एक केक माँ के पहले जन्मदिन का…

Mother and baby

“बच्चे के जन्म के साथ ही माँ का भी जन्म होता है…” नानी कितना सही कहती थी !

जब मैं माँ बनी तो कितनी ही छोटी-छोटी परेशानियों को लेकर मौसी को फ़ोन किया करती थी ,खुद को बहुत समझदार और बेहतर माँ बनाने के लिये। अक्सर गिल्ट पाले रहती कि ये गलत क्यों किया… ये यूँ तो नहीं होना था… ये तो और भी बेहतर हो सकता था… मैं क्यूँ नहीं कर पायी वगैरह -वगैरह। अपनी माँ से कुछ ज्यादा नहीं कह पाती क्योंकि माँ अक्सर बच्चों की परेशानियाँ कई असल बात से कई गुना बढा कर देखती हैं और उतना ही फिर दुखी भी हो जाती हैं ।

मैं मौसी को फ़ोन कर खूब रोती कभी-कभी, जब भी लगता कि मैं कुछ ठीक नहीं कर पा रही या कुछ तो गड़बड़ हो गई या कभी यूँ ही उस वक्त के चढते-उतरते डिप्रेशन की रोलर कोस्टर राइड में। मौसी ही याद दिलाती कि नानी क्या कहा करती थी – “बच्चे के जन्म के साथ ही तो माँ का जन्म भी होता है…” कुछ गलतियाँ, कुछ कमियाँ रह भी जाती हैं तो कोई बात नहीं।

मुझे याद है मेरी देवरानी पूरे तीन साल तक, हर दिन दोनों पहर कितना संघर्ष करती थी क्योंकि बेटी दूध ही नहीं पीती थी। पूरा घर देवरानी के पीछे और देवरानी बेटी के पीछे ! एक मिशन सा हो जाता उसको खाना खिलाना और दूध पिलाना। उसे न अन्न पसंद था, न दूध। तो मिला जुला कर परिणाम ये था कि वो एक बुरी माँ थी। बच्चे को खाना पीना तक नहीं सीखा पायी।

जबकि छुटकी को फल ,खीरा , टमाटर और दाल ये सब बहुत पसंद था। उस पर कोई ध्यान नहीं देता था। मुझे याद है जब छुटकी घर आती हम सब टमाटर छुपा कर रख देते और खीरे भी क्योंकि वो सब खाने की जिद करती या दांत तो सब पर मार ही देती। खैर ग्यारह-बारह साल पुरानी बात हो गयी। अब वो एक बेहद ख़ूबसूरत और स्वस्थ टीनेजर है।

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इक नयी माँ को कोई गौर से देखना शुरू करें ,अवलोकन करें तो देखेंगे इस नयी माँ का व्यवहार सामान्य से बहुत अलग हो जाता है क्योंकि आसपास के लोग अचानक बहुत जजमेंटल हो जाते हैं और माँ के मातृत्व के दो तीन साल लोगों को ये समझाने या कहें जतलाने में चले जाते है कि वह एक अच्छी और परफेक्ट माँ है।

नयी माँ की हरकतें कुछ असामान्य सी लगती हैं कई लोगों को , जबकी यह कुदरती व्यवहार (Innate Behavior ) उत्तरजीविता के प्राकृतिक सिद्धांत (Survival Values) से जुडा़ है । इस पैटर्न में कम या ज्यादा की तीव्रता होती है पर होती जरूर है । जैसे किसी ने बच्चे को चूम लिया या कहें होठों में चूम लिया या जूते पहन कर कोई बच्चे के कमरे में आ गया या उसकी दूध की बॉटल जो अभी-अभी उबाल कर रखी है वो किसी ने छू भर ली या पति की जिद की रात को अलग सुलाओ बच्चे को, पालने में या दूसरे बिस्तर पर वगैरह-वगैरह।

प्रतिक्रिया स्वरूप माँ वो पहली सी, नम्र शब्दों को परिस्थिति अनुसार मेनिपुलेट करने वाली मितभाषी स्त्री नहीं रह जाती । वो रिफ्लैक्सेज़ पर काम करने वाली औरत हो जाती है। वो तुरंत चीख पडे़गी… तुरंत रोक लेगी… तुरंत हाथ पकड़ लेगी।यहाँ आपने कुछ किया वहाँ तुरंत प्रतिक्रिया मिली।

वो माँ खुद हैरान है ! ये सब क्या है ? वो किस से कहे? वो हैरान है ! कि प्रसव पीड़ा का असहनीय दर्द जो वो झेल गई। .. देखो ! अभी-अभी भूल भी गई !! अभी तक के सालों में रातों को कोई उसको जगा नहीं पाया। माँ की सुबह की झिड़कियां कि जल्दी जगो, ना पापा की डाँट कि रात को थोड़ा देर तक पढो, ना प्रेमी की झुझलाहट की- “यार !12बजे बाद तुम्हारी केपेसिटी ही नहीं है जगने की… ” , ना पति की परवाह, ” सोनू !! सुबह उठ कर मॉर्निंग वॉक चला करो मेरे साथ। तुम वेट गेन करने लगी हो !”

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किसी की नहीं सुनी! और देखो! ये कौन आया कि सारी रात जग रहे जिनके साथ और दिन की नींद भी इनकी ही दया पर है। चाहें तो सोने दें , चाहें तो जगाये दिन भर भी।

इस सब के बीच एक और सिलसिला होता है सलाह देने वालो का , बिलकुल भी इस पर विचार किये कि माँ का जन्म भी अभी हुआ ।वो बीज अभी-अभी बना है। इससे पहले जो भी वो नेट पर ढूँढ कर पढती थी मातृत्व के बारे में या मैग्जीन में पढती थी या दोस्तों से सुनती थी , वो यूँ ही था जैसे ‘मीठे’ के बारे में सारी जानकारी होना , लेकिन चखा ना हो ! और जब चखा तो क्या व्याख्या कर पाएंगे कि कैसा था!! कुछ यूँ की सत्य के बारे में पढ़ना ,सुनना लेकिन जब नन्हीं सी जान बाहों में आई तो वह सत्य के साक्षात दर्शन करने सा हुआ।

आप अवाक् हैं ! विस्मित हैं ! ये क्या ! ये रो रहा है ! ये टुकर टुकर देख रहा है ! ये तो गोद में आते ही स्वतः स्तनों की तरफ घुम गया है ! अरे! ये तो होठों को गोल गोल घूमा रहा है ! आह! कितना विस्मयकारी है ! …और वो पल जब स्वतः वो नन्हीं सी जान दूध पीने लगती है। कितना दूध खींचना है, कितना मुँह में भरना है, कितना गटकना है!

हे ईश्वर ! इसे तो सब पता है! तब दरअसल हरफनमौला बनकर तो वो नन्ही सी जान आयी है धरती पर। वह सम्पूर्ण है। पैदा तो माँ हुई है। अब सिखने के दिन उसके शुरू हुए।

मूल प्रवृति तो हर स्त्री में है पालन-पोषण की क्योंकि प्राकृतिक रूप से सृजन का दायित्व उसे ही मिला है। लेकिन दुखद यह है कि सहज रूप से प्रकृति द्वारा दिये कई तोहफे संभल कहाँ पा रहे हमसे। कुछ समय पहले एक सर्वे भी पढा था कि भारत के शहरों में इतने बच्चे पैदा नहीं हो रहे हैं जो कि आगे जा कर अपने माता-पिता की भविष्य में रिक्तता की पूर्ति कर पायें।

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सर्वे की बात ना करें अगर अपने आसपास ही देखें तो पायेंगे कि लगभग आधा से ज्यादा जोड़े संतति के लिये संघर्ष कर ही रहे हैं। वो कुछ समय के मेडिकल ट्रीटमेंट के बाद ही माता-पिता बनने का सुख पा रहे हैं या ASD (Autism Spectrum Disorder) की रेंज का मिलना अब बच्चों में कहीं अधिक है । तो प्रकृति ने या कहें हमने (यह अलग विचार का यूं तो प्रकृति ने या कहें हमने (यह अलग विचार का मुद्दा है) कई चीजें बदल दी हैं।

उसमें मातृत्व के पालन-पोषण के स्वभाविक गुण में भी अंतर आया है इसलिए मैंने सीखने की बात कही। और यह इस छोटी सी नानी की कही उक्ति से सरल हो जाती है कि माँ का भी अभी जन्म हुआ है।

जब बच्चे का पहला जन्मदिन मना रहे होतें हैं तो एक केक माँ के पहले जन्मदिन का भी मँगाये !

  • जया यशदीप
मूल निवासी उत्तराखंड। फिलहाल महाराष्ट्र में। रसायन विज्ञान की अध्यापिका। शिक्षा एमएससी आर्गेनिक केमेस्ट्री। 13 से 19 साल के बच्चों से शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ी रही तो इस उम्र के बच्चों के मनोवैज्ञानिक पहलुओं में विशेष रुचि।

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