Monthly Archive: March 2017

‘बद्रीनाथ की दुल्हनिया’, क्या आपके मन में भी उठे ये सवाल?

‘ये देखिए हमारी बड़ी बहू, इसने शादी के बाद नौकरी जैसी फिजूल बातें सोचनी ही छोड़ दीं।’ ये डायलॉग है हाल ही में आई फिल्म ‘बद्रीनाथ की दुल्हनिया’ का। फिल्म की शुरुआत में ही...

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यह पोर्न क्या है और अश्लीलता क्या है?

वास्तव में भारतीय संस्कृति में कौमार्य का पवित्रता से ऐसा नाता जुड़ा है कि अपवित्र हो जाने के डर से विपरीत लिंग के प्रति शिक्षा व जानकारी तक से दुराव होने लगा, कि कहीं...

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भारतीय समाज का ‘पर्दादार’ होना अब केवल एक भ्रम है

पोर्न उद्योग के विस्फोटक विकास के सामाजिक कारणों और परिणामों पर विस्तार से विचार किया जाना चाहिए। कच्चा मन स्वयं के शरीर और विपरीत लिंग के विषय में अनेक प्रश्नों से भरा है, प्रश्न...

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दो घटनाएं और पोर्न की दुनिया से रू-ब-रू होना

बात पुरानी है, नई है, अपने समय में हर समय की है। सड़कें आमतौर पर किसी भी शहर का आईना होती हैं। जिन पर टहलते हुए उस समाज की नब्ज़ टटोली जा सकती है।...

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हम लड़कियां कब मां की जगह ले लेती हैं, पता ही नहीं चलता…

मुझे याद नहीं कि बचपन में कभी सिर्फ इस वजह से स्‍कूल में देर तक रुकी रही होऊं कि बाहर बारिश हो रही है। भीगते हुए ही घर पहुंच जाती थी। और तब बारिश...

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लड़कियाँ गौरैया होती है

लड़कियाँ गौरैया होती है फुदकती हैं एक डाल से दुसरी डाल तक मुस्कुराती हैं अपने टेढ़े मेढ़े दांतो से पकड़ लेती हैं अपनी चोंच में कुछ टुकड़े अनाज के वो आंगन सूना होता है...

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कई धारणाएँ तोड़ते हैं ‘पतनशील पत्नियों के ये नोट्स’

हिन्दी साहित्य में फेमिनिज्म या स्त्रीवाद को बेहद गुस्सैल, आक्रामक और रुखे अंदाज में प्रस्तुत किया जाता है। नीलिमा चौहान की किताब पतनशील पत्नियों के नोट्स सबसे पहले इसी प्रचलित धारणा को तोड़ती है।...

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एक औरत के पास भी है फैंटेसी की दुनिया

‘लिपिस्टिक अंडर माइ बुर्का’ कैसी फिल्म है, मुझे मालूम नहीं! लेकिन इस फिल्म ने हमारा ध्यान कुछ ऐसी बातों की तरफ खींचा है, जो बेहद बुनियादी हैं, मगर उन्हें पुरूष प्रधान समाज मानना ही नहीं...

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