स्कूल, कॉलेज से लेकर संसद भवन तक छिप कर पोर्न देखा जा रहा है। तब आप दोष किसे देंगे ?

सीधा अभिप्राय है कि जिस प्रवृत्ति को जितना दबाया जा रहा है, वह चोरी-छिपे ही सही पर समाज में भीतर ही भीतर किसी अचिकित्सकीय रोग की भाँति फैलती जा रही है। हम इस मुद्दे पर बात करने से चाहे जितना दूर भागने की कोशिश करें, लेकिन ‘पोर्न’ हमारे समाज का एक सच है।

आज माना जाता है कि पोर्न बलात्कार का कारण या प्रमुख कारणों में से एक है। हिंसक यौन-कल्पनाएँ बलात्कार का कारण हो सकती हैं, यह निश्चित है। हालाँकि इसका कोई वास्तविक प्रमाण नहीं है कि यौन क्रियाओं के सजीव अथवा सुवर्णित दृश्य देखने से हिंसात्मक प्रवृत्तियों को ही प्रोत्साहन मिलता है। लेकिन इस बहस में आंशिक सच्चाईयाँ हैं: ऐसी फिल्में या साहित्य जिसमें स्त्री को एक वस्तु के रूप में दर्शाया गया हो, उनसे स्त्री वस्तुकरण का संभावित परिणाम निकल सकता है। यानी ‘व्यक्ति’ को ‘वस्तु’ की भाँती उपयोग किया जाए जहाँ उसकी भावनाओं, प्राथमिकताओं, इच्छाओं का महत्त्व नगण्य हो। ऐसा व्यवहार स्त्री-पुरुष किसी के भी साथ, व्यक्तिगत और सामूहिक स्तरों पर निंदनीय ही है। इम्मेनुअल कांट अपनी प्रसिद्ध रचना “लेक्चर्स ऑन एथिक्स” (1963,163) में लैंगिक वस्तुकरण पर लिखते हुए, इसे सब समय उपस्थित मानते हैं, “लैंगिक प्रेम व्यक्ति को इच्छा की वस्तु बना देता है, जितनी जल्दी इच्छा शांत होती है उतनी ही जल्दी व्यक्ति वस्तु बन जाता है।”

हमारे देश में इस पर ‘आंशिक’ प्रतिबन्ध है। आई. टी. एक्ट अध्याय ग्यारह, अनुच्छेद 67 के अंतर्गत व्यक्तिगत रूप से पोर्न फिल्मों का सरंक्षण अपराध नहीं है, केवल सार्वजनिक वितरण पर मनाही है। पोर्न फिल्में फैलाने, बेचने, बनाने, वितरीत करने या सार्वजनिक रूप से इनका प्रदर्शन करने पर तीन साल और बाल पोर्नोग्राफी से जुड़े किसी भी मामले में दोषी पाए जाने पर पांच वर्ष की सजा का प्रावधान है। इस सन्दर्भ में प्रश्न उठता है कि यदि सामजिक मान्यता सही है, तब प्रशासन द्वारा इसे ‘पूर्णतः’ प्रतिबंधित क्यूँ नहीं किया जाता ? संभव है कि कुछ ‘लूपहोल’ हमारी पोर्न सम्बंधित संवैधानिक कार्यवाहियों में हैं और कुछ अनावशयक दबाव हमारे समाज में भी है।

2010 में एक मामले की सुनवाई करते हुए बॉम्बे उच्च न्यायालय के न्यायाधीश विजय ताहिलरमानी ने 22 कस्टम अधिकारियों द्वारा उनके घर में पोर्न देखने को ‘अश्लीलता’ की सीमा के बाहर माना। फ़ैसले की सुनवाई में कहा गया कि व्यक्तिगत रूप से ऐसी सामग्री को देखना सामाजिक अश्लीलता का प्रश्न नहीं है।

पोर्न का लुत्फ़ लेने वाला हर व्यक्ति बलात्कारी नहीं होता। लेकिन दृश्य हिंसा का दर्शक पर कोई असर न पड़ता तो फिल्मों के लिए सेंसरशिप का कोई औचित्य न होता। सेंसरशिप का सम्पूर्ण उन्मूलन किसी भी देश में नहीं किया जा सका है। A की तरह XXX का प्रमाणपत्र भी एक तरह की सेंसरशिप ही है। युवावस्था या उस से भी पहले बाल्यावस्था में ऐसी सामग्री के अत्यधिक प्रदर्शन से भी एक प्रकार का जोखिम पैदा हो सकता है। बच्चों या युवाओं में यह भ्रांति हो सकती है कि वास्तव में सम्भोग है क्या! (जारी)

इस लेख की पिछली कड़ियों को यहां पढ़ें – 

दो घटनाएं और पोर्न की दुनिया से रू-ब-रू होना

भारतीय समाज का ‘पर्दादार’ होना अब केवल एक भ्रम है

यह पोर्न क्या है और अश्लीलता क्या है?

  • इस शोधपरक लेखमाला को लिखा है नीतू तिवारी ने, जो इन दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय से डाक्यूमेंट्री फिल्मों के राजनीतिक संदर्भों पर शोध कर रही हैं। उनका यह चर्चित आलेख कथादेश में प्रकाशित हो चुका है। मेरा रंग में हम उनकी अनुमति से इसका पुर्नप्रकाशन कर रहे हैं।

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