“मुझे सड़कों पर चाऊमीन और बिरयानी खाने वाली लड़कियां बहुत बुरी लगती हैं। सड़क पर खड़े होकर वह क्या दिखाना चाहती हैं कि हम भी ऐसे खा सकते हैं। अरे भई गोलगप्पे और टिक्की तक तो ठीक है, लेकिन अब वो बिरयानी भी सड़क पर खड़े होकर खाएंगी, ये तो बदतमीजी है। पैक कराकर नहीं ले जा सकतीं। घर पर तमीज से जाकर खाएं।” इस बात के समर्थन में कई पुरुष मुस्कुराते हुए दिखे और कह रहे थे- “हां बात तो ठीक है।” जिस अंदाज में वह यह बातें बोल रहे थे, लग रहा था कि उनका बस चले तो लड़कियों को खाना भी अपने हिसाब से ही दें।

कुछ लोग कहते हैं कि सशक्तीकरण के नाम पर आजकल लड़कियां कुछ भी कर रही हैं। ‘महिला सशक्तीकरण’ पर आजकल चर्चाएं खूब हो रही हैं। बड़े-बड़े मंचों पर हो रही हैं। बड़े-बड़े लोग कर रहे हैं। वह कुछ चिंतित से दिखते हैं कि महिलाएं भी आगे बढ़ें। लेकिन ये लोग महिला सशक्तीकरण की बातें तभी तक करना पसंद करते हैं, जब तक महिलाओं की आजादी इनके मुताबिक तय हो रही हो।

जितने दायरे उनके लिए इन्होंने तय किए हैं, उतने में ही वह अपनी जिंदगी की खुशियां तलाश रही हों। अगर वह इससे आगे बढ़ती हैं, तो अब इन लोगों के पास एक नया शब्द है ‘नकारात्मक सशक्तीकरण’। सशक्तीकरण आखिर नकारात्मक कैसे हो सकता है? मेरे मुताबिक तो यह कोई शब्द ही नहीं है।

इस नकारात्मक सशक्तीकरण की श्रेणी में सबसे पहले आती हैं- शराब और सिगरेट पीने वाली, देर रात तक घूमना-फिरने वाली, स्टाइलिश ड्रेस पहनने वाली, पब-डिस्को जाने वाली, लड़कों के साथ दोस्ती करने वाली और हंस-हंसकर बातें करने वाली लड़कियां।

साल 2015 में ‘वोग’ पत्रिका की एक वीडियो ‘माय चॉइस माय राइट’ आई थी, जिसमें दीपिका पादुकोण समेत तमाम अभिनेत्रियां बिंदास तरीके से अपनी आजादी की बात करते दिखी थीं। लोगों को वह बातें हजम नहीं हुईं और जो विरोध हुआ वह सभी ने देखा था। ‘नकारात्मक सशक्तीकरण’ जैसा शब्द गढ़ने वाले ये लोग अप्रत्यक्ष रूप से यह कहते हैं कि सशक्तीकरण सही नहीं है। वरना लड़कियां बिल्कुल हाथ से ही निकल जाएंगी।

अब प्रश्न यह है कि जब महिलाओं के लिए सशक्तीकरण की बातें होती हैं, तो लोग सिर्फ अच्छा ही अच्छा क्यों सुनना पसंद करते हैं? लड़की को वह महान विभूति की तरह ही क्यों देखना पसंद करते हैं? वह एक सामान्य इंसान की तरह क्यों नहीं जी सकती है?

कोई लड़की सिगरेट जलाती दिख जाए, तो लोग अंदर तक फुंक जाते हैं। इसके बाद शुरू होता है लड़कियों को कोसने का सिलसिला। यह सच है कि धूम्रपान का विरोध करना चाहिए। यह एक व्यक्ति को नुकसान पहुंचाता है। लेकिन, समाज के दोगले लोग लड़कों के मामले में सिगरेट के नुकसान पर बातें करते हैं और लड़कियों के मामले में इसे अपराध बता देते हैं।

क्योंकि मान लिया है कि यह लड़कों का अधिकार है। लेकिन, एक लड़की अगर दिख जाती है, तो लगता है कि इसमें लड़कों की आजादी पर सेंध लग गई है। उन्हें लगने लगता है कि आखिर वह लड़कों की तरह कैसे व्यवहार कर सकती है।

इसी तरह पहनावे-ओढ़ावे को लेकर भी लड़कियों को केंद्र में रखा जाता है। आज भी जींस पहनने के लिए लड़कियों को प्रयास करने पड़ते हैं। वह सामान्य तरीके से इसे नहीं पहन सकतीं, जिस तरह वह साड़ी और सलवार सूट पहनती हैं। दिल्ली, मुंबई, बंगलुरू जैसे बड़े शहरों में बेशक काफी हद तक लड़कियां मनमर्जी का लाइफ स्टाइल अपनाती हैं।

इसमें उनका नौकरी पेशा होना या प्रोफेशनल कोर्स करना बड़ा सहयोग देता है। लेकिन, छोटे शहरों में जींस पहनने के लिए लड़कियों को घर से बाकायदा इजाजात लेनी पड़ती है। उन्हें तर्क देने पड़ते हैं कि जींस के साथ कुर्ता डाल लेंगे या लांग टॉप पहनेंगे।

लड़कों के मामले में कहा जाता है कि वे गलतियां करेंगे मगर सीख जाएंगे। आखिर लड़कियां गलतियां क्यों नहीं कर सकती हैं। कुछ लोग उसकी आजादी के लिए भी एक सीमा तय करने में लगे हैं। अगर वह सीमा लांघती है, तो लोगों को लगता है कि सशक्तीकरण की आड़ में लड़कियां बिगड़ रही हैं।

उन लोगों से मैं कहना चाहती हूं कि आप हमसे गलतियां करने का अधिकार भी क्यों छीन रहे हैं। शायद उनके मुताबिक अच्छी लड़कियां गलतियां करके नहीं पुरुष के बताए रास्ते पर चलकर सीखती हैं।

यह लेख है युवा साहित्यकार और पत्रकार ज्योति राघव का। वे कविताएं लिखती हैं और स्त्रियों से जुड़े मुद्दों पर चल रही बहस में लगातार सक्रिय रहती हैं।