नायकों के पीछे खड़ी ख़ामोश स्त्रियों को कब सम्मान देंगे हम?

हीरो होता कौन है और लोग घोषित किसी को कर देते हैं!

अब विनोद खन्ना को ही लें। पूरी दुनिया में उनकी क्या तारीफ़ें हो रही हैं। लेकिन मुझे लगता है कि अपनी निजी ज़िंदगी में वे एक खलनायक थे। असली नायक रहीं उनकी पत्नी गीतांजलि।

जिस समय विनोद खन्ना आेशो के सम्मोहक सुंदरियों वाले निर्बाध कामनाओं की संपूर्णता के द्वीप में पहुंचे तो घर में आठ महीने का अक्षय और ढाई साल का राहुल था। दोनों बच्चों को कामयाब बनाना और अपने पिता के घर से भाग जाने के बावजूद स्थापित कर देने वाली गीतांजलि से बड़ा नायक कौन होगा? कम से कम, विनोद खन्ना तो नहीं। दुनिया चाहे जो कहे, सच तो सच है और सच ही रहेगा।

प्रणाम है, ऐसी अनाम स्त्रियों को जो एक बूढ़ी सास का पूरा ख़याल रखती हैं, उन्हें 24 घंटे मुस्कुराते हुए रखती हैं, उनकी आवभगत और सेवा-सुश्रूषा करती हैं, लेकिन इस मां के साथ फोटो कोई और बड़ा आदमी खिंचवाता है। माँ की कभी खैरखबर न लेने वाला।

ऐसे कितने ही लोग हैं, जो मां के साथ फ़ोटो और विडियो को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मां के महात्म्य भरे शब्दों के साथ ख़ुद का गौरवगान करवाते हैं, लेकिन अपने ही परिवार की उन स्त्रियों की तारीफ़ में एक शब्द नहीं कहते, जो मां को हर समय अपनी हथेलियों पर रखती अपने दर्द भुला देती हैं। इस तरफ़ कभी कोई मीडिया भी झाँकता नहीं।

हम भले अमिताभ बच्चन को महानायक कहें, लेकिन क्या वह जया भादुड़ी सच्ची महानायक नहीं है, जो अपना कॅरियर छोड़कर अपनी बेटी और अपने बेटे को स्थापित करती हैं? ऐसी कितनी ही नायिकाएँ हैं।

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क्या आपके या मेरे अपने घर की वह स्त्री सच्ची नायक नहीं है, जो दो बच्चों को उनके पिता की हर रोज़ 15 से 20 घंटे की ग़ैरमौजूदगी में अंकुर से पेड़ बनाते अपने आपको होमती है और एक परिवार को पुष्पित और पल्लवित करती है?

क्या उन स्त्रियों को कभी नायक का दर्जा दिया जाएगा, जिन्होंने अपने चूल्हे की आंच से आरएसएस के स्वयं सेवकों की धमनियों में ऊर्जा धौंकी या फिर जो हॉलटाइमर कम्युनिस्टों के लिए चूल्हे जलाजलाकर अपने अांखें फोड़ चुकीं?

क्या इस देश में स्त्रियों की भलाई के नाम पर तूफ़ानी आंदोलन खड़ा करने वाले नेताओं को कभी यह ध्यान आएगा कि उज्ज्वला योजना होने के बावजूद आज भी हमारी गलियों में महानायिकाएं सिर पर लकड़ियों के गट्ठर ढो-ढोकर अपने परिवारों का भरण-पोषण करती हैं, लेकिन कोई सांसद, कोई विधायक, कोई जिला अध्यक्ष, कोई जिला कलक्टर, कोई एडीएम या पटवारी घर से निकलकर उन्हें रास्ते में यह तोहफ़ा नहीं सौंप देता कि लो बहन, तुम हो उज्ज्वला की सच्ची हक़दार!

समाज के अपने मानदंड हैं, लेकिन नायक तो नायक है। यह इंतज़ार रहेगा कि स्त्री कब नायक कही और स्वीकार की जाएगी? कब सीता, द्रौपदी और यशोधरा असली नायक कही जाएंगी?

  • यह लेख हमने पत्रकार, कवि और गद्यकार त्रिभुवन की फ़ेसबुक वॉल से लिया है।

एक वैकल्पिक मीडिया जो महिलाओं से जुड़े मुद्दों और सोशल टैबू पर चल रही बहस में सक्रिय भागीदारी निभाता है। जो स्रियों के कार्यक्षेत्र, उपलब्धियों, उनके संघर्ष और उनकी अभिव्यक्ति को मंच देता है।

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