लाल पशमीना

Pashmina

सर्दियाँ शुरू होने को थीं और मोहल्ले के सभी घरों में उसके स्वागत की तैयारी ज़ोरों-शोरों से चल रही थी। कहीं छतों पर कम्बल, लिहाफ और रज़ाई धूप सेंकते नज़र आ रहे थे तो कहीं सारी की सारी जगह ऊनी कपड़ों ने छेंक रखी थी। च्यवनप्राश, आंवले के मुरब्बों और तिल के लड्डुओं के डब्बों ने रसोई में एक बार फिर से अपनी जगह बना ली थी। मोहल्ले में एक घर सिंह साहब का भी था। पेशे से सिंह साहब डॉक्टर थे और वो भी कोई ऐसे-वैसे झोलाछाप डॉक्टर नहीं बल्कि शहर की जानीमानी हस्तियों में उनका नाम शुमार था।

कहने को तो वे डॉक्टर थे किन्तु रोगों से जितना किसी रोगी को डर लगता होगा उससे कहीं ज्यादा स्वयं डॉ. साहब को लगता था। कभी कहीं गलती से एक छींक भी आ जाती तो वह न जाने कितनी अंग्रेजी दवाइयां खा डालते, यहाँ तक की एक दिन की छुट्टी लेकर आराम भी कर लेते। ऐसा लगता था मानो डॉ.साहब को बीमारियों से सख्त परहेज़ था। घर में किसी भी तरह की बीमारी पनपते हुए देखते तो उसे उसकी जड़ से उखाड़ फेंकते। उनकी रहन-सहन की शैली देखकर ही अनुमान लगाया जा सकता था की वे स्वास्थय को लेकर कितने जागरूक थे।

वे प्रतिदिन प्रातः सैर को जाते और व्यायाम से लेकर योग ध्यान में ख़ास रूचि रखते। सही समय पर उठ जाते और सही समय से सो जाते। सदा घर पर बना हुआ भोजन ही ग्रहण करते और भोजन भी ऐसा जिसमे की हर पदार्थ बिल्कुल संतुलित मात्रा में मौजूद हो। दही में कभी गलती से शक्कर ज्यादा गिर जाती तो समझिये उस दिन बेचारी मंजुला जी की शामत ही आ जाती। मंजुला जी सौंदर्य की धनी थी और दुर्भाग्य से सिर्फ यही एक कारण था जिसके चलते उनका विवाह डॉ. सिंह से हो गया था। यूँ तो वे हिंदी से एम.ए. थीं परन्तु कभी भी किसी ने उनके अन्दर अपने विषय को लेकर किसी प्रकार का कोई उत्साह नहीं देखा था। गलती उनकी नहीं थी, वक़्त ही कुछ ऐसा आ गया था। अब बी.ए., एम.ए. जैसी डिग्री को पूछता ही कौन है ? और वह भी जब उनके पति एक जानेमाने डॉक्टर हैं।

पति के अथाह ज्ञान के सामने उन्होंने अपनी मेहनत से अर्जित किये हुए ज्ञान को छुपाना ही उचित समझा। ऐसे ही किन्ही कारणों के चलते वही मंजुला जो कभी अपनी हँसी-मज़ाक से सबका मन मोह लेती थी आज सिर्फ और सिर्फ डॉ. साहब की पत्नी बनकर रह गयी थी। वह उनकी पत्नी से ज्यादा उनकी शिष्या थी। उनकी बताई बातों को ही वह जीवन का एक मात्र सच मानती और उनके बनाये किसी भी नियम का कभी भी उल्लंघन न करती। जब तक डॉ. साहब घर में होते तब तक वह रोबोट बने उनके पीछे-पीछे नाचती रहती।

क्लिनिक जाने के बाद भी डॉ. साहब मंजुला को एक पल के लिए भी न बक्शते। जाते-जाते वह उसे काम की एक पूरी फेहरिस्त थमा जाते। घर के बगीचे की देखभाल से लेकर डॉ.साहब की गाड़ी की मरम्मत की ज़िम्मेदारी का बोझ उसी के सर पर होता था। उसने और डॉक्टरों की पत्नियों को भी देखा था पर उनमे से ज़्यादातर खुद डॉक्टर थीं। वे भी अपने पतियों की तरह का ही जीवन व्यतीत करतीं। दिन भर क्लिनिक में बितातीं और शाम में कोई पार्टी अटेंड करते हुए घर आतीं और खाना खा कर सो जातीं।

मंजुला डॉ.साहब के साथ उनके सभी स्वास्थय संबंधी कार्यक्रमों में जाती और बहुत प्रयास करती की उसमे मन लगाये पर इतने वर्षोंपरांत भी उसका मन उन पार्टियों और कार्यक्रमों में ज़रा भी नहीं लगता था। उसके जीवन में सुख का एक ही स्त्रोत था और वह थी उसकी बेटी आर्ची। आर्ची स्वभाव से ही बड़ी मनचली बच्ची थी। वही थी जो कभी कभार डॉ.साहब के बनाये नियमों को तोड़ देती और मंजुला के ह्रदय को संतोष से भर देती। वह अपनी माँ के स्वभाव को समझती थी बल्कि कहा जा सकता है की वह काफ़ी हद तक मंजुला की तरह ही थी। हँसी ठिठोली करना उसे खूब आता था। अपने इसी गुण से वह उस घर को घर बनाये रखती। उस दिन भी दोनों माँ बेटी छत पर बैठी धूप के मज़े ले रही थी और ख़ास बात यह थी की डॉ.साहब किसी काम से शहर से बाहर गए हुए थे। बहुत दिनों बाद मंजुला को अपनी आजादी कुछ दिनों के लिए ही सही पर वापस मिल ही गयी थी।

मंजुला आराम से चटाई पर लेटे हुए आर्ची की मनगढ़ंत कहानियाँ सुन रही थी की तभी एक फेरीवाले की आवाज़ सुनाई पड़ी। आर्ची भाग कर रेलिंग से नीचे देखने के लिए दौड़ी पर मंजुला अब भी वहीं लेटी रही। उसे अपने एक अरसे बाद मिले इस आराम में किसी तरह का कोई विघ्न बर्दाश्त नहीं था। आर्ची दौड़ कर आती और बताती की फलाना आंटी ने लाल रंग की शाल ली और बगल वाली आंटी को तो फेरीवाले ने एक खूबसूरत ऊनी सलवार कमीज़ बड़े सस्ते दाम में दे दी। देखते ही देखते मोहल्ले की सारी औरतें वहाँ जमा हो गयीं और फेरीवाले से मोलभाव करके अपनी पसंद की शाल और कमीजें खरीदने लगीं।

इसे भी देखेंः  कामसूत्र, नटराज सिनेमा और हम लड़कियां

उस शोरगुल ने मंजुला को अधीर कर दिया था। वह मन ही मन सोचती की किस मनहूस घड़ी में ये फेरीवाला यहाँ आ पहुंचा। वहाँ नीचे से मोहल्ले की औरतें आर्ची से कहतीं की अपनी मम्मी को बोलो वह भी आ कर कुछ ले लें। पर मंजुला कहाँ सुनने वाली थी। वह गुस्से में उठी और आर्ची को आवाज़ देते हुए सीढ़ियों से नीचे उतरकर अपने कमरे में चली गयी। ऐसा बिल्कुल नहीं था की उसका मन नहीं था बाहर निकलकर खरीददारी करने का। मोहल्ले की सभी औरतों की चहकती हुई आवाज़ सुनकर ही वह बेचैन हुए जा रही थी पर डर तो था ही और वह भी वही पुराना डर।

दरसल डॉ. साहब को ये फेरीवाले और उनके सस्ते कपडे ज़रा भी रास नहीं आते थे। उनका मानना था की कपड़े कम ही हों पर अच्छे किस्म के ब्रांडेड। वह अगर सुनते की मंजुला ने फेरीवाले से कपड़े खरीदें हैं तो वे उस पर खूब नाराज़ होते और उसे मुर्खाधिराज कहकर पुकारने लगते जैसा की वह हमेशा छोटी से छोटी बात पर करने लगते थे। मंजुला अपने इस अपमान को हमेशा ही सहन कर लेती थी। वह बोलती भी तो क्या ? वे फिर भी उससे उलझते रहते और तब तक शांत न होते जब तक की उन्हें यकीन नहीं हो जाता की मंजुला ने आखिरकार अपनी गलती मान ली है। इस पूरी प्रक्रिया को समझते हुए मंजुला शुरू से ही चुप्पी धारण कर लेती। अगर उसके हार मान लेने से ही घर में शान्ति बनी रह सकती थी तो उसे ऐसा करने में कोई आपत्ति नहीं थी । पर संयोगवश आज तो डॉ. साहब घर पर थे ही नहीं और न ही वे अगले तीन चार दिनों में घर आनेवाले थे ऐसे में थोड़ा अपने मन की कर लेना में क्या ही हर्ज़ था ? जैसे ही आर्ची ने माँ से अपनी लिए कमीज़ खरीदने की ज़िद की मंजुला तुरंत मान गयी।

आर्ची को मंजुला का बर्ताव कुछ अटपटा लगा। उसे लगा की उसका ज़िद करने का फैसला ही गलत था। मंजुला के मन के भावों से अनभिज्ञ आर्ची को लगा की अगर वह प्यार से ही एक बार कह देती तो मंजुला तुरंत मान जाती। इस जादू को आर्ची समझ नहीं पायी पर उसे समझकर करना भी क्या था। उसका काम तो बन गया था। मंजुला कुछ रुपये हाँथ में लिए तेज़ी से मोहल्ले में भागी पर उसे वह फेरीवाला जाता दिखाई दिया। उसने उसे आवाज़ दी पर शायद अरसों से दबी हुई उस आवाज़ में अब इतनी ताकत भी नहीं बची थी की वह कुछ कदम दूर उस फेरीवाले तक भी पहुँचती। पर आर्ची उसके पीछे दौड़ गयी और उसका हाँथ पकड़कर उसे लगभग खींचते हुए अपने घर तक ले आई। मंजुला ने युवक से विनती की की वह एक बार फिर से अपना गठ्ठर खोलकर उसे भी कुछ कमीजें दिखा दे।

फेरीवाला एक कश्मीरी लड़का था। उसका रंग दूध जैसा सफ़ेद और आँखें गहरी काली थीं। जितना सुन्दर वह देखने में था उतनी ही सुन्दर उसकी आवाज़ भी थी। उसने तुरंत कहा – “इसमें विनती की क्या बात है दीदी ! लो मैं अभी खोले देता हूँ। तुम्हें जो पसंद आये तुम बस बता देना और दाम की चिंता तो बिल्कुल मत करना। “

मंजुला सोचने लगी की क्या ऐसे भी कोई व्यापार करता है ? उसे वह फेरीवाला बच्चे जैसा ही लगा। उसने सोचा चलो अच्छा है खूब सस्ते में कपड़े ले लूंगी। उसका सारा बंधा माल कुछ ही देर में तितर-बितर हो गया। सब देखते परखते आखिरकार मंजुला ने आर्ची के लिए एक गुलाबी और एक पीली रंग की कमीज़ पसंद की। फेरीवाले ने उसका दाम चार सौ बताया। मंजुला को वैसे तो रकम ज्यादा नहीं लगी फिर भी उसने बस यूँही कह दिया की दो सौ से ज्यादा न दूंगी। मंजुला की बात सुनकर फेरीवाला कुछ उदास सा हो गया। फिर भी उसने कुछ नहीं कहा, दुकानदारों की तरह कोई झगड़ा नहीं किया। सिर्फ इतना ही कहा – “ठीक है दीदी। जैसा भी आपको ठीक लगे। “

मंजुला उसकी बात सुनकर हैरान हो गयी। उसे लगा की अगर यह ऐसे ही माल बेचता होगा तो इससे इसे फायदे में मिलता ही क्या होगा ? उससे रहा नहीं गया और उसने पूछ ही लिया – “भैया क्या तुम सभी को उनकी मुंहबोले दाम पर अपना माल बेच देते हो ?”

फेरीवाला – “ दीदी मेरे घर में ये कढाई का काम बरसों से होता चला आ रहा है। मेरे अब्बा तो रहे नहीं पर अम्मी और बहन हैं। हम तीनों से जितना हो पता है हम उतना माल तैयार करते हैं और मौसम आने पर गठ्ठर लेकर इधर यू.पी. में बेचने चले आते हैं। महीने भर में माल बेचकर वापस कश्मीर चले जाते हैं। मैं अपने आप को कलाकार मानता हूँ। मुझे फेरीवाला या दुकानदार कहलाने में ज़रा भी ख़ुशी नहीं होती है। मुझे ये दाम की चिक-चिक ज़रा भी पसंद नहीं। मेरी जितनी भी कमाई होती है उसमे मेरा गुज़र-बसर हो जाता है। सिर्फ दुःख इस बात का होता है की क्या मेरे हुनर का सचमुच इतना कम दाम है ?”

इसे भी देखेंः  ये उन लड़कियों की कहानी है, जिनका नाम है रोज़ी!

उसके यह बोलते ही मंजुला ने कमीजों पे की गयी कढ़ाई को ध्यान से देखा। वह सचमुच तारीफ़ के काबिल थीं। उसे उस बच्चे के लिए सचमुच बुरा लगने लगा। उसने मुस्कुराते हुए पूछा – “ आपका नाम क्या है कलाकार महोदय ?”
फेरीवाला कुछ शर्मा-सा गया – “मुझे फरहान कहकर पुकारते हैं सब। “

मंजुला – “तो फरहान जी आप सचमुच बढ़िया कलाकार हैं और आपकी कारीगरी तो बेहद खूबसूरत है। अब चूँकि आपने मुझे दीदी कहा है तो मेरे बात सुनिए। आप इस बात से दुखी क्यों होते हैं ? अब आपने खुद ही उसका दाम लगा दिया है तो वह उतने में बिक ही जाएगी। आपको तो खुश होना चाहिए की आपका सारा माल बिक जाता है इसका मतलब की लोग उसे पसंद कर रहे हैं। अब उसका मूल्य तय करना तो आपके ही हाँथ में है। आप चाहें तो उसे कम दाम में न बेचें। “

मंजुला की यह बात सुनकर फरहान एक बार फिर से मुस्कुराने लग गया। बच्चे जैसा उसका मन फिर से प्रफ्फुलित हो उठा। वह काफ़ी देर तक मंजुला से बातें करता रहा और शाम ढलने के बाद चार सौ रुपये लेकर वहाँ से चला गया।
उस दिन मंजुला कुछ ज्यादा ही खुश थी। बहुत समय बाद उसने उस पुरानी मंजुला के स्वर में किसी से बात की थी। असल में मंजुला अपने माता-पिता की एकलौती संतान थी। उसे हमेशा ही यह इच्छा होती की उसका भी कोई भाई या बहन हो। परन्तु नियति को शायद उसकी इस इच्छा की पूर्ति में ज़रा भी दिलचस्पी नहीं थी।

इतने सालों बाद ही सही पर किसी ने उसको ‘दीदी’ कहकर पुकारा यही सोच सोचकर वह खुश हुए जा रही थी। कितनी तमन्ना थी उसकी की उसका भी कोई भाई हो। फरहान ने उस चोटिल ह्रदय पर कोई मरहम नहीं लगाया था, वह तो सिर्फ एक अनजान स्पर्श की भाँती था, जिसने सिर्फ उस चोट को सहला भर दिया था। पर इस सुकून की व्याख्या कर पाना शायद मंजुला के लिए भी संभव नहीं था।

कुछ तीन चार दिन बाद डॉ.साहब वापस लौट आये और उस दिन आर्ची ने फरहान से खरीदी हुई वही गुलाबी ऊनी कमीज़ पहन रखी थी। वह अपने पिता के घर लौटते ही ख़ुशी से चहकती हुई उनकी गोद में चढ़ गयी। डॉ.साहब जैसे

सख्त व्यक्ति भी प्रेम की सरल फिर भी अत्यंत कठिन भाषा के शब्दों को समझने का प्रयास करते हैं , उस क्षण इस बात को प्रत्यक्ष रूप में देखा जा सकता था। उन्होंने चेहरे पर मुस्कराहट बिखेरते हुए कहा –“अरे वाह बिटिया रानी आप तो बड़ी प्यारी लग रहीं हैं। ये गुलाबी कमीज़ तो खूब जंच रही है। “

यह सुनते ही मंजुला का दिल बैठने लगा। वह डर रही थी की कहीं वह ये न पूछ लें की ये कमीज़ आई कहाँ से। उसने आर्ची की तरफ चुप रहने का इशारा किया। आर्ची भी समझदार थी। वह माँ के डर को तुरंत भांप गयी। उसने अपनी प्यारी और तीखी आवाज़ में चहक कर कहा – “हाँ नानी ने मुझे ऐसी एक और कमीज़ भी दिलाई है। “

और वह जल्दी से अपनी पीली कमीज़ भी लेकर आ गयी। डॉ.साहब को दोनों ही कपडे बहुत पसंद आये। उन्होंने तुरंत कहा – “मंजुला मानना पड़ेगा की तम्हारी माँ की पसंद तुमसे कहीं बेहतर है। “

मंजुला इस ताने के बावजूद मुस्कुरा रही थी पर उस मुस्कराहट के कारण का अंदाजा डॉ.साहब के तेज़ दिमाग को कभी नहीं लग सकता था।

इस बात को हुए लगभग एक माह बीत गया। आर्ची जब भी उन कमीजों को पहनती, वे मंजुला को फरहान की याद दिलातीं। मंजुला दिन में एक से दो बार तो फरहान को याद कर ही लेती। दोपहर में अक्सर छत पर आर्ची को लेकर बैठती और जैसे ही किसी फेरीवाले की आवाज़ उसके कानों में पड़ती वह फ़ौरन आर्ची को रेलिंग की तरफ दौड़ा देती और कहती –“जा देख कहीं फरहान तो नहीं आया ?”

आर्ची भी खुश होकर जाती और फिर मायूस होकर लौट आती।

रविवार का दिन था। डॉ.साहब भी घर पर थे। मंजुला के लिए रविवार सप्ताह के और दिनों से ज्यादा मुश्किल होता था। उस दिन तो उसे ऐसा लगता मानो जैसे डॉ.साहब हफ्ते भर का अटका काम उससे ख़त्म करवाने के लिए ही घर में हों। वह दोपहर का भोजन परोसकर बैठी ही थी की गली में वही सुरीली आवाज़ गूंजी –“कश्मीरी शाल और कमीजें ….मोहतरमा नीचे तो आइये, अपनी ख्वाहिश तो बताइए, जो भी पसंद आ जाये, अपने मुंहबोले दाम पर ले जाइये। “

उसकी पंक्तियाँ सुनकर मंजुला की दबी सी हँसी थोड़ी सी जगह बनाते हुए आखिरकार अधरों पर आ ही गयी। पर शायद डॉ.साहब को यह आवाज़ कुछ अच्छी न लगी। वो मेज़ पर बैठे बैठे ही बडबडाने लगे – “ये साले कश्मीरी ! खाते हमारा हैं और जी हुजूरी उनकी करते हैं। मैं कहे देता हूँ इन सालों से कुछ लिया तो। क्या पता आतंकवादी हो ! घर में घुसकर मारकाट ही कर डाले तो ? ये किसी के सगे नहीं होते। तुम सुन रही हो न ?”

पर मंजुला कहाँ सुन रही थी। उसे तो फरहान के मुँह से वह एक शब्द सुनना था। वह रसोई का दूसरा दरवाज़ा जो की बाहर बगीचे की ओर खुलता था,उससे निकलकर बगीचे से होते हुए गेट पर पहुँच गयी। फरहान उसके गेट पर ही खड़ा आवाज़ लगा रहा था। मंजुला को देखते ही वह खुश हो गया और कुछ बोलने ही जा रहा था की मंजुला ने उससे धीमे स्वर में बोलने को कहा। वह कारण नहीं जानता था पर मंजुला की बात तो वह अकारण भी मान लेता, इतना ज़रूर जानता था।

इसे भी देखेंः  'लिपिस्टिक अंडर माई बुर्का' में ये कैसा महिला सशक्तिकरण है?

उसने अपने पहने हुए स्वेटर के नीचे से एक अख़बार में लपेटा हुआ तोहफा निकाला और मंजुला के हाँथों रख दिया और बोला –“ दीदी आज मैं कश्मीर वापस जा रहा हूँ। कई बार तुमसे मिलने की सोचा पर हिम्मत नहीं जुटा पाया। तुम क्या सोचोगी इस बात से ही डर जाता था। लेकिन तुमसे मिले बिना लौट जाना…… बस इसीलिए आज चला आया। ये तोहफा है तुम्हारे लिए। अब तो मैं अगले साल ही आ पाउँगा तब तक तुम इसे खूब इस्तेमाल करना। आऊंगा तो तुम्हारे लिए फिर कुछ ले आऊंगा।”

मंजुला स्तब्ध खड़ी उसे बस निहारे जा रही थी। कुछ बोलना चाहती थी लेकिन जैसे भाषा बोलना ही भूल गयी थी। वह जाने लगा तो उसे कुछ रूपए देना चाहती थी पर उसने एक पैसा भी न लिया। शायद एक रिश्ते से अनमोल इस दुनिया में कुछ भी नहीं होता और शायद रिश्तों की कोई मर्यादा भी नहीं होती…

वह मुस्कुराकर चला गया और मंजुला उस तोहफे को अपनी शाल में छुपाये रसोई में वापस आ गयी। वह वापस आई तब भी डॉ.साहब का कश्मीर विरोधी भाषण चल ही रहा था। ऐसा लगता था मानो उन्हें किसी श्रोता की आवश्यकता ही नहीं थी। खाली समय पाकर मंजुला ने उस तोहफे को खोला। वह एक बेहद खूबसूरत पशमीना का शाल था। बिल्कुल चटख लाल रंग का और शाल के किनारों पर बहुत महीन और जटिल कारीगरी की गयी थी। मंजुला ने उस शाल को सीने से लगा लिया। उसमे से इत्र की बड़ी सौंधी खुशबू आ रही थी, जो उसकी हर सांस के माध्यम से ह्रदय तक पहुंचकर उसे हर क्षण एक सुकून का अनुभव कराती।

मंजुला ने उस शाल को खूब ओढा। उसे वह शाल ओढ़े जब भी कोई देखता तो तारीफ़ किये बगैर न रह पाता। पर उसे वह शाल कहाँ से मिली या किसने दी, इस सवाल का वह कभी भी कोई जवाब नहीं देती। एक मधुर मुस्कान बिखेरती हुए बोलती – “ आपको आम खाने से मतलब है या गुठलियाँ गिनने से !”

उसकी इस बात का अर्थ कोई नहीं समझ पाता था यहाँ तक की डॉ. साहब भी नहीं। कई बार पूछते फिर खीजकर रह जाते। खैर फरहान के उस तोहफे ने मंजुला की हाज़िरजवाबी उसे फिर से लौटा दी थी। और वह उसे जब भी ओढती बस यूँही खुश हो जाती।

गर्मी आ कर चली गयी पर उसने उस शाल को कभी भी बक्से में बंद कर के नहीं रखा। वह हमेशा उसकी आँखों के सामने रहता। सर्दियाँ फिर लौट आयीं और उनके साथ फरहान के लौटने के दिन भी। मंजुला बेसब्री से सर्दियों के लौटने का इंतज़ार कर रही थी, वे अपने साथ उसके भाई को जो ले आनेवाली थीं !

इस बीच रोज़ टीवी और अखबारों में कश्मीर में हो रहे दंगों की खबर छपती। डॉ. साहब उन्हें बड़े चाव से पढ़ते और कश्मीरियों को दो-चार गालियाँ देकर अपनी राष्ट्रवादी भावनाओं को संतुष्ट करते और क्लिनिक चले जाते। पर मंजुला बेचैन हो चली थी। वह उन खबरों को बार-बार पढ़ती, उनमे मरने वालों का नाम खोजती और घायलों की तस्वीरों को गौर से देखती।

एक सुबह आर्ची के स्कूल जाने के बाद मंजुला उसका कमरा ठीक कर रही थी की उसे आर्ची के तकिये के नीचे अखबार का एक मुड़ा हुआ पन्ना मिला। उसने उसे खोला तो उसमे एक तस्वीर छपी थी और खबर दंगों में मरनेवालों से सम्बन्धित थी। उसने खबर को सिर्फ एक झटके में देखा पर तस्वीर से अपनी नज़र न हटा सकी। वह उसे हाँथ में लिए वहीं बैठी रही। उसे न साँसों की खबर थी, न शरीर की, न देश की, न काल की…

वह एक दिन था और आज का दिन है मंजुला और आर्ची की हर रोज़ की प्रार्थना में एक प्रार्थना यह भी होती है की कुछ लोगों की राजनीति में हर रोज़ मरने वाले निर्दोषों की आत्माओं को ईश्वर शान्ति दे और…

ईश्वर करे की वह तस्वीर जो उस दिन उस अखबार में छपी थी वह फरहान की न हो। वह हँसता मुस्कुराता फरहान एक बार फिर उस गली में लौट आये और उनके ह्रदय को एक बार फिर अपने कोमल स्पर्श से तृप्त कर दे।

कभी-कभी एक मुलाक़ात, एक आस ही काफ़ी होती है…

  • यह दिल को छूने वाली कहानी हमें भेजी है मीनल ने। यह उनकी पहली प्रकाशित रचना है। मीनल गुप्ता जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में जर्मन भाषा की विद्यार्थी हैं। 
एक वैकल्पिक मीडिया जो महिलाओं से जुड़े मुद्दों और सोशल टैबू पर चल रही बहस में सक्रिय भागीदारी निभाता है। जो स्रियों के कार्यक्षेत्र, उपलब्धियों, उनके संघर्ष और उनकी अभिव्यक्ति को मंच देता है।

28 thoughts on “लाल पशमीना”

    1. Thank u so much. I m glad that my story was strong enough to touch your heart. Thank a lot for sharing your comment. 🙂

  1. Really beautiful story ….. Very nicely expressed ….. Brilliant command over language
    Kind of textbook story which we used to read in our schools

  2. Wow Meenal. Congratulations. It’s such a beautiful story. Your litrary contribution to nationalism debate is adorable. Keep writing. Good luck. God bless you.

    1. Thank u dear Shivani. I think v hv already talked about it on FB…so once again a big thanx to u for sharing the story with so many other ppl. I m still getting likes and comments from lots n lots of readers. Ty 🙂

  3. Too good Meenal..the context is so different n specific…it throws light on humanism…after reading ds story m touched..congratulations dear..best wishes for ur next stories…👍😊

  4. अनमोल रिश्ते पर बेहतरीन कहानी के लिए बहुत-बहुत बधाई.

  5. Pingback: मुक्तिबोध की कविता नए भारत की खोज है: रामजी राय | Gorakhpur News line

Leave a Reply