पैगंबर का इस्लाम महिलाओं को पुरुषों से ज्यादा अधिकार देता है…

Muslim Women

पैगंबर मोहम्मद का इस्लाम महिलाओं को पुरुषों से ज्यादा अधिकार देता है। उस इस्लाम में इल्म सबके लिए फर्ज यानी जरुरी कहा गया है। चाहे लड़का हो या लड़की। इस्लाम कहता है इल्म या ज्ञान के लिए जरुरत पड़े तो चीन तक जाएं। यानि हजारों किलोमीटर का सफर तय करें।

उस इस्लाम में महिलाएं मस्जिद में पुरुषों के साथ नमाज पढ़ती थीं। महिला पुरुष के नमाज पढ़ने का तरीका समान था। दुनिया में कोई ऐसी जगह नहीं थी जहां महिलाएं ना जा सकें। ना ही ऐसा कोई काम था जिन्हें करने से महिलाओं को मनाही हो। शादी के लिए लड़के और लड़की दोनों का समझदार होना जरुरी था। दोनों की मर्जी जरुरी थी।

शादी के समय पहले लड़की से पूछा जाता है। ताकि उसे पसंद ना हो तो वह ना कह सकती है। खुला ( तलाक ) लेने के लिए सिर्फ इतना काफी है कि उसे शौहर की शक्ल पसंद ना हो। यदि शौहर खुला ना दे तो है तो वह काजी के पास जाकर भी एक बार कह दें साथ नहीं रहना, तो प्रक्रिया संपूर्ण मानी जाती है। मेहर (शादी के वक्त लड़की पक्ष को दी जाने वाली राशि) का प्रावधान है। पिता और पति की संपत्ति में से पत्नी का भी हिस्सा है। उसके व्यापार करने पर कोई मनाही नहीं है।

बुर्के जैसे कोई चीज कुरान में नहीं है। ना ही पैगंबर मोहम्मद ने इसे लागू किया। सलीकेदार कपड़े पहनने की बात दोनों के लिए है। नबी ने कहा वालिदेन ( माता-पिता) बेटे और बेटी की परवरिश में भेदभाव ना करें। वरना दोजख (नर्क) में जाने का यह कारण बनेगा। पैगंबर तो बेटियों को इतनी इज्जत देते थे की उनकी शान में खड़े हो जाया करते थे। उन्होंने यह भी कहा था यदि लड़की तलाक लेना चाहे तो उससे वजह ना पूछी जाए। जबकि पुरुष सिर्फ एक ही वजह से तलाक दे सकता है जबकि पत्नी चरीत्रहीन हो।

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चरित्रहीनता पता लगने पर पति तीन महीने तक पत्नी को समझाने का प्रयास करे। कुरान के मुताबिक तीन तलाक यही तीन महीने की प्रक्रिया है। एक घर में एक छत के नीचे अपने ही कमरे में साथ रहते हुए प्रक्रिया करनी है। एक महीना यानि एक तलाक। दूसरा महीना दूसरा तलाक। तीसरा महीना तीसरा तलाक। एक साथ तीन क्या तीस हजार बार भी तलाक कहेंगे तो तलाक नहीं होता। खुद पैगंबर ने सही मुस्लिम और अन्य हदीस की किताबों में यह बात कही है। इस बीच यदि दोनों में सुलह हो जाए या शारीरिक संबंध हो जाए तो पूरी तीन महीने की प्रक्रिया फिर से दोहरानी होगी।

अल्लाह को तलाक पसंद नहीं इसलिए वह चाहता है इसमें जल्दबाजी ना हो। जब तीसरे महीने तीसरा तलाक कहा जाए तो दो-दो गवाहों की मौजूदगी हो। लड़का और लड़की दोनों पक्ष के लोग शामिल हों।

बुर्के, पर्दे, तलाक, हलाला, बहुविवाह जैसी कुप्रथाओं ना सिर्फ इस्लाम के साथ मजाक हैं। बल्कि इंसानियत को भी शर्मसार करने वाली हैं। 1937 में बने मुस्लिम एक्ट को अब बदलने की जरुरत है। या तो कुरान के मुताबिक कानून तैयार किए जाएं। या फिर संविधान। पुरुषवादी समाज के अमानवीय कानून नहीं चलेंगे। 21वीं सदी में हर इंसान की तरह मुस्लिम महिलाओं को भी समानता और स्वतंत्रता मिले। उन्हें भी सम्मान और आत्मनिर्भरता से जीने का अधिकार है। जो इस्लाम ने भी दिया है। भारत के संविधान ने भी। वक्त आ गया है अब उसे जमीन पर लागू किया जाए।

सूरे अलमाइयदा आयत नंबर तीन में अल्लाह कह रहा है आज के दिन हमने दीन मुकम्मल कर दिया है। तमाम नेमतें पूरी कर दीं। अल्लाह दीन-ए इस्लाम पर राजी है। सवाल यह है जब कुरान मुकम्मल है तो कुरान के मुताबिक तलाक की प्रक्रिया मानने से धर्मगुरुओं को परेशानी क्यों है? क्या मुस्लिम पर्सनल लॉ कुरान पर आधारित है? क्या मुस्लिम पर्सनल लॉ जिन किताबों से बनाया गया वह वाकई कुरान और पैगंबर की बातों पर आधारित हैं? यदि ऐसा है तो शिया पर्सनल लॉ अलग क्यों है? क्या शिया लोगों का कुरान और सुन्नी लोगों का कुरान अलग है?

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जब कुरान एक है तो कानून एक क्यों नहीं? आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, धार्मिक संस्थाएं और धर्मगुरू जो तीन तलाक, हलाला, बहुविवाह का समर्थन पितृसत्तात्मक समाज की निशानी नहीं है? उन्हें यह अधिकार किसने बनाया? क्या योग्यता है इनके पास? क्या यह वैधानिक संस्थाएं हैं?

एक साथ तीन तलाक का यह कानून जो दूसरे खलीफा उमर ने अपने शासनकाल के तीसरे साल में लागू किया था उसे बंद करने से यह विवादित खलीफा उमर के बनाए अन्य कानूनों पर भी सवाल उठेंगे। क्या इस बात का डर है? डर यह है खलीफा उमर द्वारा महिलाओं को शोषण करने और पुरुषों को वर्चस्व देने वाले कानून बदलने होंगे? जब अन्य धर्मों से कुप्रथाएं हटा दी गई हैं। उन्हें संशोधित कर दिया गया है तो इस्लाम में ऐसा क्यों नहीं हो सकता?

क्या इस्लाम इंसानियत से बड़ा है? इंसानियत का पैरोकार है या इंसानियत का दुश्मन है? धर्मगुरुओं को सोचना होगा वह कौन से इस्लाम के साथ जाना चाहेंगे। महिलाओं ने तो अपना इस्लाम चुन लिया है। जो कुरान और पैगंबर का इस्लाम है। जो खदीजा जैसी महिलाओं को प्रभावित करता है। ना कि खलीफा उमर का वह इस्लाम जो महिलाओं का शोषण करता है।

  • अमरीन खान इंंदौर में पत्रकार हैं और मुस्लिम महिलाओं से जुड़े मुद्दों और तीन तलाक पर सोशल मीडिया में मुखर होकर लिखती हैं।

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