लड़कियों के सपने मंडप की हल्दी और बीएड की डिग्री से ऊपर भी होते हैं

Kangana in Queen

कल शाम कुछ परेशान सी थी, भागलपुर का एक परिवार कल जन्मी बेटी को घर ले जा रहा था और आँखों में ठहरी उदासी बेटी के साथ घर जा रही थी, एक सज्जन ने कहा- “पढ़े लिखे नहीं हैं, गरीब हैं न इसीलिए बेटा चाहिये इन्हें…” और फिर वही सब बकवास, ‘काम करेगा, वंश चलाता है’ और यही सब कुछ…

यहाँ मैं कुछ भी फेमिनिज़्म के चश्मे से नहीं देख रही पर यह देखने के बाद मैं लौट गयी अपने गाँव में। जहाँ भोर में चूल्हा बनाती औरतें हैं, चौपाल पर सुबह की चाय के साथ दस आदमी परधानी पर बात कर रहे हैं और साइकिल से लड़कियां झुण्ड बनाकर इंटर कॉलेज जा रही हैं.

ये साइकिल से कॉलेज जाती लड़कियां घर को लीप कर, झाड़ू बुहार कर पूरा काम कर के निकली हैं और इनका सफ़र ब्याह तक जा कर रुकता है, क्यूंकि- “चार अक्षर पढ़ लेंगी तो लड़का अच्छा मिलेगा!”, कुछ की तो शादी भी हो गयी होगी और गौने तक पढ़ रही होंगी क्यूंकि- “लड़की जात को जितनी जल्दी ब्याह दो उतना अच्छा!”, ये लौट कर पहले खाना बनायेंगी फिर पढाई करेंगी और न भी करेंगी तो कोई फर्क नहीं पड़ता क्यूंकि- “कलेक्टरी करेगी का इतना पढ़ के!”

शाम को दोस्त का मेसेज आता है कि दूसरी लड़की हुई है, बेहद खुश है, मैं सोचती हूँ कि शिक्षा और शहर लड़कियों के लिए एक फेवरेबल ज़मीन तैयार करता है. फिर पता चलता है कि एक रिश्तेदार की रात कि नींद इसलिए उड़ी हुई है कि दूसरी संतान लड़की न हो जाए. एजुकेशन, स्टेटस, क्लास जैसे शब्द हँसते हैं मुझ पर.

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ये सब कुछ इतना अन्दर तक धंसा हुआ है इस समाज में कि सब नार्मल लगता है. सपनों को भी पता होता है कि सपनों का दायरा कितना छोटा है तो कोशिश भी अन्दर मर जाती है, अगर शहरों की लड़कियों का लड़ाई अपनी आज़ादी को लेकर है तो आज भी मेरे गाँव की लड़कियों का दंगल उनके पीछे छूटते सपनों से है, न साथ देते अपनों से है. उनके जन्म लेने पर पैदा हुई निराशा उनके साथ ही बड़ी होती है.

मैं जानती हूँ कि इस समाज के दो छोर पर दो लड़कियां खड़ी हैं, जड़ हो चुकी सामाजिक संरचना और दकियानूसी सोच के दोनों ओर, और फर्क सिर्फ एक न का है. क्यूँ नहीं होने वाली माँ खड़ी होकर न बोलती है, क्यूँ हम सब बेटे कि चाह में एक जैसे चेहरे वाले हो जाते हैं. तो लड़कियों, रउआ का गाँव, थारा पिंड, हाई क्लॉस सोसाइटी सब एक जैसे ही हैं क्यूंकि एक दो लड़कियों से समाज नहीं बदलता, क्यूंकि सालों से यही बड़ी हो रही लड़कियां चौक से चबूतरे तक नहीं पहुँचती, वो बस चौक से कोहबर तक पहुँचती हैं और सिर्फ इसीलिये कि कोई उनको ये भरोसा नहीं दिलाता कि मंडप की हल्दी और बीएड की डिग्री से ऊपर भी सपने होते हैं.

कितनी भी लडकियां यूपीएससी टॉप कर जाएँ, एमपी- एमएले बन जायें या फाइटर पायलट हो जाएँ जान लो कि तब भी तुम्हारी लड़ाई गर्भ से शुरू हो जाती है, जान लो कि अपने ही सपनों के उड़ान की शुरुआत घर से होगी, जान लो कि तुम्हें सर ऊँचा कर के अक्सर कहना होगा “बस छोरी समझ के न लड़ना!”

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यादों की निर्जन बस्ती में,पोटली लिए फिरा करती है, झुमका, रिंग, हँसी, काजल, इमरोज़ के इश्क से इश्क करती हैं…” डा. पूजा त्रिपाठी अपना यही परिचय देना पसंद करती हैं। वैसे प्रोफेशन से वे डॉक्टर हैं, लिखती हैं और चाइल्ड एब्यूज के प्रोजेक्ट पर काम भी कर रही हैं।

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