तुम क्या गये,
जीवन का आखरी पन्ना
न्यूज-पेपर पर छपी एक्सिडेंट की खबर भर रह गया…

घर भर-भर लोग आते रोते-चिल्लाते
मैं डर से सहमे अपने बच्चों को देखकर कभी चुप होती
कभी दुनिया को देख आँसू बहाती

कितना भयावह सैलाब है ये, जो आंगन में भरा जा रहा रोज के रोज
मैं सबके साथ कैसे रो लूँ?

तुम सिर्फ आँसूओं में तो नहीं हो
तुम मेरे बच्चों की आँखों में हो
आज भी मेरे बायें तरफ वाली तकिया पर सर रख सोते हो
अब भी हैं तुम्हारे दो तौलिये छज्जे पर सूखने को पडे़ और कई किताबें सजिल्द सिरहाने पर

हमारे कितने ही अंतरंग क्षणों का सोना पिघलकर बने
मेरे कंगन और बिना घुंघरू की पायल, जिसकी चमक मेरे पांवों में ता-उम्र तुम्हें चाहिए थी…
कैसे उतार दूँ?

दोनों बच्चे मुझे लाचारी से देखते हैं,
पिता खो दिया उन्होंने,
मां भी अब मां-सी कहाँ दिख रही
कल से काम पर जाना शुरु किया

अब दुनिया मुझे पुकारती है
पुष्पांजलि! ये ना करो वो ना करो
और मेरे बच्चे कह जाते हर सुबह
कि माँ तुम बहो! निर्बाध बहो !

  • जया यशदीप

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