चूड़ियों की गरिमा तो बनाए रखिये!

अभी कुछ दिनों से ये बड़ा सुनने को मिल रहा है कि जो (सरकार) दुश्मन (आतंकी) को जवाब नहीं दे पा रही है उसे चूड़ियाँ पहन लेनी चाहिए। कुछ लोगों ने भेज भी दी है।

आदरणीय स्मृति ईरानी जी ने भी ऐसा ही कुछ बयान दिया था जब सरकार उनकी पार्टी की नहीं थी, “मैं प्रधानमंत्री जी को चूड़ियाँ भेजना चाहूंगी” ऐसा ही कुछ।

अच्छा?

बचपन से सुनते आ रहे हैं कि चूड़ियाँ मतलब कायरता की निशानी कमजोरी की निशानी। मुहावरों की भी भरमार है। इंसान इसे गाहे बगाहे प्रयोग में भी लाता है, महिलाएं भी…

अब फिर वही बात कि जुबां है तो बोल लो उंगलियाँ है तो लिख लो। दिमाग का कनेक्शन तो वैसे ही जुबां से कटा हुआ है। इतिहास गवाह है (अच्छी लाइन है बहुत जगह काम आती है) हाँ तो इतिहास गवाह है कि चूड़ियाँ पहनने वाले हाथों ने हथियार उठाए हैं और जो काम चूड़ियाँ नहीं पहनने वाले हाथ नहीं कर पाए वो चूड़ियाँ पहनने वालों ने किए हैं।

बोर्डर पर तैनात महिलाएँ चूड़ियाँ नहीं पहनती क्या? या फिर वो सिर्फ तैनात हैं, लड़ती नहीं?

औरतों की इज्ज़त पर हाथ डालने वाले हाथों में तो चूड़ियाँ नहीं होती, फिर वो ताकतवर कैसे हुए?

पब्लिक ट्रांसपोर्ट में ट्रेवल करते वक़्त हम औरतों पर आए हाथों (जिनमें चूड़ियाँ नहीं होती) को तोड़ने और मरोड़ने की क्षमता हमारे यही हाथ (जिनमें चूड़ियाँ होती हैं) में है। ये अलग बात है कि वहाँ ऐसे ‘मर्द’ मौजूद रहते हैं जो चूड़ियाँ नहीं पहनते लेकिन किसी की रक्षा भी नहीं करते। तो तय हुआ कि चूड़ियों को कमजोरी और दुर्बलता का प्रतीक बेवकूफों की जमात द्वारा बनाया गया है।

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क्षत्रिय और राजपूत या कि और भी बहुत सी महिलाओं द्वारा समय समय पर हथियार उठाकर चूड़ियाँ ना पहनने वाले मर्दों की रक्षा भी की गई है। सो ध्यान रहे।

बहरहाल, बाहुबली में अपनी तरफ उठते बिना चूड़ियों के ताकतवर हाथों की उँगलियों को एक चूड़ी पहनने वाले हाथों ने ही काटा है। क्या है ना कि उदाहरण, वो भी ताज़ा दिए जाएं तो ठीक रहता है।

और हाँ चूड़ियों और पायल को बंधन समझकर नहीं आभूषण समझकर पहनती हूँ मैं। उनको बंधन और दुर्बलता की निशानी समझने वाले (इनमें महिलाएँ भी शामिल हैं) जड़ बुद्धि लोगों को जुबां बंद और हाथ बाँध कर थोड़ा आत्म निरीक्षण कर लेना चाहिए। चूड़ियाँ पहनने वाली स्त्री शक्ति ही जननी है। ध्यान रहे।

आपको जिसे कोसना है, कोसिए। चूड़ियों की गरिमा बनाए रखिए।

  • इसे लिखा है भारती गौड़ ने, जो सोशल मीडिया पर विभिन्न मुद्दों पर अपने विचार व्यक्त करती रहती हैं। वे राजस्थान लेखिका साहित्य संस्थान की मीडिया इंचार्ज हैं और स्वयंसेवी संगठन अस्तित्व की काउंसलर रही हैं। वे जयपुर में रहती हैं।
एक वैकल्पिक मीडिया जो महिलाओं से जुड़े मुद्दों और सोशल टैबू पर चल रही बहस में सक्रिय भागीदारी निभाता है। जो स्रियों के कार्यक्षेत्र, उपलब्धियों, उनके संघर्ष और उनकी अभिव्यक्ति को मंच देता है।

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