पीरियड्स से अलग भी हैं कुछ दर्द, आओ उन पर बात करें

Eyebrow threading

मेरे शहर की नाज़ुक शोख़ हसीनाओं कब तक सिर्फ महीने के पांच दिनों के प्राकृतिक दर्द पर ही कराहोगी? कब तक उन्ही दर्दों पर ही दुहाईयां दी जाएंगी जो नियंत्रण से परे हैं? कब तक स्वाभाविकता के हवाले से सैनेटरी नैपकिन्स और पैंटी ब्रा ही प्रदर्शित होंगे? कब तक सशक्तिकरण सेक्स की आज़ादी और मनचाहे कपड़े पहन लेने की आजादी में सिमटता रहेगा?

कब तक नही बोलोगी अंडरआर्म्स से बाल उखड़वाने के दर्द पर? कब तक मुंह नही खोलोगी हर पंद्रह दिन पर न चाहते हुए भी बरौनियों से बाल नुचवाने पर? पीरियड्स के दर्द पर तुम इतनी असहाय लगती हो और यहां बालों के मुद्दे पर तुम खुद ही दर्द “मोल” लेती हो। कमाल करती हो सशक्त महिलाओं! उफ़्फ़ ये गुड़ और गुलगुला वाला मामला कब तक चलेगा?

एक छोटी सी पिन चुभने पर “आऊच” और “उई माँ” की चीख से दो कदम दूर छिटक जाने वाली तुम्हारी सेंसेशन इतनी नाज़ुक त्वचा से बाल उखाड़ने पर क्यों नही जागती? कहीं ऐसा तो नही कि संवेदना/वेदना तब भी होती हो और आप उसे मजबूरन सहन करती हों? ताकि सौंदर्य की होड़ में तुम कहीं पीछे न हो जाओ, चिकने गोरे और शीशे जैसे दमकते बदन वाली लड़कियों के बीच तुम फूहड़ और जंगली न दिखने लग जाओ? पुरुषों द्वारा तय स्त्री सौंदर्य के “चिकनी चमेली” और “फेयर एंड लवली” वाले मानकों पर कहीं तुम अयोग्य न सिद्ध हो जाओ? कहीं तुम अस्वीकृत न हो जाओ आधुनिक समाज में?

यदि अब भी आपको ये डर सताते हैं तो ये अब भी प्रच्छन्न पुरुषवाद में जीने वाली बात है जिसमें ये बताया गया कि रफ टफ होना पुरुषों के लिए है स्त्रियों को तो हमेशा चिकनी, नाज़ुक और चमकते रहना है। ये अब भी स्टीरियोटाइप्स में बंध कर जीने वाली बात है। तो अब समझाओ मुझे कि सशक्तिकरण कहाँ हुआ है? बताओ मुझे आज़ादी कहाँ मिली है? क्योंकि पुरुषों द्वारा तय मानक और बाजारवाद तो अब भी हावी हैं हम पर। और यदि आपने लड़कर सशक्तिकरण और आजादी पाई भी है तो वह इतनी सेलेक्टिव क्यों है?

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महावारी और सैनेटरी नैपकिन्स जितने प्राकृतिक हैं हाथ पैर के बाल भी उतने ही प्राकृतिक हैं। यदि हमने सैनेटरी नैपकिन्स खुले में रखने की सहजता अर्जित की है तो हम अपने हाथ पैर के बालों पर सहज क्यों नही हैं? लड़कियों आज़ादी की जंग में अब भी हमने ऊट पटांग सौंदर्य मानकों से आज़ादी नही पायी है।

हाथों पैरों पीठ और पेट पर बिना वैक्सिंग कराये यदि बाहर निकलने में आपका कॉन्फिडेंस आपको पंगु लगता है तो यकीन करो बाजारवाद के विरुद्ध चलायी गयी आपकी नेचुरलसेल्फी मुहीम पूर्णतः सफल नही है और उसपर अभी थोड़ा और ज़ोर दिया जाना बाकी है क्योंकि नेचुरलसेल्फी कैंपेन मेकअप की 4-5 परतों के विरुद्ध ही चलाया गया कार्यक्रम भर नही है ये उसके आगे ऐसी हर एक सौंदर्य-प्रसाधन उत्पाद के विरुद्ध एक नकार से सम्बंधित मुहीम है जो हमे नैसर्गिकता से थोड़ा दूर कर थोड़ा कृत्रिम बनाती है।

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मेदिनी पांडेय सोशल मीडिया पर लगातार स्त्रियों से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर और सोशल टैबू के विरोध में लिखती रहती हैं। वे दिल्ली में रहती हैं।

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