हिन्दी साहित्य में फेमिनिज्म या स्त्रीवाद को बेहद गुस्सैल, आक्रामक और रुखे अंदाज में प्रस्तुत किया जाता है। नीलिमा चौहान की किताब पतनशील पत्नियों के नोट्स सबसे पहले इसी प्रचलित धारणा को तोड़ती है। यह किताब बड़ी ही व्यंगात्मक शैली में हमारे मध्यवर्ग में महिलाओं की जीवन शैली और उनकी सोच को सामने रखती है। इसमें ऐसे न जाने कितने प्रसंग हैं जो हर रोज हमारे रोजमर्जा के जीवन में दिख जाते हैं। मगर नीलिमा अपने हर प्रसंग में जहां अपने शब्दों से अपने पाठक को गुदगुदाती और हंसाती हुई आगे बढ़ती हैं, वहीं कुछ सोचने के लिए भी छोड़ जाती हैं।

उनका हर आब्जर्वेशन किसी व्यंगचित्रकार की तरह हमारे सेंस ऑफ ह्यूमर को कुरेदते हुए सोचने के लिए मजबूर कर देता है। इतना तो तय है कि उस प्रसंग को पढ़ने के बाद आप दोबारा वही दृश्य देखेंगे तो एक अतिरिक्त समझ के साथ। नीलिमा की यह समझ हास्य में लिपटी हुई है। उनके नारीवादी रुझाव में कड़वाहट नहीं है और न ही पुरुष वहां खलनायकों की तरह दिखते हैं। बल्कि वे ज्यादा बेचारे दिखते हैं। कुल मिलाकर यह किताब हमारी सोसाइटी के आडंबरों और पाखंडों पर चोट करती है। हमारी बनावट और नकचढ़ेपन या स्नॉबरी को सामने लाती है।

जाहिर है कि नीलिमा की लेखनी से स्त्री-पुरुष या पति-पत्नी के रिश्तों को टाइप्ड के खांचे से बाहर रखने में भी मदद मिलती है। उनका सहज हास्य इस रिश्ते के न जाने कितने पहलुओं को खोलता है। जहां प्रेम, नोकझोंक, साहचर्य और आडंबरों से उपजे हास्य की झांकी मिल जाती है। एक छोटा सा प्रसंग ही काफी होगा –

ट्रायल रूम के बाहर इंतजार का सुख भोगते शौहर बहुत मासूम और उत्साही दिखाई पड़ते हैं।

ऐसे काबिल शौहर उस खाली वक्त को तमीज से बिताने की नियत से जब शोरूम की बाकी खरीदारनियों को निहारते होते हैं तब तो उनकी मासूमियत कहर बरपाती लगती है। क्या कहिये जनाब ! दिलेरी भरी पोशाक की मनमाफिक तारीफ़ की उम्मीद से भरी आंखें। अरमानों भरी रफ्तार। पोशाक फिट आ गई, आ गई की विजय पताका फहराती पति की ओर बढ़ती आती लुगाई। ऐसे जज्बाती आलम में मन में तुरत फुरत कोई बैलेंस्ड जवाब बनाता वह शौहर दुनिया का सबसे बेसहारा जीव जान पड़ता है।

सच सहा न जाए झूठ कहा न जाए।

किताब में ऐसे न जाने कितने दिलचस्प प्रसंग हैं। चलते-फिरते इन्हें हम हर रोज देखते हैं, मगर लेखिका इसे एक नई निगाह दे जाती हैं। कविताओं और चुटकुलों के जरिए पति-पत्नी के किस्से बयान करके हंसाने वाले प्रसंगों को वह इस तरह प्रस्तुत करती हैं कि आप उनके प्रति थोड़े संवेदनशील हो जाएं।

यह किताब न तो विशुद्ध अर्थों में व्यंग है, न ये कहानियां हैं, न निबंध और नही विचारोत्तेजक लेख। ये नोट्स कहीं न कहीं अपनी अराजक शैली के चलते कई विधाओं को छूते हुए चलते हैं। इसीलिए इसकी शैली में कहीं तो आपको किस्सागोई का मजा आने लगता है तो कहीं किसी लेख की तरह आप सोच में डूब जाते हैं और कहीं सिर्फ हंसी छूट पड़ती है।

वे बेहद रेडिकल तरीके से जीवन के हर हिस्से पर निगाह डालती हैं। इस किताब में शायद ही कोई पहलू छूटा हो। यहां तक कि ऐसे प्रसंग भी जिन पर साहित्य में दबी-ढंकी बात की जाती थी। उन्होंने उसे भी हास्य की चाशनी में लपेटकर उसके टैबू को तोड़ दिया है। इसका उदाहरण किताब में वक्ष, ब्रा और माहवारी से जुड़े आलेख हैं। यह भी नीलिमा की शैली का कमाल है कि उन्होंने विमर्श के निषिद्ध समझे जाने वाले इन तमाम विषयों पर बहुत खुलकर अपनी कलम चलाई है, मगर इसकी भाषा से आपको कल्चरल शॉक नहीं लगता, बल्कि आप उनकी बड़ी सफाई और बोल्डनेस के साथ कही गई सटीक बातों के मुरीद होते जाते हैं। एक उदाहरण –

मैं तो एक अदना घरैतिन हूँ जिसे अपने जिस्म से अपने शौहर को नचाना तक नहीं आता। ज़िस्मफ़रोशी और हुस्नफ़रोशी के फ़न से महरूम हम जैसी ख़वातीन अपने तकिए में सुबका करती हैं। अपनी कमतरी पर पछताती होती हैं। बदिकस्मती पर टसुए टपकाया करती हैं।

या फिर –

है कोई ऐसी बेफिक्र बिंदास औरत जो अपने सीने पर पसरते हुए सफेद धारियों के जंगली जाल से खौफ न खाती हो। मिलवाइये किसी ऐसी औरत से जो अपने मांसल उभारों के खो चुके जादू की याद में चुपचाप तड़पती न हो। हाय… आंचल के पर्दे में लदी यह बेज़ार चर्बी और उसके तिलिस्म का आशिक जमाना।

कुल मिलाकर पतनशील पत्नियों के नोट्स हमारे फेमिनिज्म की जमीनी हकीकत बयान करता है। वह किताबी बातों और ख्वाबों और खोखले शब्दों से परे एक ऐसी दुनिया से रू-ब-रू कराता है जिससे हम और आप और लाखों भारतीय स्त्रियां हर रोज दो-चार होते हैं। जरा देखिए –

उड़ना चाहती हूँ। पर घर-कुनबे के पचड़ों, जिम्मेदारियों का क्या हो? इस बोझ को लेकर उड़ी गई हर फ्लाइट में अतिरिक्त ताकत लगानी पड़ती है। कई बार उतनी ताकत लगाने की भी ताकत नहीं होती भीतर।

इन शब्दों पर गौर करिए। इन्हीं शब्दों में पूरी किताब का मर्म छिपा है। तो इस किताब को जब आप पढ़ेंगे तो हर दूसरे पन्ने से गुजरते हुए आपके चेहरे पर मुस्कान आती-जाती रहेगी, मगर जब-जब आप इस किताब को बंद करके रखेंगे या खत्म करते उठेंगे… खुद को ज्यादा संवेदनशील पाएंगे। यही इस किताब की सबसे बड़ी उपबल्धि है। खास बात यह है कि इसे पढ़ने के बाद आपके मन में स्त्री को लेकर प्रचलित धारणाएंँ – जो खास तौर पर बौद्धिक लोगों और मीडिया ने बना रखी हैं- टूटेंगी।

नीलिमा चौहान के लंबे वाक्य और उर्दू का सहज लेकिन बहुत ज्यादा इस्तेमाल एक सामान्य पाठक से थोड़े धैर्य की मांग कर सकते हैं, मगर यदि वे भाषा-शैली के साथ इस अपरिचय की भावना को तोड़ सके तो निःसंदेह यह उनके लिए एक नया अनुभव होगा। वाणी प्रकाशन ने इसे सुंदर ढंग से प्रकाशित किया है। अपराजिता का रेखांकन इस किताब को एक अलग मिजाज देता है।

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  • दिनेश श्रीनेत
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