रोहतक गैंगरेपः चुप्पी समस्या कम नहीं करती, बढ़ा देती है!

Protest against rape

रोहतक में गैंगरेप हुआ है। आरोपी पकड़े जा चुके हैं। छह लोगों ने 23 साल की लड़की के साथ दुष्कर्म किया। फिर उसकी आहारनाल का कुछ हिस्सा नोच कर फेंक दिया, गुप्तांग में धारदार नुकीली चीजे डाली, फिर ईंट से उसका सर कुचला और आखिर में उसे गाड़ी से रौंद दिया।

पढ़कर रुह काँप गई न! निर्भया याद आ गई होगी। गुस्सा आ रहा होगा। सोच रहे होंगे कि आरोपियों को तुरंत फांसी पर चढ़ा दिया जाना चाहिए। होना ही चाहिए ये, मन घृणा और दुःख से भर जाना चाहिए।

लेकिन आपको पता है कि ये आरोपी उस लड़की की पहचान के लोग ही हैं! इतनी कुंठा, दरिंदगी, हैवानियत कहाँ से आती है ऐसे लोगों में। न्यूज़ में ये खबर सामान्य खबरों की तरह आयी है। कोई कैंडल मार्च, धरना प्रदर्शन कहीं कुछ नहीं है और ऐसा क्यों नहीं है इसका जवाब शायद मीडिया के पास बेहतर होगा।

ये सिर्फ एक उदाहरण है ऐसी न जाने कितनी घटनाएं हैं जो संज्ञान में ही नहीं आती। आस-पड़ोस, रिश्तेदार, सगे सम्बन्धी,साथी कर्मचारी ज्यादातर घटनाओं में आरोपी इनमें से ही कोई होता है। हमारा सामाजिक ढाँचा जिम्मेदार है इन घटनाओं के लिए। आप बाहरी व्यक्तियों से बच सकते हैं लेकिन अपनों के रूप में छुपे भेड़ियों का क्या!

हरियाणा की ही एक और घटना जहाँ 10 साल की मासूम बच्ची के साथ सौतेले पिता ने कुकर्म किया, माँ को पता तब चला जब कुछ तकलीफ होने पर बच्ची को डॉक्टर के पास ले गई, जहाँ डॉक्टर ने बच्ची के गर्भवती होने की बात बताई।
पढ़कर शर्म से आत्मा मर गई न! ऐसी ही अनगिनत घटनाएं होती हैं। हम पढ़ते हैं और भूल जाते हैं। जबतक दूसरों के साथ होने वाली अनहोनी, हमारे लिए सिर्फ एक खबर है, कुछ नहीं बदलने वाला,कुछ भी नहीं।

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निर्भया कांड से कुछ नहीं सीखा हमारे समाज ने। हम अब भी वही हैं जहाँ कल थे। हम बस दोष देना जानते हैं कभी सरकार को तो कभी कानून को, खुद के गिरेबान में देखने की हिम्मत नहीं है हममें।

आज भी बलात्कार पीड़िता को किसी अपराधी की तरह ही देखते हैं हम। कभी उसके कपड़ो पर सवाल, कभी उसके व्यवहार पर, तो कभी किसी और बात पर। आज भी बलात्कार पीड़िता को सम्मान पूर्वक जीने का अधिकार नहीं देता हमारा समाज अपितु उसके घावों को कुरेद-कुरेद कर नासूर बना देता है। आज भी स्त्री का अंग विशेष उसके पूरे व्यक्तित्व पर हावी है।

परवरिश का तरीका बदलने की जरुरत है। समाज का रवैया और नज़रिया बदलने की जरुरत है। बच्चों से खुलकर बात करने और उन्हें समझाने की जरुरत है। सरकार ने बहुत सी योजनाएं चलाई हैं पर वो कारगर तब हो सकती हैं जब हम सब योगदान करें। आपको लग रहा होगा ये सब बकवास है, तो सोचिये कब आखिरी बार अपने मासूम बच्चों को गलत टच और व्यवहार के बारे में बताया था आपने?

कब युवा होते बच्चे के साथ सेक्स के बारे में बात कर उसे उचित और सही जानकारी दी थी? कब आपने उन्हें विश्वास दिलाया कि कुछ भी गलत होने पर वो आपके पास आ सकते हैं और बिना उन्हें जज किये आपसे मदद की उम्मीद कर सकते हैं?

जवाब नहीं है ग़र आपके पास तो बदलाव का हिस्सा बनिये। कोशिश करिये, इससे पहले कि आपका कोई अपना ऐसी किसी दुर्घटना का शिकार हो जाये।

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बाकि ये विषय ऐसा है कि इसपर जितना लिखूं कम है। बहुत सारे कारक हैं लेकिन पहले आप अपनी भूमिका सही ढंग से निभाना सीखिए। रोना नहीं, लड़ना और वार करना सिखाइये। खतरे को देख डरना नहीं, चौकन्ना होना सिखाइये। छोटी बातों को नज़रंदाज़ करना नहीं, प्रतिक्रिया देना सिखाइये। याद रखिए चुप्पी समस्या कम नहीं करती, बढ़ा देती है।

  • यह लेख हमें लखनऊ से अंकिता सिंह ने भेजा है।
एक वैकल्पिक मीडिया जो महिलाओं से जुड़े मुद्दों और सोशल टैबू पर चल रही बहस में सक्रिय भागीदारी निभाता है। जो स्रियों के कार्यक्षेत्र, उपलब्धियों, उनके संघर्ष और उनकी अभिव्यक्ति को मंच देता है।

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