शुक्रिया! ज़िन्दगी को बटर फ्लेवर वाले पॉपकॉर्न जैसी हल्की बना देने के लिए

Akansha and Sagar

यह खुला खत तो है मगर इसमें बेहद आत्मीय पल और मन के सुंदर कोने हैं। इसमें जितनी हकीकत है, उतना स्वप्न। जितना भरोसा है, उतनी ही उम्मीदें। यह एक बीज है जिसमें जाने कितनी कहानियां छिपी है और कवितायें भी। आकांक्षा सागर और सागर गुप्ता की ये सुंदर रचनाएं उनकी ही तस्वीरों के साथ।

पहले आकांक्षा सागर का ख़त

Akansha and Sagar

अभी-अभी ऑफिस से फोन आया…पतिदेव का। कोई हैंडबैग का अंग्रेजी ब्रांड का नाम लेकर बोले- तुम्हें दिलाऊंगा…।

शायद हर दिन ही ऐसा होता है जब तुम कहते हो- नया जैकेट दिलाऊंगा, नये फुटवियर दिलाऊंगा, अच्छे-अच्छे कपड़े दिलाऊंगा..और जाने क्या-क्या…

मुझे इन सब बातों की कम खुशी होती है जबकि इस बात की ज्यादा कि मैं कितना तुम्हारे ख्याल में रहती हूँ!

स्वभाव से जिद्दी हूँ मैं …बात बात पर चिड़चिड़ाती भी हूँ…गुस्सा भी आता है… पर तुम जानते हो कि कैसे मैं मान जाऊँगी… सर पर हाथ रखकर पूछके या गोद में उठा कर।

रोज की तरह उस दिन भी जब तुम ऑफिस से आकर मेरे साथ खेल रहे थे अचानक बोले- मैं तुम्हें खिलौना मिल गया न? मैं थोड़ी देर शान्त हो गई,सोचने लगी- ये तो बुरा शब्द है।

पर तुम्हें बुरा नही लगता जब मैं तुम्हें बिंदी लगा देती हूँ , लिपिस्टिक लगा देती हूँ या कुछ भी शैतानिया करती हूँ। शायद मेरी तरह तुम भी समझते हो कि फिर से जी रही हूँ मैं…

जी रही हूं… वैसे ,जैसी मैं हूँ!

जब बैठकर मेरे साथ फिल्म देखते हो, दोस्त हो जाते हो! किचेन में साथ में काम करते हुए -मेरी बहिन…! जब नीचे बैठकर मोजे -जूते पहनाते हो तो बचपन वाले मां-पापा हो जाते हो…

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तुम को सब कुछ होना आता है बस पति नहीं…

याद है मुझे। मां ने एक बार कहा था ज्यादा सिर पर मत चढ़ाओ उसे…और तुमने हवा में उड़ाकर कहा- मैं चाहता हूँ चढ़ाना…

मैं भी चाहती हूँ, मुझे मजा आता है तुम्हारे साथ जीने में। किसी बात का डर नही रहता न कोई चिंता..!

अब सागर गुप्ता का ख़त

Akansha and Sagar

तुम्हारी ही शुरू की गयी #खुला_खत_पति_के_नाम श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए ‘एक पति’ का एक ख़त ‘एक पत्नी’ के नाम!

कल की तुम्हारी बात कानों में बहुत देर गूँजती रही “कभी-कभी थोड़ा लड़ना भी अच्छा है, रिश्तों में रिफ्रेशनेस आ जाती है…”

हमारी यहीं बात हम दोनो को एकदूसरे से बांधे रखती है, तुम्हारा मेरे साथ सहज होना और मेरा तुम्हारे साथ। वरना मुझ जैसे बोरिंग आदमी के साथ पटरी बैठना उतना ही मुश्किल है जितना मेरे लिए एक गोल रोटी बनाना है, पर तुम्हें तो गोल रोटी और मेरे साथ पटरी बैठाने, दोनों में महारथ हासिल है।

एक बात कहूँ…तुम्हारे साथ ज़िन्दगी जीने में मज़ा आता है| मैं गाना पहले भी गाता था पर तुम्हारे साथ होने से ज्यादा सहज हो गया हूँ।

किचन में घुसकर बिंदास आटें के डब्बे को लापरवाही से गिरा देता हूँ और सहज होकर कह देता हूँ अरे यार! ये किचन बहुत छोटा पड़ता है। हम दोनों बड़ी सहजता से अपने-अपने एक्स की बातें कर लेते है और उनकी खींच देते है। इन सारी बातों से हम बातों-बातों में उनके लिए बची-खुची खुन्नस भी निकाल लेते है और इसी के बहाने उनकी बिना कहे ले भी लेते है।

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ऐसे बहुत से पल हैं जिसने हमें इतना सहज कर दिया है कि कभी ये लगता ही नहीं हम दो लोग है| तुम्हें घर पर छोड़कर वहां से चला था तो लगा कि अपने साथ “अपने जिस्म को ले आया हूँ, जान वहीं रह गयी”।

तुम्हें आज शुक्रिया कहने का दिल कर रहा ज़िन्दगी को बटर फ्लेवर वाले पॉपकॉर्न जैसी हल्की और मज़ेदार बना देने के लिए!!
शुक्रिया मेरी भार्या..

  • आकांक्षा सागर व सागर गुप्ता की यह रचनाएं हमने उनकी अनुमति से उनके फेसबुक पेज से ली हैं। 
एक वैकल्पिक मीडिया जो महिलाओं से जुड़े मुद्दों और सोशल टैबू पर चल रही बहस में सक्रिय भागीदारी निभाता है। जो स्रियों के कार्यक्षेत्र, उपलब्धियों, उनके संघर्ष और उनकी अभिव्यक्ति को मंच देता है।

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