आठ मार्च को महिला दिवस मनाया जाता है। एक हफ्ते पहले से इसकी तैयारियां चल रही हैं और जगह जगह कार्यक्रम हो रहे हैं। गौर करने वाली बात ये है कि महिलाओं के अधिकार की बात करने वाली कितनी महिलाएं हैं जिन्होंने ईमानदारी से किसी महिला का मार्गदर्शन किया है। आज भी हमें सुनने को मिलता है कि औरत ही औरत की दुश्मन होती है।

मैं किसी की शिकायत के उद्देश्य से ये बातें नहीं कर रही हूँ। ये बातें इसलिए कर रही हूँ कि अगर हम बात कर रहे हैं तो उस पर अमल भी करें। कोशिश करें कि अपने आसपास की महिलाओं को जागरुक करें। बड़े-बड़े हॉल या होटलों में भव्य प्रोग्राम कर देने से हर तबके की महिलाओं में जागरुकता नहीं आ जाएगी। कितनी प्रतिशत महिलाएं हैं जो उन कार्यक्रमों में जा पाती हैं। जो जाती हैं, अधिकतर वो महिलाएं होती हैं जो पहले से ही जागरुक और पढ़ी-लिखी समझदार हैं। वाकई जागरुकता की बात करनी है तो छोटी जगहों पर जाकर महिलाओं से बातचीत करने की जरूरत है। बहुत सारी पढ़ी-लिखी महिलाओं को भी महिला दिवस का मतलब नहीं पता कि क्यों मनाया जाता है।

उदाहरण के लिए वसुंधरा सेक्टर 13 में एक बुटीक है जहां मैं कपड़े सिलवाने जाती हूँ – कल मैंने यूं ही उत्सुकतावश पूछ लिया- क्या आप जानती हैं कि महिला दिवस क्यों मनाया जाता है? उन्होंने पूछा- कब है महिला दिवस? मैंने बताया- आठ मार्च को। उन्होंने कहा- नहीं पता दीदी! बता दो… कि क्यों मनाया जाता है? फिर मैंने उन्हें समझाया – महिलाओं के अधिकारों और उनकी दिक्कतों की तरफ ध्यान खींचने के लिए दुनिया भर में यह आठ मार्च को मनाया जाता है। वहां काम करने वाली और भी महिलाओं ने जानने की उत्सुकता जताई। जबकि बुटीक चलाने वाली पढ़ी-लिखी हैं, फर्राटेदार अंग्रेजी बोलती हैं, पर उन्हें ये नहीं पता कि महिला दिवस कब और क्यों मनाया जाता है।

फिर क्या… मैं वहां से आई और मेरा रंग की टीम के साथ पहुँच गई एक बस्ती में। वहां पर महिलाओं से जानने की कोशिश की – क्या आप लोगों को पता है कि महिला दिवस कब और क्यों मनाया जाता है? उन्होंने कहा – क्या होता है महिला दिवस? क्यों मनाया जाता है, हम लोगों को नहीं पता। जैसे शिक्षा के लिए हम कहते हैं कि हर घर, हर बच्चा शिक्षित हो, उसी तरह मुझे लगता है, महिलाओं के अधिकारों पर भी बात करने की जरूरत है। लड़कियों की शिक्षा पर बातचीत हो रही है और वे शिक्षित भी हो रही हैं, पर सामाजिक जागरुकता भी आ जाए और अपने हक का इस्तेमाल करना भी जान जाएं तो जनसंख्या और क्राइम भी कम होगा। ये बात समझी मैंने कल बस्ती में जाकर।

महिलाओं ने बताया – एक तो हम पढ़े-लिखे नहीं हैं, उपर से ये भी नहीं पता कि हमारे अधिकार हैं क्या…। पति जो कहता है वो करते हैं और बच्चा पैदा करते हैं। वहां पर जितनी महिलाएं थीं सिर्फ एक महिला के दो बच्चे हैं… नहीं तो सबके चार से सात बच्चे हैं। मैंने उनसे पूछा क्यों इतने बच्चे पैदा किए? तो उनका जवाब था- क्या करें! जानबूझकर थोड़े ही पैदा करते हैं। पति के साथ सोते हैं और बच्चे हो जाते हैं। मैंने बताया- आप लोगों को गर्भनिरोधक दवाइयां लेनी चाहिए। सरकारी हॉस्पिटल में फ्री में मिलती हैं। उन लोगों ने कहा- उन दवाइयों को खाने से परेशानी होती है। किसी ने कहा- सर चकराता है, किसी ने कहा- पेट निकल जाता है, किसी ने कहा- उल्टी होती है…। फिर मैंने कहा- तो अपने पतियों को कंडोम इस्तेमाल करने के लिए कहो… तो उन लोगों का जवाब कुछ इस तरह था – हम नहीं न लाकर देंगे कंडोम! एक ने कहा- चढ़ाता ही नहीं है कंडोम… मैंने कहा- मनाकर दो… कह दो नहीं सोएंगे तुम्हारे साथ। उन लोगों ने कहा- पति मारने लगेगा। हम सब के पति नशेड़ी हैं, पीकर आते हैं। हम लोग कोठियों में काम करके घर चलाते हैं।

उन लोगों से बातचीत के दौरान सबसे मजेदार बात जो रही वो ये है कि उन महिलाओं को बेटी होने से कोई परेशानी नहीं है। कहती हैं- बेटियां दुख-सुख में काम आती हैं। बेटा तो अपने बाप की तरह नशेड़ी निकलेगा तो हम लोगों का बुढ़ापा मे सेवा कौन करेगा? बेटियां रहेंगी तभी तो करेंगी!

(बस्ती की महिलाओं से बातचीत का वीडियो देखिए इस शुक्रवार मेरा रंग पर)