चाइल्ड एब्यूज़ः मुँह खोलें, बहस करें, खुलकर बात करें!

Child abuse and our society

सरकारी सर्वे के अनुसार भारत में 53% मेल चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज (लैंगिक शोषण) के शिकार होते हैं! शोषण करने वाले अधिकतर घर वाले अथवा पड़ोस वाले होते हैं!

बाल यौन शोषण के मामले में मेल चाइल्ड का शोषण फीमेल चाइल्ड से अधिक पाया गया है! ऐसे तो हर तरह के सेक्सुअल क्राइम्स पर समाज में शातिर चुप्पी रहती है लेकिन बाल यौनशोषण के मामले ये चुप्पी ‘मेल चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज’ पर फीमेल चाइल्ड सेक्स एब्यूज की तुलना में ज़्यादा रहती है! क्यों?

इसलिए क्योंकि मैस्क्युलिनिटी का एक ऐसा पागलपन भरा जाता है हम सबमें कि पुरुष बच्चा मुँह खोले तो कैसे खोले? और मुँह खोलता भी है तो दोस्त लोग सबसे पहले उसी के ऊपर हँसते हैं मानों कि पुरुषों के साथ सेक्सुअल एब्यूज हो ही नहीं सकता! ख़ुद बच्चे के घर वाले भी यकीन नहीं करते हैं….और यकीन कर भी लिए तो चुप करा देते हैं!ऊपर से शोषण करने वाले घर-परिवार वाले होते हैं अथवा वो होते हैं जिनके ऊपर इनका केयर करने की ज़िम्मेदारी होती है जैसे: टीचर, कोच, हॉस्टल का सीनियर इत्यादि! इसके अलावा समाज में अजीबोग़रीब मिथक भी तो हमने बना रखे हैं- कि पुरुषों के साथ भला कौन ज़बरन सेक्स करेगा? कैसा पुरुष है जो ऐसा करते समय रोक नहीं पाया?

कुछ तो ये भी सोचते हैं कि कहीं ये बच्चा ही तो समलैंगिक स्वभाव का तो नहीं है, कहीं आगे चलकर ये भी अन्य बच्चों के साथ ऐसा न करने लगे, कहीं ये समलैंगिक न बन जाये भविष्य में, कहीं आगे चलकर ये ‘उतना’ मर्द न रह जाये जितना इसे होना चाहिए…

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ऐसी मानसिकता और मिथकों में जीने वाले समाज में एक पुरुष बच्चे का अपने लैंगिक शोषण पे मुँह खोलना नामुमकिन सा हो जाता है और वो एक गहरे मानसिक अवसाद में जीता जाता है. कभी कभी अपने ऊपर शक करता है, कभी ख़ुद को ही ज़िम्मेदार मानता है, अपराधबोध से ग्रस्त रहता है!बड़े होने पर कई बार बच्चा अपनी सेक्सुअल लाइफ़ में नॉर्मल नहीं रह पाता क्योंकि ये बचपन का शोषण उसके दिमाग़ में फ़्लैशबैक होरा रहता है! कई बार आत्महंता सोच भी हावी हो जाती है!

प्रायः ऐसा होता है कि शोषण करने वाला उसकी आँखों के सामने ही रहता है क्योंकि अक्सर एब्युज़र घर अथव पड़ोस या रिश्तेदार ही होता है! चूँकि पुरुष बच्चों के साथ कोई शक नहीं करेगा, इसलिए ऑफेनडर फीमेल चाइल्ड के बजाय मेल चाइल्ड को अपना टारगेट बनाता है!

इसलिए अपने बच्चों में इतना भरोसा रखें, उसके इतने अच्छे दोस्त बने कि वो आपसे ऐसी बातें भी बेहिचक शेयर कर सके! चाइल्ड सेक्स एब्यूज अपराध है, इससे शर्म अथवा सेक्सुअल ओरिएंटेशन, इज्ज़त जैसी बातें न जोड़ें! मुँह खोलें, बहस करें, खुलकर बात करें! वरना मैंने ऊपर ही लिखा है कि हर दूसरा बच्चा इसका शिकार होता है.

  • जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से क्राइम अगेंस्ट वूमन पर शोध कर चुके तारा शंकर सोशल मीडिया पर स्त्रियों और बच्चों के अधिकारों पर लगातार मुखर रहते हैं। पेशे से वे दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं। 
एक वैकल्पिक मीडिया जो महिलाओं से जुड़े मुद्दों और सोशल टैबू पर चल रही बहस में सक्रिय भागीदारी निभाता है। जो स्रियों के कार्यक्षेत्र, उपलब्धियों, उनके संघर्ष और उनकी अभिव्यक्ति को मंच देता है।

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