सुनो सखा…!

photo courtesy : Narendra Raghunath from Outlook

अब वो कसावट नही रही मेरे स्तनों में,
वो लाल गाल भी चमक खोने लगे,
आंखों में पहले सा तेज नही रहा,
पेट का निचला हिस्सा, जो मैं साड़ी से दिखाती थी, स्ट्रेच मार्क्स से भर गया,
अब हाई हील के लायक पैर नही रहे
कमर पर असर जो पड़ने लगा,

सुनो सखा…
पर पहले से स्थिर हो गयी हूँ,
कभी खुद को संभालने में असहज थी,
अब बच्चो को भी संभाल लेती हूं
बात बात का गुस्सा अब नही आता
छोटी- छोटी बातों पर अब देर सवेर आंख भी नही भरती,
हा, चिक चिक जरूर करती हूं,
बच्चों को जब तुम समय नही देते,
पर उसमें भी अपना कुछ नही मांगती,

सुनो सखा…
सुना है मैंने
40 पार साथी बोरियत महसुस करने लगते हैं
कुछ अफेयर बाहर करने लगते है
खो चुका जो चार्म विवाह में
वो कहीं और तलाशने लगते हैं,

सुनो सखा…
मुझमें वो ख़ासियत खोने लगी
जो तुन्हें कभी दिवाना बनाती थी,

सुनो सखा,
क्या मोहब्बत फिर से हो सकती है..?

  • गीता यथार्थ
एक वैकल्पिक मीडिया जो महिलाओं से जुड़े मुद्दों और सोशल टैबू पर चल रही बहस में सक्रिय भागीदारी निभाता है। जो स्रियों के कार्यक्षेत्र, उपलब्धियों, उनके संघर्ष और उनकी अभिव्यक्ति को मंच देता है।
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11 thoughts on “सुनो सखा…!”

  1. Wah.hay nari tumko naman.tumhere bina ek purash hai berang.tum jaisi bhi ho jis bhi roop main ho hardai se savikar ho.tum bin hum nhi.

  2. An old feminine figure describing the changes in his body caused due to age factor, mentioning the parts which were attracting the attention of the opposite gender. She also describes about the changes in her behaviour due to her old age. But she still needs to be loved , as she was involved in her younger age. A very nice description of a household feminine figure during rolling down of her age , through poetry.

  3. May b the bitter truth but not always ha…… Not everyone have to bear all this…. It’s all about how we are destined……

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