तीस तक आते-आते उसने आठ बार गर्भधारण किया और पाँच की माँ बनी !

आँखों के नीचे जमे होते छुआरे से छिलके
और दूध चूस कर स्तन सूखे लूफ्फा के स्पोंज बन गये
साल दर साल एक लकीर थी बर्दाश्त की
वो बडी़ होती जा रही थी और जीवन -उत्सव छोटे।
ठान लिया था कि एक बडी़ लकीर खींचेगी
बर्दाश्त से भी बडी़
कि हो जाये हर भाग्य का बदा छोटा।

उस रात एक और बार जब रेंगते हुए आया अंधेरे में वो हाथ
जिसे कला के हाथ, चेहरा, माथा और केश नहीं पहचानते
जिसे पहचानती थी सिर्फ उसकी जंघाएं
जबकि जनक है वो उसकी संततियों का
आज उसने भी कोण बदला और घूम के धंसा दिया पैर का बिछुआ उसकी जंघाओं की मछलियों पर।
चीख पडा़ वो!

पहले दर्द का अनुभव खुद दर्द से भी कद में बडा होता है ।
क्योंकि उसमें चटकता है अहम् और कई कोणों पर खुलती है दृष्टि !

भन्ना कर बोला
ग्राम देवता की कसम !
छुऊँगा नहीं आज से तुझे और तड़पेगी तू मेरे स्पर्श के लिये
वो बदहवास चिल्ला रहा था !
कला करवट बदले कब के खर्राटे लेने लगी
आज से चैन से सोयेगी।

और यूँ मिला उसको निर्वाण
जब वो बस तीस की थी!

  • जया यशदीप

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