अच्छी बेटियां ज्यादा बोलती नहीं… ज्यादा सुनती हैं!

Hamar Betiyan

I feel a girl must have the courage to carry omit independently whatever decision she had taken, to hold fast to conviction she holds dear, at no stage should she allow herself to make compromises with out side pressures. she should be able to do whatever she thinks proper without being cowed by external forces.

प्रसिद्ध लेखिका अमृता प्रीतम की जनवरी 1976 में कही गई इस उक्ति को पढ़कर मुझे तसलीमा नसरीन की याद आ गई। क्योंकि उनकी इस बात को कहने के करीब पाँच दशकों के बाद भी हालात जस के तस हैं। तसलीमा नसरीन को औरंगाबाद से वापस जाना पड़ा था क्योंकि कुछ पुरूषों को उनकी दर्द भरी आपबीती भी नहीं पचती। पाँच दशकों के बाद तसलीमा के जेहन में भी शायद वही घुटन थी। सन 2004 के पटना पुस्तक मेले में जब तसलीमा नसरीन शिरकत करने आई थीं तो मुझे स्थानीय विधान परिषद सर्किट हाउस में उनसे मिलने का अवसर मिला। इस मुलाकात में उन्होने बातचीत के दौरान मुझसे कहा- हमारी आजादी पर हमारे अपनों की ही गाज सबसे पहले गिरती है। भेदभाव हमारे समाज से शुरू होता है फिर संसार भी साथ हो लेता है।

उनकी बात मुझे सौ आना सच लगी। मैंने चौथी क्लास में लिंग भेद का पहला नजारा देखा। हमारा एक सहपाठी था- राकेश तलवार। अमीर घर का होते हुए भी बेहद विनम्र और हँसमुख। क्लास में कोई भेदभाव नहीं था। पर जब भी उसका जन्मदिन आता हमारी अन्य सहेलियां यह कहकर मुकर जातीं हमें नहीं जाना ।मम्मी पापा मना करेगें और भाई बोलेगा मैं तुझे ले जाउंगा। यह सुनकर लगता था कि क्या हम कोई सामान हैं? मेरा भोला बाल मन तब यह नहीं समझ पाता था, कि हम सामान भले न हों पर हम समान भी नहीं थे। हालांकि मैं खुशनसीब थी। मुझ पर कोई न तो प्रतिबंध था न पहरा। हाँ, हमारी सुरक्षा के लिए परिवार को यह पता होता था कि हम कहाँ जा रहे हैं।

इसे भी देखेंः  भारतीय समाज का 'पर्दादार' होना अब केवल एक भ्रम है

दरअसल अनुशासित जीवन और प्रतिबंधित जिन्दगी के बीच गहरी लकीरें खिंची होती हैं।आम तौर पर मासूम उम्र इन सब बातों से बेखबर होती है पर मध्यमवर्गीय परिवार अपने बेटियों को संस्कारी बनाने के उपक्रम में अनुशासित बनाने के बजाय ऐसे घटिया प्रतिबंधों की बेड़ी पहना देते हैं जो पीढ़ियों तक चलती रहती है। यादें थोड़ी धुंधली सी हैं। एक प्रोफेसर साहब थे। उनके घर कुल तीन या चार बेटियां थीं। सुधा और इती मेरी अच्छी दोस्त थीं…  घंटों छत पर बातचीत और मस्ती करना हमारा हर रोज का धंधा था। लेकिन जैसै ही प्रोफेसर साहब कालेज से घर आते, सभी बेटियों के मुँह पर ताला लग जाता था। मैं घबरा जाती सब चुप क्यों हो गए। मुझे इशारा किया जाता- अब तू घर जा!

एक दिन मैं ने मासूमियत से उनसे पूछ ही लिया- अंकल, आपके आते ही सभी खामोश हो जाते हैं… क्या आप इन्हें गूंगा बनाओगे?
उन्होने तल्ख आवाज में जबाव दिया- अच्छी बेटियां ज्यादा बोलती नहीं… ज्यादा सुनती हैं…
मैंने फिर पूछा- क्या सुनती हैं? तो उन्होने कहा- घर संसार और सुव्यवहार की बातें…
पर राजू तो कुछ भी नहीं सुनता… मैंने घबड़ाकर कहा।
उन्होने कहा- राजू तो लड़का है उसे सुनना नहीं सुनाना है।

मैं इस वाकये के बाद थोड़ी खामोश सी हो गई थी। मुझे ऐसा लगने लगा था कि मुझे केवल सुनना है। एक दिन मेरे सबसे छोटे भाई ने मुझे कुरेदते हुए कहा- आखिर मौन व्रत क्यों रखा है? मैंने कहा- तुम बोलो मुझे सिर्फ सुनना है।

आखिर बात एक विद्वान प्रोफेसर ने कही थी, उसका असर तो होना ही था। हालांकि कालान्तर में मेरे घर के अनुशासित लेकिन खुले माहौल ने मुझे बिंदास बनाए रखा अन्यथा उस सोच की छाया भविष्य में मेरी सोच को कुंदित कर सकती थी। आज सुधा और इति कहाँ हैं मुझे पता नहीं बस इतना पता है कि कोई ऐसी बात बोलने से पहले जो हमारी बेटियों की मासूम सोच को कुंठित करे- सौ बार सोचना जरूरी है।

कुमारी रंजना ने कई सालों तक बतौर हेल्थ जर्नलिस्ट काम किया है। इन दिनों वे पटकथा लेखन और फ्रीलांस लेखन से जुड़ी हैं। वे पूना में रहती हैं।

8 thoughts on “अच्छी बेटियां ज्यादा बोलती नहीं… ज्यादा सुनती हैं!”

  1. Oh…..Kya kamaal ki lekhnih…..
    Jindgi ko sabdon me sametta…aabhason ki partidhwani aur samaaj ki visangti ko kuredta hua ……..

  2. Very nice article by favourite mam whom I know personally and met her many times. She is like family member now to me. She is a guide mentor friend and guardian to me. Very protective towards me .
    She is very cool carefree bold like me . I like her a lot. Love u aunty😇😇😇😙😙😙😙
    Regards

  3. I am feeling so bad that our society is facing this sex discrimination still
    People says that there is no different but still there is a difference.
    And this narrow thinking will be changed only by our youth.
    Girls and boys should take initiative against these social evils and bad thinking of people.
    Otherwise girls will no longer to say anything.
    A girl can’t wear what she want to wear. She can’t say anything! Why ??
    Only because they are female?
    We should change this phase of our society.
    We spend most of our time in using WhatsApp and Facebook.
    But do people think for those girls who are being raped or facing any other problems!
    No one thinks !
    We have to take stand and should do something against social evils.
    Girls should become strong enough to fight against evils.
    Thanks

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