अपनी बहन, बीबी और बेटी को दीन-दुनिया की तालीम ज़रूर दें

Education of Muslim Women and Girls in India

इस्लाम या मुस्लिमों पर कुछ बोलकर या लिखकर किसी भी गुमनाम व्यक्ति का फेमस होना लोकप्रियता के कुछ अचूक उपायों में से एक है जो कि हम वर्षों से दुनिया भर में देखते आये हैं। पर यह प्रत्यक्ष अनुभव मैंने कल किया, जब सुबह से लगातार मीडिया द्वारा मुझे अप्रोच किया जा रहा था। प्रतिष्ठित राष्ट्रीय अखबारों, न्यूज़ पोर्टल्स, रेडियो यहाँ तक कि टीवी तक से ट्रिपल तलाक़ पर बोलने को, लिखने को आमंत्रित किया गया जबकि न मैं कोई प्रचलित अर्थ वाली फेमिनिस्ट हूँ, न बुद्धिजीवी न धार्मिक या कानूनी मसलों की विशेषज्ञ, न लाखों फॉलोवर्स वाली कोई फेसबुकिया सेलिब्रिटी। इसी से मुझे समझ आ गया कि ये जो मीडिया में हर बात पर एक्सपर्ट कमेंट देते बैठे लोग हैं, इनको कितनी गम्भीरता से लेना है।

आपको बस दो बातों से मतलब है कि एक तो मुस्लिम हूँ, ऊपर से महिला हूँ और फेसबुक पर डली रहती हूँ। तो कुछ भी बस बोल दूँ। नमन है आपकी सहनशक्ति को महीनों से एक ही मुद्दे पर हज़ारों लोगों से लाखों बार सुनने के बाद भी आपकी उत्सुकता जगी हुई है। ख़ैर मैं पहले भी कह चुकी हूँ मैं ही नहीं, कोई भी दानिश्वर इंसान इंस्टेंट ट्रिपल तलाक़ को सपोर्ट नहीं कर सकता। बाकी कानून बनने का सवाल है स्वागत है उसका। एक बहुत अच्छी पहल है जो काश मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड करता बाहर से धकियाये जाने से पहले।

अब हर तरफ सुख शांति छा जायेगी ऐसा सोचने वाले देख लें कि हिन्दू मैरिज एक्ट तो 1955 में बन चुका है, वहाँ सब हरियाली ही हरियाली दिखे तो आपकी दृष्टि को भी नमन रहेगा। बस जो महिलाएं तलाक़ की प्रक्रिया से गुज़र रही हैं उनकी बाइट ले लीजियेगा 2-2 मिनट की। दहेज, कन्या भ्रूण हत्या से लेकर तमामतर कानून बन ही चुके हैं। जब हम सामाजिक मुद्दों पर बात करते हैं तो सवाल मानसिकता बदलने का होता है।

फिर यहाँ तो मामला पारिवारिक भी नहीं नितांत निजी है। सबसे निजी सम्बन्ध जिनकी पूरी सच्चाई और जानकारी बस दो लोगों के बीच रहती है कोई तीसरा कितना भी करीबी हो सब कुछ जानने का दावा नहीं कर सकता। मुझे कल टीवी पर तमामतर डिबेट्स, तथ्य और आंकड़ों में जो बात सबसे ज़्यादा विचलित कर गयी, मुस्लिम महिलाओं में ग्रेजुएशन और इससे ऊपर की शैक्षिणक योग्यता वाली महिलाओं का प्रतिशत 1.5% से भी कम है। मैं हमेशा से कहती आई हूँ, लड़कियों को पढा दो। फिर वे खुद निपट-सुलझ लेंगी, क्या पहनें, कहाँ घूमें, किसके साथ रहें और किसके साथ नहीं। आप क्यों उंगली पकड़कर अपना मनचाहा रास्ता दिखाते रहना चाहते हैं?

इसे भी देखेंः  उनका हर कश समाज को थप्पड़ मारता है

अपनी बात करूँ, तो मेरी शादी 25 की उम्र में हुई। मैंने यूनिवर्सिटी टॉप किया था और MD करने की इच्छुक थी, पर MD 3 साल की अवधि का होता है। प्रिपरेशन के लिये भी समय चाहिये क्योंकि कॉम्पिटिशन बहुत टफ है। पर कम से कम इन्टर्नशिप और डिग्री पूरी होने तक घर और ससुराल वालों ने कोई जल्दी नहीं की थी, इसी का सन्तोष था। पर अपने खानदान के हिसाब से मैं ‘ओवरएज’ थी। मेरे साथ की लगभग सभी लड़कियां और कई लड़के मेरी शादी में अपने स्कूल गोइंग किड्स को साथ लेकर तशरीफ़ फरमा हुए थे।

मम्मी भी ग्रेजुएट हैं, टीचर हैं तो डायरेक्टली तो कोई सलाह देता नहीं था पर इनडायरेक्ट सजेशंस बहुत आते थे कि लड़की को कम से कम ‘अटका’ तो दो, मने डिज़ायर्ड प्लेस पर सगाई तो कर दो शादी भले 3-4 साल बाद करना। पता नहीं सिंगल लड़की घरवालों से ज़्यादा बाकी लोगों के कन्सर्न का टॉपिक क्यों होती है इतना।

हमारे समाज में यह सामान्य प्रचलन है कि लड़की का कद निकलते ही शादी कर दो। ग़नीमत है कि 18 तक रुक जाते हैं। पर हर जगह नहीं। रिश्ता जमते ही हाथ पीले। शादी में इन्वेस्ट करो, पढ़ाई में तो पैसे वेस्ट होना है तो क्या मतलब। नौकरी थोड़े ही करानी है। घरदारी तो आती है न। सिर्फ गरीब नहीं, अमीर भी जो दामाद को बिज़नेस के लिये लाखों देने को तैयार, मनचाहा कोर्स कराने को तैयार, बेटी को नहीं पढ़ाया पर। सवाल वही है, मानसिकता में बदलाव। बेटी जितनी जल्दी अपने घर की हो जाये के पीछे निहितार्थ हमारी ज़िम्मेदारी आपके सिर हो जाये…

अगर लड़की घरेलू है तो उसे बहुत से प्रिविलेज मिलते हैं। रिश्ते आसानी से तय हो जाते हैं। गृहस्थी का बोझा ढोने की अनिवार्य अहर्ताएं पूरी करती ही होगी, यह मानकर चला जाता है। पर ज़्यादा पढ़ी लिखी हुई, तो बहुत सी अग्नि परीक्षाओं से गुज़रना होता है। हुलिये का पूरा एक्सरे किया जाता है, रोटी गोल है, कपड़ों में होल है, कैरेक्टर में झोल है, सब की एनओसी लगानी पड़ती है। आपकी गृहकार्य में दक्षता शक के घेरे में रहती है। कुछ सिखाया है कि बस पढाई पढाई में रह गयी?

मैंने अपने आसपास देखा है कि जहाँ भी इंगेजमेंट 2 साल से ज़्यादा लम्बे समय तक रही, लगभग 90% मामलों में शादी से पहले टूट गयी। बहुत से कारण होते हैं, जहाँ थोड़ा खुला माहौल है, मोबाइल की उपलब्धता से हमेशा कॉन्टेक्ट में रहना, फिर झगड़े, गलतफहमियां या ऊब तो है ही, पर जहाँ माहौल बहुत कंज़र्वेटिव है वहां भी…

इसे भी देखेंः  #LahuKaLagaan की हकीकत जानना जरूरी है!

‘आपकी होने वाली बहू एक लड़के के साथ घूमती दिखी थी। अब चाहे वह उसका सगा भाई हो, आप लड़की को पहचानते हैं उसके खानदान भर को तो नहीं…’
‘लड़की को देखा कैसे बुक्का फाड़कर हंसती है।’
‘कपड़े कितने तंग थे, पर्दा तो बस बाहर वालों को दिखाने का था, फंक्शन में तो तितली बनकर चकराती फिर रही थी’
‘हमेशा मेकअप परी बनकर घूमती रहती है। हमने तो इतनी लीपापोती कभी न देखी… माशाल्लाह से हमारी बच्चियां तो वैसे ही इतनी प्यारी हैं। इसकी हवा न लग जाये।’
‘ज़ुबान देखी तौबा… 12 ग़ज़ लम्बी है। हम तो इतने सीधे -सादे लोग हैं, न निभेगी ये…’
‘माँ बाप तो लगता है भूल गये हैं कि बेटी पैदा की है, तेवर देखो आप ज़रा सबके…’
‘अबके जाओ उनके यहाँ तो खाना-पकाना सब देखभालकर आना। किचन और बाथरूम के क्या हाल हैं झांककर ज़रूर आना। लड़कियों का सुघड़ापा इसी से पता चलता है।’

इसलिये सगाई के बाद लड़कियों पर एक अघोषित आपातकाल लगा दिया जाता है। शादी ब्याह या कोई फंक्शन, चाहे करीबी रिश्तेदारों के यहाँ हो, अगर ससुराल पक्ष वाले भी आ रहे हैं, तो आमतौर पर अटेंड नहीं करने दिया जाता है। घर से बाहर निकलने में, किसी के घर आने जाने यहां तक कि अपने घर में भी उठने बैठने, बात करने, मेहमानों के आने आदि हर बात पर जज किया जाता है। जीना दूभर करके रख देते हैं।इसलिये जब शादी का इरादा हो, तभी बात पक्की करना ठीक रहता है।

चलो फिर शादी भी हो गयी अब क्या? सब ठीक रहा, या ठीक मान लिया गया, तो ठीक। अगर अलग होने की नौबत आई तो? बर्दाश्त की लास्ट लिमिट तक बर्दाश्त करने, एडजस्टमेंट की हद तक एडजस्ट करने और टूटने की हद तक झुकने का प्रेशर फटने की हद तक आप पर डाला जाता है। बच्चे हो गए हैं तो बस फिर तो। आपका इंडिविजुअल एक्ज़िसटेन्स खत्म। जो सोचना है बच्चों का सोचो वरना आप स्वार्थी। त्याग ममता की मूरत बन जाओ।

पर एक बात हमारे समाज में बहुत अच्छी है कि तलाक को बुरा माना जाता है, तलाकशुदा को नहीं। बच्चों के रहते भी आसानी से विधवा विवाह और पुनर्विवाह हो जाते हैं महिलाओं के और इसे नेक काम समझा जाता है।  इसलिये मीडिया चाहे इस मुद्दे को इतनी हाइप दे कि मुस्लिम मर्दों के तीन बार तलाक़ कहना रुक जाने से ये धरती स्वर्ग बन जायेगी, सारी समस्याएं उड़न छू हो जायेंगी, आप ये समझिये कि जहाँ जहाँ मुस्लिम महिलाएं बदहाल हैं ज़्यादातर जगह पुरुष भी बदहाल ही मिलेंगे। इसका कारण हमेशा तलाक नहीं बल्कि गरीबी, अशिक्षा और रोज़गार की अनुपलब्धता है।

इसे भी देखेंः  आखिर ये शर्मिंदगी क्यों?

महिलाएं बुरे हाल में ज़्यादा इसलिये हैं, कि शादी और पति पाने को अंतिम लक्ष्य मानती हैं। पढाई और उसके साथ साथ पर्सनलिटी एंड स्किल डेवलपमेंट्स पर ध्यान नहीं देतीं। घर बैठे भी बहुत कुछ किया जा सकता है खासकर कोई हुनर तो आना ही चाहिये और ज़रूरत पड़ने पर घर से बाहर निकलकर बाहरी दुनिया को फेस करने का आत्मविश्वास।

याद रखो मुसीबत हमेशा बताकर नहीं आती। कब क्या ज़रूरत पड़ जाये कहा नहीं जा सकता। तो अपने सलीके और टेलेंट पर ज़ंग मत लगने दो। खुद को और अपनी बेटियों को मज़बूत और कॉन्फिडेंट बनाओ। जब खुद की कद्र करोगी, तभी कोई तुम्हारी कद्र करेगा और मुँह उठाए तलाक़ तलाक़ तलाक़ फेंककर नहीं मार पाएगा।

पहले खुद तो समझो कि मदद की ज़रूरत है तुम्हें। अपनी मदद खुद करने की कोशिश करो। अपने जैसी दूसरी महिलाओं से जुड़ो। अपने में ही मगन मत रहो, सामाजिक सरोकार भी रखो। चूल्हे पर क्या जल रहा है, देश-दुनिया में क्या चल रहा है सबकी ख़बर रखो। खुदतरसी और बेचारगी से बाहर आओ, कि दूसरे तुम पर घड़ियाली आँसू बहाना बन्द करें… कि तुमको आसान विक्टिम मानना बन्द करें।

कोई कुछ भी कहकर खिल्ली उड़ाए, शांतिदूत या आतंकी कहे, मुस्लिम जानते हैं कि हम बेहद अनुशासित और मोहब्बती हैं। तमामतर इख़्तिलाफों के बावजूद एक मज़बूत यूनिट। बाकी जिसको जो देखना है वही दिखेगा, तो उसकी टेंशन न लें और अपनी माँओं, बहनों, बीवियों, बेटियों की बेहतरी के लिये उनको दीन और दुनिया की तालीम ज़रूर दें। ये उनका हक है और आपका फ़र्ज…

  • नाज़िया नईम भोपाल में रहती हैं, मेडिकल के प्रोफेशन से जुड़ी हैं और विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर सोशल मीडिया पर लिखती हैं।
एक वैकल्पिक मीडिया जो महिलाओं से जुड़े मुद्दों और सोशल टैबू पर चल रही बहस में सक्रिय भागीदारी निभाता है। जो स्रियों के कार्यक्षेत्र, उपलब्धियों, उनके संघर्ष और उनकी अभिव्यक्ति को मंच देता है।

Leave a Reply