन्होंने उत्तराखंड के एक ऐसे इलाके में मशीन लगाई जहां पीढ़ियों से किसी ने इतना पैसा नहीं कमया था कि बच्चों को स्कूल भेजा जा सके।

साल भर बाद उनके पासएक महिला का फोन आया जिसने बताया कि अब उसकी बेटी स्कूल जा सकती है,’जहां नेहरू फेल हो गए थे, वहां उनकी मशीन कामयाब हो गई।’ 2014 में मुरुगनाथम टाइम्स मैग्ज़ीन की विश्व के सौ प्रभावशाली लोगों की लिस्ट में से एक थे। 2016 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री दिया। खबर है कि फिल्म निर्देशक बाल्की उन पर फिल्म बना रहे हैं। स्रोतः BBC World, time.com

यह लेख नितिन ठाकुर का है। वे सोशल मीडिया पर विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर लगातार लिखते हैं।

एक वैकल्पिक मीडिया जो महिलाओं से जुड़े मुद्दों और सोशल टैबू पर चल रही बहस में सक्रिय भागीदारी निभाता है। जो स्रियों के कार्यक्षेत्र, उपलब्धियों, उनके संघर्ष और उनकी अभिव्यक्ति को मंच देता है।

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