#LahuKaLagaan की हकीकत जानना जरूरी है!

Lahu Ka Lagaan

सरकार ने सैनिटरी नैपकिन्स को जीएसटी टैक्स के दायरे में लाने का फ़ैसला किया है. जीएसटी में सैनिटरी नैपकिन पर लगने वाले टैक्स के विरोध में ट्विटर पर #LahuKaLagaan ट्रेंड करने लगा था. ‘शी सेज़’ (she says) नाम के एक ग्रुप ने भी इस कैंपेन को सपोर्ट दिया. इस अभियान में बॉलिवुड की अभिनेत्रियों ने भी हिस्सा लिया. उन्होंने वित्त मंत्री अरुण जेटली से अपील कर रही हैं कि हमारे देश में आज भी बहुत कम महिलाएं क़ीमत ज़्यादा होने की वजह से सैनिटरी नैपकिन्स इस्तेमाल नहीं कर पातीं. ऐसे में इसे जीएसटी टैक्स के दायरे में लाकर आम लोगों की पहुंच से बाहर न किया जाए.

एक आंकड़े के मुताबिक हमारे देश में 355 मिलियन महिलाओं में से सिर्फ 12 प्रतिशत ही सेनेटरी पैड इस्तेमाल करती हैं. ये आंकड़ा महिलाओं को सेनेटरी नैपकिन की उपलब्धता की स्थिति दिखाता है. आज भी गांव में महिलााएं नैपकिन की जगह कपड़े, घास, पत्तों और राख का इस्तेमाल करती हैं और कई रोगों की शिकार हो जाती हैं.

सेनेटरी नैपकिन इस्तेमाल की करने की वजहों में जहां गांव में उनकी अनुपलब्धता एक वजह है वहीं, नैपकिन भी अत्यधिक कीमत भी उसे लोगों की पहुंच से बाहर बनाती है. गांवों बात तो बहुत दूर है शहरों में भी निम्न वर्गीय और निम्न मध्यम वर्गीय महिलाओं के लिए सेनेटरी नैपकिन खरीद पाना आसान नहीं है.

बाजार में मिलने वाले सेनेटरी नैपकिन की कीमतें देखें तो ये सरकार द्वारा जीवनयापन के लिए आवश्यक बताई गई न्यूनतम आय से भी ज्यादा है. एक गरीब परिवार इसका सबसे सस्ता पैक भी खरीद पाने में सक्षम नहीं है. सेनेटरी नैपकिन की कीमतों पर नजर डालें तो मोटे तौर पर यह 20 से लेकर 200 रुपए तक की कीमत में उपलब्ध हैं. एक सामान्य साइज के पैकेट में 6 से 8 नैपकिन होते हैं और इस हिसाब से एक महीने में एक से दो पैकेट इस्तेमाल हो जाते हैं क्योंकि एक ही दिन में न्यूनतम दो नैपकिन की जरूरत होती है.

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नैपकिन के सबसे छोटे साइज की कीमत 20 रुपए, मीडियम साइज के पैड 40 से 50 रुपए में मिलते हैं. वहीं, लार्ज साइज के पैड की कीमत 75 से लेकर 150 रुपए से ज्यादा तक हो सकती है. जो परिवार दिहाड़ी पर चलता है, वहां लड़कियों को इतने महंगे नैपकिन मिल पाना संभव नहीं है. यहां तक मध्यम वर्गीय परिवार की लड़कियां तक लार्ज साइज के नैपकिन नहीं खरीद पातीं. ये स्थिति सेनेटरी नेपकिन के बाजार में आने के 128 साल बाद भी बनी हुई है.

ऐसे में वाकई जरूरत है कि सरकार द्वारा सेनेटरी नैपकिन को सस्ता करने के लिए कुछ उपाय किए जाएं. इनमें नैपकिन से टैक्स हटाना एक उपाय हो सकता है. वर्तमान में कई राज्यों में सेनेटरी नैपकिंस पर 14.5 प्रतिशत टैक्स लगाया जाता है. टैक्स लगने से एक पैक की कीमत 2 से 21 रुपए तक बढ़ जाती है. वहीं, जीएसटी में भी सेनेटरी पैड पर 12 प्रतिशत टैक्स लगाने का प्रावधान किया गया है. जबकि देश में कई ऐसी चीजें हैं जिनकी जरूरत को देखते हुए उन्हें टैक्स फ्री किया गया है.

जैसे कॉन्डम टैक्स फ्री है और उसके लिए वेंडिंग मशीनें लगाई गई हैं. अगरबत्ती, चूड़ियां, सिंदूर, बिंदी, पतंग और लकड़ी के खिलौनों तक को कर मुक्त रखा गया है. नमक पर भी देश मे टैक्स में छूट दी गई है क्योंकि यह एक आधारभूत आवश्यकता जैसा है. जिसका सभी तक पहुंचना जरूरी है. वहीं, सेनेटरी नैपकिन भी महिलाओं के लिए आधारभूत जरूरतों का ही हिस्सा हैं क्योंकि हर महीने उन्हें पीरियड्स के दर्द और असहजता से गुजरना होता है. हालांकि, दिल्ली सरकार इस मामले में आगे आई है और 2017—18 के बजट में 20 रुपए तक के पैड को कर मुक्त रखा गया है. वहीं, इससे ज्यादा कीमत के पैड पर 12.5 प्रतिशत के टैक्स को घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया गया है.

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लेकिन, सिर्फ टैक्स कम करना इस समस्या का बहुत छोटा हिस्सा है क्योंकि टैक्स हटा देने पर भी सेनेटरी नैपकिन की कीमतें काफी ज्यादा रहती हैं. जैसे 75 रुपऐ के पैक पर 18 रुपए टैक्स कम भी हो जाए तो खास अंतर नहीं आएगा. इसके साथ—साथ सेनेटरी नैपकिन का घरेलू स्तर पर निर्माण भी जरूरी है ताकि इनके निर्माण की लागत को कम किया जा सके. इसके लिए स्वेदशी निर्माणकर्ताओं को सरकार की ओर से सहयोग दिया जा सकता है. वहीं, सेनेटरी नैपकिन के लिए जगह—जगह वेंडिंग मशीन भी लगाई जानी चाहिए. स्कूल, कॉलेज और आॅफिस में तो वेंडिंग मशीन होना अनिवार्य होना चाहिए. कई बार अचानक पीरियड्स हो जाने पर महिलाओं को बेहद असहज स्थिति से गुजरना पड़ता है.

साथ ही इस मसले पर जागरुकता लाना बहुत जरूरी है. सालों-साल से महिलाओं की इस आवश्यकता को इतना उपेक्षित किया गया है कि अब वो खुद इस जरूरत का महत्व नहीं समझ पातीं. उन्हें जागरुक करने की जरूरत है कि अगर दूसरे गैर—जरूरी खर्चों पर कटौती कर वह नैपकिन खरीद सकती हैं तो इसे प्राथमिकता दें. इस मसले पर कई स्तर से सरकार और गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा लगातार काम किए जाने की जरूरत है तभी महिलाएं के लिए यह सामान्य शारीरिक प्रक्रिया वाकई सामान्य बन पाएगी.

मैं एक पत्रकार हूं और लगातार महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर रिपोर्ट और आलेख लिखती रही हूं।

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