मैं… आपकी निरंतर पाठक!

Story

सख़्त दिखने वाले शख्स की गरदन से बहते पसीने को चूम लेने का मन कर रहा था। पहली मुलाकात और बातचीत की औपचारिकताओं की बेड़ियां पड़ी थीं, नहीं तो मैं किचन में जाकर मैं कहती, “आप छोड़िए, बाहर जाइए, मैं चाय बनाती हूँ।” बार-बार जेहन में वह तस्वीर कौंध जा रही थी, जो मैंने किताबों और मैगजीन में छपी देखीं थीं। किताबों पर छपी फोटो से एक छवि बनती है। मैं करीब 10 साल से इनको पढ़ रही थी। तब मोबाइल नहीं हुआ करते थे। किसी लेखक से संपर्क के लिए उनको चिट्ठी लिखनी होती थी- दिए हुए पते पर। मैं हर बार एक पोस्टकार्ड भेजती थी। ‘आपने बहुत अच्छा लिखा…’ या ‘ये बात मुझे समझ में नहीं आई…’ इत्यादि।

ये सिलसिला करीब 10 साल तक चलता रहा। अब शायद मुझे उनसे प्यार हो गया था- उनको पढ़ते-पढ़ते। अबकी बार मैंने अंतरदेशीय पर एक लंबी चिट्ठी लिखी। इस बार उनका जवाब भी आया। उन्होंने कहा, “आप लड़की कैसे आएंगी मेरे घर? अकेला रहता हूँ।” अब मैं उन्हें कैसे बताऊं कि मुझे अकेले मिलने में कोई ऐतराज नहीं। मैं कुछ दिनों तक चुप रही। कोई चिट्ठी नहीं… एक दिन अचानक उनकी एक कहानी के नीचे मोबाइल नंबर दिखा। संयोग से मेरे पास भी एक रिलायंस का मोबाइल आ गया था। यह सन् 2004 की बात है, मेरे पापा ने बाइक खरीदी थी, उसके साथ दीपावली ऑफर में गिफ्ट मिला था। पापा ने मोबाइल मुझे दे दिया था कि कहीं कोचिंग या बाहर जाती हो तो देर होने या पहुँच जाने पर बता देना। फिर क्या… मैं उनका मोबाइल नंबर देखकर बहुत खुश हुई। मैं डरते-डरते छत पर जाकर, कोने में खड़े होकर, इधर-उधर देखकर फोन मिलाने लगी। मन ही मन सोच रही थी कि पता नहीं क्या कहेंगे? उठाएंगे कि नहीं? यह सब सोचते हुए फोन मिला ही दिया।

उधर से आवाज़ आई, “हलो, अमर स्पीकिंग!”
मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या कहूँ… कुछ सेकेंड के बाद मैं हड़बड़ाते हुए, “मैं आपकी… निरंतर पाठक… रेशमा…”
उन्होंने कहा, “हां रेशमा जी, बताइए? कैसे फोन किया आपने?”
मैं फिर उलझन में… क्या कहूँ। मैंने हड़बड़ाते हुए कहा, “आपसे मिलना है…”
उनका फिर वही जवाब, “आप कैसे मिलेंगी… मैं अकेला रहता हूँ…”
मैंने कहा, “कोई बात नहीं… मैं मिल सकती हूँ…”
कुछ देर तक कोई जवाब नहीं आया। मेरा दिल बैठने सा लगा। धक-धक तो पहले से ही हो रही थी।
उन्होंने कहा, “मुझे अच्छी चाय भी बनानी नहीं आती…”
मैंने कहा, “कोई बात नहीं खराब ही पी लूंगी।”
उन्होंने कहा, “…फिर तो आ जाइए।”

मुझे नहीं लगा कि इतनी जल्दी मान जाएंगे। अब खुशी के साथ-साथ उलझन भी शुरू हो गई। मिलूंगी तो क्या कहूँगी? कैसे जाऊंगी? क्या पहनकर जाऊंगी? क्या लेकर जाऊंगी? किताब या फूल? वैसे मेरा मन कर रहा है कि मैं ब्लू कलर का कुर्ता लेकर जाऊं… एक प्रोग्राम की फोटो मैंने देखी थी, जिसमें उनकी पूरी फोटो थी… वे कुर्ता-पायजामा पहने थे।
कितनी देर तक छत पर खड़ी रही कुछ याद नहीं। जब नीचे आई तो मम्मी और पापा मुझे गौर से देख रहे थे। पापा बोले, “कहां चली गई थी बिना बताए… तुम्हारी एक दोस्त आई थी… पूछ रही थी कोचिंग क्यों नहीं आई।”
मम्मी ने कहा, “इतना पसीना-पसीना क्यों हो रही हो?”
मैं बोली, “कुछ नहीं… यूँ ही…” और पसीना पोंछते हुए अपने कमरे में चली गई।

जब शीशे के सामने गई तो देखा मेरे गाल लाल हो रहे हैं, मैं शरमा सी रही हूँ। समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं।
न खाने का मन हो रहा था, न सोने का। रात भर करवट बदलती रही। सुबह पांच बजे जब मम्मी मेरे कमरे में आईं तो डर के मारे मैंने आँखें बंद कर लीं कि कहीं मम्मी को पता न चल जाए कि मैं सोई नहीं हूँ। जब मेरी आँखें बंद हुईं तो अचानक एक सीन दिखा… फिर तो मैंने अपनी आंखें खोली ही नहीं। जब बंद आंखों से सोचना शुरु किया तो तस्वीर बनती चली जा रही थी, ऐसा घर होगा, ऐसे कपड़े पहने होंगे, दरवाजा कैसे खोलेंगे, क्या कहेंगे… हाय बोलेंगे या नमस्ते करेंगे… या हाथ मिलाएंगे… ये सारी बातें सोचते-सोचते मैं पता नहीं कब सो गई। आठ बजे मम्मी के मंदिर की घंटियों से नींद खुली।

इसे भी देखेंः  अच्छी बेटियां ज्यादा बोलती नहीं... ज्यादा सुनती हैं!

एकदम हड़बड़ाकर बाहर निकली तो देखा पापा ऑफिस के लिए तैयार हो रहे थे। भाई स्कूल चला गया था। बहुत दिनों बाद ऐसा हुआ था कि मैं इतने देर से उठी थी।

मैं पापा के ऑफिस जाने का इंतजार करने लगी। उनके जाते ही जल्दी से दरवाजा बंद किया और मम्मी से कहा, “मम्मी आज मुझे अपने एक दोस्त से मिलने जाना है।”
“हां, जाओ जल्दी आ जाना।”
मैं हिचकिचाते हुए बोली, “मम्मी मैं जिनसे मिलने जा रही हूँ… उन्हें आप नहीं जानतीं।”
मम्मी ललाट पर शिकन लाते हुए बोलीं, “कौन है वो?”
मैं सोचने लगी, “कैसे बताऊं… मम्मी जानकर कहीं मना न कर दें।”
“मम्मी पहले आप प्रॉमिस करो, मना तो नहीं करोगी न?”
मम्मी बोलीं, “बताओ तो पहले?”
मैं जल्दीबाजी में बोली, “वो जिनकी कहानियाँ पढ़कर मैं चिट्ठी भेजती थी।”
मम्मी चेहरे पर बड़ा ही सहज भाव लाकर बोलीं, “हां हां, जाओ, उनके लिए क्यों मना करूंगी… वो तो इतने सीनियर हैं कि तुम उनकी बेटी जैसी हो… उनसे क्या डर… पर समय से आ जाना… और हां, उनको बताना कि तुमने उनकी सारी कहानियाँ पढ़ी हैं, उनको अच्छा लगेगा।”
“जी…” मैं बोली।

जब मैं तैयार होकर निकल रही थी। तो मम्मी दरवाजे तक आईं और बोलीं, “बेटा सुनो… प्रणाम कर लेना। वो बहुत सीनियर हैं तुमसे।”
मैं झुंझलाती हुई बोली, “क्या लगा रखा है… सीनियर हैं, सीनियर हैं… वो मेरे दोस्त हैं।”
फिर मैंने माँ को सॉरी बोला और निकल गई।

मैंने रास्ते में अपने बचाए हुए पैसे से एक कुर्ता खरीदा… नीले रंग का। क्योंकि नीला रंग मुझे पसंद है। जब मैं उनके घर पहुंची तो नॉक करने से पहले अपने को एक बार ठीक से देखा। धक-धक तो इतनी हो रही थी कि कुर्ते के ऊपर से देखा जा सकता था। इसीलिए मैंने दुपट्टे वाला सूट पहन रखा था। उंगली कॉलबेल पर पहुंचने ही वाली थी कि पीछे से आवाज आई, “हलो… ऑर यू रेशमा?”

मैं डर गई और हार्टस्पीड और बढ़ गई।
“जी, आप?”
“किधर से आई हैं? मैं तो नीचे खड़ा इंतज़ार कर रहा था।”
मैंने अपने को संभालते हुए हाथ जोड़कर नमस्कार किया। इतनी देर में वो भांप चुके थे कि मैं घबराई हुई हूँ।
उन्होंने पूछा, “इतनी डरी हुई क्यों हैं?”
“नहीं, नहीं… ऐसी कोई बात नहीं है…” मैंने कहा।
फिर उन्होंने मेरी बगल में खड़े होकर हैंडल पकड़ा और दरवाजा खोल दिया।
“आइए, दरवाजा खुला ही था…”

अंदर से क्लासिकल म्यूजिक की धीमी-धीमी आवाज़ आ रही थी। अंदर आकर जिस तरह घर साफ-सुथरा दिखा, लग रहा था सारी चीजें यथास्थान पर जल्दी ही रखी गई हों। कहीं कोई धूल नहीं, कुछ भी अस्त-व्यस्त नहीं।
मैंने हैरानी जताते हुए पूछा, “इतना व्यवस्थित आप रखते हैं?”
उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “रखता नहीं हूँ, आज रखा है, आपके आने के इंतजार में…”
“मेरे लिए?” मेरी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था।

मैं उनके लिए जो गिफ्ट ले गई थी, वह अब भी अपने सीने से लगाए बैठी थी। उन्होंने मेरी टांग खिंचाई करते हुए कहा, “आपको मेरे से अगर डर न हो, कि मैं आपका पैकेट ले लूंगा… तो आप उसे यहाँ रख सकती हैं।”
मैं हंसती हुई बोली, “जी नहीं, डर नहीं है। मैं चाह रही थी कि मैं आपको ही पकड़ाऊं…”
“लाइए रख देता हूँ। वैसे क्या है इसमें जो इतना खास है? जो आप इसे गोद में लिए बैठी हैं…”
“जी… आपके लिए कुछ…”
“ओ, थैंक्स!”
“…अरे मैंने आपको पानी भी नहीं दिया।”
मैंने कहा, “कोई नहीं… आप बैठिए… घर से ही आ रही हूँ।”
फिर भी वे कुछ खाने-पीने की चीजों के साथ दो गिलास पानी लेकर आए।

इसे भी देखेंः  बदन के हर झुलसे अंग पर एक टैटू दिखता है... 'औरत'

मैंने कहा, “मुझे आपकी कहानियाँ बहुत पसंद हैं। पत्रिका में छपती हैं तो पत्रिका खरीद लेती हूँ और अखबार में छपती हैं तो कटिंग करके रख लेती हूँ। ये देखिए कुछ कटिंग्स मेरे बैग में भी हैं।”
“अरे, इतनी पसंद हैं मेरी कहानियाँ… अच्छा आप बैठिए, मैं आपके लिए चाय बनाता हूँ।”
मैंने कहा, “नहीं, आप परेशान मत होइए…”
“अच्छी नहीं बनाता हूँ पर बना लेता हूं।”

वे किचन में खड़े होकर चाय बना रहे थे। जून की उमस भरी गर्मी थी। थोड़ी ही देर में उनकी कान के बगल से होते हुए पसीना गर्दन की तरफ लुढ़कते हुए नीचे आ रहा था। मन बार-बार हो रहा था कि मैं किचन में जाकर उस लुढ़कते हुए पसीने को चूम लूँ… पर नरमदिल वाला आदमी ऊपर से इतना सख़्त दिखता है कि डर लग रहा था। फिर भी मैं अपने डर पर काबू पाते हुए और औपचारिकता की बेड़ियां तोड़ती हुए किचन में पहुँच गई। और अपने बैग से रुमाल निकालकर उनकी तरफ बढ़ाते हुए कहा, “पसीना…”
उन्होंने कहा, “थैंक्स…” और रुमाल मुझे लौटा दिया।

फिर थोड़ी देर वैसी ही पसीना बहने लगा, जैसे कह रहा हो, ‘दूसरी बार मौका दे रहा हूँ… छू लो इस आदमी को… जो ऊपर से सख़्ती का आवरण ओढ़े हुए है।’ मैं अपने ऊहापोह के साथ एक कदम आगे बढ़कर उनकी बगल में खड़ी हो गई।
उन्होंने कहा, “आप गर्मी में बेकार परेशान हो रही हैं। आप हवा में बैठिए न…”
यह कहना बिल्कुल औपचारिकता लग रहा था। उनसे इजाजत लेकर उनके रैक से कप उतारते हुए मैंने कहा, “एक बात पूछूँ?”
“पूछिए!”
“आप हँसते नहीं कभी… आप टांग खिंचाई भी सीरियस अंदाज में करते हैं…”
“नहीं, ऐसा नहीं है… न हँसने के पीछे लंबी कहानी है।”

इतने में गेट नॉक हुआ। मैंने कहा, “मैं चाय छानती हूँ… आप देख लीजिए…”
मैं किचेन में चाय छान ही रही थी कि पीछे से आवाज आई, “मम्मा आ गई!”

मैंने जल्दी से पीछे मुड़कर देखा तो एक बच्ची बहुत खुश होकर किचेन की तरफ आ रही थी।
मैंने पूछा, “आपकी मम्मा कहाँ गई हैं? मैं तो आपकी मम्मा नहीं हूँ…”
बच्ची एक बार अमर की तरफ देखते हुए बोली, “मम्मा छोड़कर चली गईं, मुझे और पापा को…”
मैंने पूछा, “क्यों?”
“क्योंकि पापा कहानियाँ लिखते हैं… मम्मी पापा में जब लड़ाई होती थी तो कहती थीं, तुम किसी और से प्यार करते हो, तुम्हारी कहानियों से लगता है।”

इतनी देर में मैंने चाय टेबल पर लगाई और उस बच्ची को बैठकर गले से लगाते हुए कहा, “आओ बैठो, बातें करते हैं।”
“क्या आप अब मेरे घर में रहोगी?”
यह सुनकर अमर ने अपनी बेटी को डांटा। बोले, “रितु, बेटा ऐसे नहीं कहते…”

अमर मुझे सॉरी बोलते हुए बच्ची को लेकर कमरे की तरफ जाने लगे। मैंने हाथ जोड़कर रिक्वेस्ट करते हुए कहा, “कहने दीजिए न उसे…”
अमर ने सॉरी वाले अंदाज में कहा, “अन्यथा मत लीजिएगा, अभी छोटी है… समझ नहीं है उसको… आपको बुरा तो नहीं लगा?”
“नहीं, मुझे अच्छा लगा… एक इनसान के सख्त बनने के कारणों का भी पता लगा।” मैंने रितु को अपने पास बुलाया और गोद में बैठाते हुए अमर से कहा, “आप तो कहते थे कि आप अकेले रहते हैं, आपके साथ तो एक नन्ही राजकुमारी भी रहती है।”
तपाक से जवाब आया, “नहीं, मैं तो हॉस्टल में रहती हूँ… अभी आई हूँ गर्मी की छुट्टियों में… फिर चली जाऊंगी। आपको पता है? मुझे वहाँ अच्छा नहीं लगता।”
“आप घर पर रहना चाहती हो?”
“हां, पर पापा कहते हैं कि मैं आपकी देखभाल नहीं कर सकता…”
मैंने कहा, “मेरे साथ रहोगी?”
“जी…” रितु खुशी से उछलती हुई बोली।
“अच्छा, अभी मैं चलती हूँ, मैं अपने मम्मी पापा से इजाजत लेकर आऊंगी।”

इसे भी देखेंः  रोहतक में गैंगरेप हुआ, लेकिन वो निर्भया नहीं बनी...!

अमर हम दोनों की बातें सुनते रहे। उनको लग रहा था कि हम मजाक कर रहे हैं। जब बाहर छोड़ने आए तो रितु भी आई। अमर कुछ कहना चाहते थे, कह नहीं पा रहे थे। दुविधा उनके चेहरे पर साफ दिख रही थी। अचानक घड़ी पर निगाह पड़ी तो काफी समय हो चुका था।
मैंने कहा, “चलती हूँ रितु… अगली बार ढेर सारा चाकलेट लेकर आऊंगी… बाय!”
“बाय…” रितु ने अपने पापा को कमर से पकड़ते हुए कहा।

कई महीने बीत गए। मेरी और अमर की चिट्ठी और फोन से बातें होती रहीं। अब बातचीत सिर्फ कहानियों तक सीमित नहीं थी, बल्कि मेरे परिवार और रितु की भी बातें होने लगीं।

एक दिन मैंने अपने मम्मी-पापा को उनकी बेटी रितु के बारे में बताया। वो दोनों रितु के बारे में पूछने लगे। मैंने पूरी बात बताई कि कैसे उसकी मम्मी साथ नहीं रहतीं, वो हॉस्टल में रहती है और अमर अकेले अपने घर पर अपनी कहानियों और किताबों के साथ…। पापा मेरी सारी बातें बड़े ध्यान से सुन रहे थे। मुझे लगा अच्छा मौका है, अपनी बात रख देती हूँ। मैंने कहा, “पापा, मैं चाहती हूँ कि मैं रितु की मां बन जाऊं…”

मम्मी और पापा दोनों एक साथ बोले, “क्या कह रही हो? समझ में आ रहा है? एक आठ साल की बच्ची की मां? मतलब पिता की उम्र ठीक-ठाक होगी…”
“तो? मैं उन्हें पसंद करती हूँ…” मैंने डरते-डरते कह दिया।

पापा की जो प्रतिक्रिया थी… उसमें उनके चेहरे पर हैरानी नहीं थी। उन्होंने बस मुझसे एक सवाल पुछा, “क्या तुम उनके साथ पूरा जीवन खुश रह पाओगी?”
“उनके साथ का तो पता नहीं… मैं अपनी चाहत के साथ तो रह ही लूंगी…”
जब पापा ने अमर का पता मांगा तो मैं शर्माते हुए अपने कमरे में चली गई।

पापा अमर से मिले और उनसे मिलने के एक हफ्ते बाद का दिन तय हुआ था। दिन शुक्रवार, जगह दुर्गा जी का मंदिर, समय शाम पांच बजे। मैं अपनी पसंद के रंग की साड़ी पहनकर मम्मी-पापा के साथ मंदिर पहुँची तो वहां नीले रंग की फ्रॉक पहले रितु और मेरा दिया नीले रंग का कुर्ता पहने अमर पहले से ही इंतजार कर रहे थे।

पापा ने विदा करते समय एक ही बात कही, “बेटा पढ़ाई पर ध्यान देना… रितु के साथ-साथ…”
फिर मुस्कुराते हुए बोले, “बेटा, मुझे पहले से सब कुछ पता था, संयोग से मैंने तुम्हारी चिट्ठियाँ पढ़ ली थीं… जाओ, अमर और रितु के साथ हमेशा खुश रहना!”

अब अगर अमर कभी किचेन में होते हैं और पसीना बह रहा होता है तो मैं जाकर चुम लेती हूं और अपने दुपट्टे से पोंछ देती हूँ। अब अमर को सख़्त दिखने के लिए नाटक नहीं करना पड़ता है।

मेरा नाम शालिनी श्रीनेत है। मेरा रंग की संस्थापक और संचालक। वेबसाइट के अलावा इसके ऑडियो और वीडियो कार्यक्रमों का भी संचालन करती हूँ। इस संस्था के जरिए हम महिलाओं से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर जागरुकता कार्यक्रम चलाते हैं।

3 thoughts on “मैं… आपकी निरंतर पाठक!”

  1. शालिनी, तुम्हारी रचना-यात्रा की उम्र और यह कहानी— सन्तोष के साथ और बेहतर की शुभकामनाएं दे सकता हूं। यह कहानी संस्मरण की संरचना में एक कोमल-भावुक मन की सीधी-सरल अभिव्यक्ति है। सरल इसलिए कि प्रायः ज़िंदगी इतनी आसान नहीँ होती। आज कहानी का जटिल जीवन-संस्तरों से रिश्ता बना हुआ है। साहित्य का पाठक तुम्हारी कहानी को उसी ज़मीन पर खड़ा होकर देखने की कोशिश करेगा। मैं यहां तुम्हारे लिए कोई अनोखी सैध्दांतिक बातें समझने का प्रस्ताव नहीँ छोड़ रहा। अपने घर मे दिनेश की कहानियों के रूप में तुम्हें इस बात के साक्ष्य मिल जाएंगे। सबसे संभावनाशील बात यह है कि तुममें कल्पना और संवेदना के तत्व मौज़ूद हैं और अपनी भाव-विचार की प्रक्रिया को रचने की कला भी। बस इसे विकसित करते जाना है। शुभकामनाएं।

  2. बहुत ही सुन्दर और सरलता से परिपूर्ण लेखक और पाठिका के बीच संबंधों को उजागर किया गया है। इस कहानी को पढ़ते हुए लग रहा था जैसे सब कुछ अपने सामने घट रहा हो। बधाई व शुभकामनाएँ।

Leave a Reply