भाई… ये एक दिन की श्रद्धा बहुत भारी पड़ती है हम पर!

Devi

सारे पाप कर के एक दिन के लिए कैसे धार्मिक हो सकते हो…यार?? एक ओर स्त्री को देवी का दर्जा, दूसरी और भारत में बढ़ती यौन हिंसा। बलात्कार का घिनौना चेहरा, जिस्म का बाज़ार…।

जिस मुँह से देवी बोल कर जयकारे लगाते हो उसी मुँह से कलंकिनी, चरित्रहीन, वेश्या, कुतिया…. कैसे बोल लेते हो?

घर में लड़का ना पैदा होने पर पूरा परिवार अवसाद में। चाहे कितना भी मन को समझा लें पर लड़के की चाह अंत तक परिवार को डसती रहती है।

लड़का होने पर राहत की साँस लेते हो। लड़की बोझ लगती है। समाज की रचना कुछ ऐसी है कि तारणहार लड़का होता है। …और लड़की बोझ। 364 दिन लडक़ी को दबाना और फिर एक दिन के लिए अपनी आत्मग्लानि को दूर करने के लिए कन्या पूजन का नाम देना।

वही कन्या जब बड़ी होकर बराबर से आना चाहती है तो यही समाज उसे हाशिये पर खड़ा कर देता है। अपनी पहचान के लिए जन्म से मृत्यु तक संघर्ष करने वाली को देवी का ख़िताब दे कर खूब मुर्ख बनाया जाता है। धर्म की जंजीर में कसी वो कभी अपने लिए जीना सीख ही नहीं पाती है…

स्त्री को अपनी सुविधा के अनुसार खूब उपयोग करना जानता है ये समाज…। या तो धर्म से बाहर निकल जाओ. या तो मान लो की ढोंगी हो। जब कन्या भ्रूण हत्या करवाते समय हाथ नही कांपते हैं… तो ये कन्या पूजन का ढोंग समाज क्यों करता है? घर-घर जा कर कन्या खोजना?

और फिर उसी घर का लड़का बड़ा होकर चौराहे पर खड़ी हर आती जाती लड़की को ताड़ता है। ये कैसे संभव है भाई…?

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जब घर में लड़की को ले कर सम्मान होगा तभी तो समाज में सम्मान दिखेगा। ये सब समाज का दिखावा है… सत्य नहीं। सत्य होता तो उसकी झलक समाज में दिखती। कहीं तो लोचा है…

भाई… ये एक दिन की श्रद्धा बहुत भारी पड़ती है हम पर। जो हमारी पैर की जंजीर बन जाती है। ये दिखावा, ये भक्ति, ये श्रद्धा… तब फलीभूत होगी जब पुरुष के अवचेतन में स्त्री को लेकर समानता का भाव होगा।

बेटी को बढ़ने, पढ़ने से रोकना, लड़का-लड़की के लिए समाज में बने दोगले नियम, बहू के साथ हर दर्जे पर ख़राब व्यवहार, स्त्री को भोग्या समझना… इन मुद्दों पर सही दिशा में सोच व दृष्टि को बदलना ही सही सम्मान होगा।

वरना पूजा-पाठ, आडंबरों, पत्थरो को पूजने से उद्धार होता तो सबसे ज्यादा भला स्त्री का ही होता। क्योकि वो जन्म से ले कर मृत्यु तक धर्म का ताबीज पहने रहती है।

  • इस टिप्पणी को हमने गीतांजलि ग्रेवाल की फेसबुक वॉल से लिया है। वे वीमेन्स थिएटर क्लब की संचालिका हैं और ग्वालियर में रहती हैं। 
एक वैकल्पिक मीडिया जो महिलाओं से जुड़े मुद्दों और सोशल टैबू पर चल रही बहस में सक्रिय भागीदारी निभाता है। जो स्रियों के कार्यक्षेत्र, उपलब्धियों, उनके संघर्ष और उनकी अभिव्यक्ति को मंच देता है।

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