मगर आज भी ये आलम है और ये हो न सका…

An Indian Girl

होना तो ये भी चाहिए था कि
बेटों की तरह बेटियों के जन्म पर भी
थाली नहीं घंटाल बजते…

होना ये भी चाहिए था कि
‘बिटिया-बिटिया दब जइयो’ और ‘लड़का-लड़का भग जइयो’ जैसी कहावतों में
दोनों ही बच निकलते

होना ये भी चाहिए था कि
अभावों के चलते गर बेटियाँ घर बैठी रह जातीं
तो उन्हें समाज का दंश न झेलना पड़ता

होना तो ये भी चाहिए था कि
माँ की लड़ैती बेटियाँ विदा होते समय
जो फूट-फूट कर रोएँ
तो दामाद विदा हो लें

होना तो ये भी चाहिए था कि
हम मरें तो
तुम्हारे जीवन के भी सब रंग उतर जाएं

होना तो बहुत कुछ चाहिए था
मगर हो न सका…

और आज भी ये आलम है
कि एमबीए करने के बाद भी
बेलन थामना ही पड़ता है

आत्मसम्मान और आत्मसक्षमता कमाने के बाद
सुनना ही पड़ता है
कि खुद को खूब सोना या हीरा समझ लो…

लोहे की रॉड से आँखे उमाच ली जाती हैं…

और एक मौत होने के बाद
महिला सशक्तिकरण की आवाज़ बुलंद हो जाती है

आकांक्षा सागर फेसबुक पर अपने बारे में कहती हैं, “समन्दर पर बाँध नहीं बना करते…”। वे बहुत अच्छी कविताएँ लिखती है और उन कविताओं को जीती भी हैं। यूपी में पढ़ाई-लिखाई। इन दिनों चंडीगढ़ में हैं।
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1 thought on “मगर आज भी ये आलम है और ये हो न सका…”

  1. नमस्ते
    होना तो ये भी चाहिए था कि अनु मेरी हो पर अपने भाग्य से मैं लड़ नही पाया और वो न चाहते हुए भी हमसे दूर हो गयी ।

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