आइए पहले दान को समझ लें… दान किसी भी वस्तु या पदार्थ या संपत्ति का किया जा सकता है ना कि बेटियों का… क्योंकि बेटी संपत्ति नहीं हो सकती। दूसरा यदि आप किसी वस्तु या पदार्थ का दान कर देते हैं तो उस पर आपका अधिकार नहीं रहता किंतु ससुराल में कष्ट पाने पर कुछ माता पिता भी दुखी हो जाते हैं।

तीसरी बात कि दान देने वाला हमेशा बड़ा और लेने वाला छोटा होता है। किंतु यहां पर विरोधाभास है। लड़की का दान करने वाला ही हमेशा वर पक्ष के आगे नतमस्तक रहता है। चौथी बात कि दान केवल स्व-अर्जित वस्तु या संपत्ति का किया जा सकता है और बेटियां संपत्ति नहीं, जिस्म का हिस्सा होती हैं। कन्यादान सुनने में सुंदर तो बहुत लगता है। किंतु ,यह एक प्रकार की सामाजिक कुरीति है। जिसमें स्त्री की दशा को और अधिक दयनीय बनाने की भूमिका बखूबी निभाई गई है।

इस ग्रुप के जरिए स्त्री को गाय ,बकरी बना दिया गया है जिसे जरुरत के हिसाब से प्रयोग किया जाए और जब चाहे इसे किसी और को दे दिया जाए। बेटी को यह कहकर विदा किया जाता है कि यह आपके घर की दासी है और अपने चरणों में जगह दीजिएगा। क्यों? क्या विवाह दो इंसानों का नहीं है ? क्यों इसमें एक खरीदना है दूसरा बेचता है?

हमारे देश में इस तरह की प्रथा के लिए ऐतिहासिक प्रमाण भी काफी हद तक जिम्मेदार हैं। आइए देखें कि वर्षों पहले पौराणिक गाथाओं में भी कुछ ऐसा ही स्त्री स्थिति दिखाई गई है। रामायण में सीता का प्रयोग वस्तु की तरह से हुआ। जिसने पत्नी धर्म निभाया पर फिर भी उसको गर्भावस्था में स्वयं को एक अच्छा राजा साबित करने के लिए राम ने सीता को त्याग दिया। जबकि वे अग्निपरीक्षा पहले ही ले चुके थे। जिसे हम पुरुषोत्तम राम कहते हैं उन्होंने समाज के सामने एक ऐसा उदाहरण पेश किया जैसे स्त्री एक वस्तु है और जिसे जरूरत ना होने पर फेंक दो और राजधर्म का नाम ले लो… यदि हम राम को भगवान न समझ कर साधारण इंसान समझते तो ऐसे प्रश्न उठाना लाजमी था, पर भगवान के नाम पर मुँह सिल दिए जाते हैं।

ऐसी ही एक कुप्रथा पांडवों के द्वारा भी चलाई गई जिसने अपनी पत्नी द्रोपदी को वस्तु की तरह प्रयोग किया और माँ के कहने पर आपस में रोटी के टुकडे की तरह से बांट लिया और बाद में जुए में दाँव पर लगा दिया। इसमें द्रौपदी की मर्जी और उसका महत्व कहीं भी शामिल नहीं था। हम आज भी कन्या को दान के रुप में इन प्रथाओं को आगे बढ़ा रहे हैं और फिर गंगा नहा लेते हैं। आखिर क्यों किसी भी कन्या का दान किया जाए और दामाद हो पूजा जाए? उसके पैर छुए जाएं? क्या वह हमसे बड़ा है? या खुदा है? वह भी तो बच्चा ही है आपकी बेटी की तरह!

हम क्यों इतना भेदभाव करते हैं? यह सोचने वाली बात है कि दामाद को तो भगवान समझ पूजा जाता है लेकिन वह स्थान हम बहू को नहीं देते… ऐसा क्यों ? दामाद को सिर पे बिठाते हैं और बहू को चरणों की दासी ? अगर दामाद पूज्य है तो बहू क्यों नहीं? जब तक हम यूँ ही अपनी बच्चियों को दान करते रहेंगे यह पुरानी परिपाटी चलती रहेगी। हमारी बेटियां यूँ ही कुचली और मसली जाती रहेंगी या जला दी जाएंगी और वह सम्मान कभी नहीं पाएंगी जिसकी वह हकदार हैं।

या तो उन्हें देवी बनाकर पूजा जाएगा नौ दिन या फिर दुत्कार दिया जाएगा जानवर समझ के। बस इंसान ही नहीं समझा जाएगा। देश में हमारी बेटियों की दशा में सुधार तभी आएगा जब हम ऐसी प्रथाओं को सिरे से खारिज कर देंगे और यह स्वयं से वादा करेंगे कि मैं कन्यादान जैसी रस्म का बहिष्कार करूंगा या करूंगी। आज सरकारी तंत्र भी कन्या धन नाम से लालच देते हैं। शादी के लिए कन्या धन दान दिए जाने की बात करते हैं… तो फिर कन्या धन क्यूँ? स्वावलंबी धन क्यूँ नहीं। ताकि वह अपने पैरों पर खड़ी हो जाए?

यह शब्द ही गलत है इसका प्रयोग ही बंद कर देना चाहिए। क्योंकि कन्या मात्र वस्तु नहीं बल्कि जीती-जाती सांस लेती हुई एक इंसान है। जो आपके समाज में आपके साथ रहती है। यह अलग बात है आपने उसको काट के किनारे फेंक दिया है।

मेरी समझ से कन्यादान कोई दान नहीं यह एक अभिशाप है। हमारी अपनी बच्चियों पर स्वयं हमारे द्वारा लगाया गया। इस गुलामी की जंजीर को तोड़े और छोड़े। बहिष्कार करें…और फेंक दें। अपनी बच्चियों को आजाद करें। उन्हें खुलकर जीने का अधिकार दें। उन्हें वस्तु नहीं समझें…

वह आपका हिस्सा है। आपके प्रेम का प्रतीक है। उन्हें सम्मान चाहिए। अधिकार चाहिए… दया और दान नहीं।

पूनम लाल सोशल मीडिया पर विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर अपनी बेबाक लेखनी के लिए जानी जाती हैं। यह आलेख हमने उनकी फेसबुक वॉल से लिया है।

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