उनका हर कश समाज को थप्पड़ मारता है

Widow who smokes

नाम काल्पनिक है पर सुना है उनके बारे में। वो बाल विधवा थीं, तो ज़ाहिर है  समाज के लिए लगभग कूड़ा-करकट के बराबर थी। ना किसी से कुछ लेना ना कुछ देना। अपनी ज़िन्दगी घसीट रही थीं ससुराल में। छोटी उम्र में शादी हुई थी तो उन्हें पता भी नहीं था कि भाग्य ने क्या खिलवाड़ किया है उनके साथ।

बच्चे के रूप में वैधव्य साधारण गुज़रा लेकिन जैसे जैसे यौवन करीब आ रहा था, उनका दुर्भाग्य घृणा की पराकाष्ठा पाने को आतुर था। वैसे तो यौवन की अवस्था बाकि अवस्थाओं की तरह सुन्दर होती है लेकिन रत्ना  दाई  के लिए अभिशाप थी।

समय ने उस अबोध की काया बदली और दुर्भाग्य की नीच नज़र पड़ गई। पहले दुर्भाग्य पिता सामान ससुर का शरीर धारण करके आया और उसने जितना हो सका उतना भोगा उस अबोध का शरीर। फिर दुर्भाग्य शरीर बदले कभी देवर तो कभी कोई परिवार के किसी और पुरुष का रुप रख-रखकर सामने आता रहा।

छुप-छुप कर कई बार गर्भपात कराया गया। मायके आई किसी त्यौहार में और ख़ामोशी से त्यौहार गुज़र जाने दिया लेकिन थोड़ा भी सुख मिल जाए तो अपने साथ रहने वाले दुखों का अहसास ज़्यादा हो जाता है इसीलिए जब वापस नर्क जाने का समय हुआ तो वो निर्जीव भी तड़प उठी। ईश्वर को भी शायद दया आ गई उन पर और दे दिया हिम्मत का शस्त्र हृदय में।

उस चलती फिरती चिता ने अपना निर्णय सुनाया कि मुझे यहीं रहने दो… भले ही दासी सामान या मरा हुआ शरीर ले जाओ। ऐसे आत्मदाहक निर्णय की वजह जानकर उस दिन माता-पिता का मन भूचाल हो गया, चित्त  भी फटा होगा, भगवान के घर में शिकायतों का सैलाब भी बहाया गया होगा। मना कर दिया गया नर्क के दूतों के साथ बेटी को भेजने से।

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जो समाज़ किसी स्त्री के किसी कदम उठाने पे बलत्कृत महसूस करता था, भुजाएँ वीरता और शौर्य का प्रतीक बन जाती थीं, उससे एक ही परिवार के कुछ पुरुषों को घसीट के गाँव की पंचायत तक ना  लाया जा सका। किसी के मुंह से हाय तक ना निकली। जिस समाज का गैर जातीय या विधवा विवाह से बलात्कार हो जाता था उस समाज की आबरू को आंच तक नहीं आई थी।

समाज  के कुछ विद्वान ठेकेदारों ने अपना ब्रम्हास्त्र चलाया- मौन का, बदनामी का डर दिखा कर सबके मुँह पर ताला डाल दिया गया। लेकिन कुछ ताले खराब निकल गए। खैर टाइम  के साथ सब बदल गया। रत्ना दाई मायके में रहने लगी और शायद कानून की मदद से उनको अपने पति का हिस्सा या मायके वालों की तरफ से इतनी जायज़ाद मिल गई की वो ज़िंदा रह सके।

लेकिन उनकी दुर्दशा ने उन्हें आत्मनिर्भर और मलंग बना दिया था। फुल हिप्पी स्टाइल  ज़िन्दगी हो गई थी। गांव की विधवा गैंग में शामिल थी और गांव  प्रपंच में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती थीं। लड़ाई करने में भी डिग्री ले ली थी। नशा करतीं, बीड़ी पीतीं। मैंने अपनी ज़िन्दगी में पहली बार किसी बुढ़िया को स्मोकिंग करते देखा था। मैंने उन्हें कश पे कश लगाते हुए देखा है ; शायद उनको समाज की औकात पता चल गई थी इसी लिए उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता था। उनका भी देहान्त हो चुका है लेकिन आज भी याद करने पर उनका हर कश समाज को थप्पड़ मारता सा दिखता है।

  • पूजाश्री गौड़ ब्लॉगर हैं और ब्रॉडकास्ट मीडिया से जुड़ी हैं। 
एक वैकल्पिक मीडिया जो महिलाओं से जुड़े मुद्दों और सोशल टैबू पर चल रही बहस में सक्रिय भागीदारी निभाता है। जो स्रियों के कार्यक्षेत्र, उपलब्धियों, उनके संघर्ष और उनकी अभिव्यक्ति को मंच देता है।

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