इन दिनों ज्ञान बांटने वालों की बाढ़ आई हुई है। हर इंसान लेखक है आलोचक है। पाठक गुमशुदा है। सलाह के नाम पर रेवड़ियां बाँटी जा रही है। कोई भी एक विषय उठा लिया जाता है जो चल रहा होता है फिर उस पर वाद विवाद के नाम पर जमकर लिखा-बोला जाता है, पढता कोई भी नहीं, कोई पढना चाहता भी तो नहीं। कुछ लोग तर्क के धरातल पर रहकर बात करते भी हैं, लेकिन उनको कोई सुनना नहीं चाहता।

खैर… मैं फिलहाल बात करना चाहती हूँ पुरुषों पर, जिनके सौंदर्य को हमेशा अनदेखा किया गया है। कुछ पुरुष ऐसे भी होते हैं जो ज़िन्दगी भर अपना काम ईमानदारी से करते हैं, भरपूर प्रेम करते हैं, और नारीवादी भी होते हैं। तथाकथित नारीवादी युग में पुरुषों को सिर्फ दुश्मन मान लिया गया है और उनपर जमकर बरसा जाता है हर बात पर। जिस तरह से सारी महिलाएं हमदर्दी की पात्र नहीं होती उसी तरह सारे पुरुष कोसने के लिए नहीं हैं।

पुरुषों का अपना सौंदर्य है। फिर चाहे वो पिता के रूप में हो, पति के रूप में हो, दोस्त हो, प्रेमी हो, भाई हो या रास्ते से गुज़रता कोई भी पुरुष। वो सिर्फ कमाकर देने वाली मशीन नहीं है। ज़िम्मेदारियों से दबकर खुदको वक़्त से पहले कमर झुकाकर बुजुर्ग की उपाधि पाने की लिए नहीं है। उसे रोना आएगा तो उसे भी रोने दीजिये ये कहकर उसके आंसू मत दबाइए कि तुम आदमी हो रोते हुए ज़रा देखो कैसे औरत जैसे लग रहे हो। उसे यह कहकर अकेला मत छोड़िए कि आदमी है खुद संभल जायेगा।

पुरुष भी भावुकता के उसी धरातल पर रहते हैं जहाँ औरत होती है। उन्हें भी उतना ही प्यार चाहिये जितना कि औरत को। जरा सोचिए कितना अच्छा लगता है जब वो गले लगाते हैं और औरत का सिर सीधा उनके दिल को छूता है। इससे खूबसूरत और क्या होता होगा। प्रेम आप कभी अकेले कर नहीं सकते इसमें तो सदैव ही दो लोगों की ज़रूरत पड़ेगी ही।

नारी सौंदर्य पर कितना कुछ कहा गया है लिखा गया है, पुरुषों की अवहेलना की गयी है, हो सकता है उन पर भी कहा गया हो! लेकिन जितना कहा जाना चाहिए वो अभी बाकी है। नारीवाद एक अलग चीज़ है और उसकी बात यहाँ बिलकुल भी नहीं हो रही है। ये एक पुरुष का ही सौन्दर्य है कि उसमे नारी बसती है तभी तो शिव अर्द्धनारीश्वर हैं। रोज़ की बातों में से सहेजकर देखिये आपके पुरुष आपके लिए कितने महत्वपूर्ण हैं।

रास्ते पर चलते वक़्त अगर वो आपको साइड में करके ये कहते हैं कि इधर चलो ये गाड़ी वालें देखकर नहीं चलाते और खुद उस खतरे को मोल ले लेते हैं, तब उनकी ख़ूबसूरती झलकती है। किसी दुकान पर अन्य पुरुषों की भीड़ देखकर आपको ये कहकर रोक देते हैं कि तुम रुको मैं ले आता हूँ बहुत भीड़ है, तब अच्छा लगता है ना।

और तब कैसा लगता है, जब आपको रोता देखकर वो ये कहते हैं कि… ‘अरे रो क्यों रही हो किसी ने कुछ कहा क्या? मुझे बताओ अभी देखता हूँ उसको तो!’ आप ढूंढकर देख लीजिये, बहुत कुछ मिल जायेगा जिसके लिए पुरुषों का धन्यवाद किया जा सके।

मेरी जिंदगी के तमाम खूबसूरत पुरुषों को प्यार ही प्यार।

इसे लिखा है भारती गौड़ ने, जो सोशल मीडिया पर विभिन्न मुद्दों पर अपने विचार व्यक्त करती रहती हैं। वे राजस्थान लेखिका साहित्य संस्थान की मीडिया इंचार्ज हैं और स्वयंसेवी संगठन अस्तित्व की काउंसलर रही हैं। वे जयपुर में रहती हैं।

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