मैंने एक लड़की को धीरे-धीरे मरते हुए देखा

Dying Girl

मृत्यु की गंध कैसी होती है? सब ओर से जबरन हमारी तरफ बढ़ी आती बासी, लिज़लिज़ी गंध जिसको रोक सकने का कोई उपाय हमारे पास नहीं होता. मृत्यु से प्रथम साक्षात्कार मुझे हड्डियों का ढाँचा हो चुके मेरे दाज्जी ने कराया था जिन्हें कैंसर से हुई मृत्यु के बाद बर्फ की सिल्ली पर लेटे देखा था. लिटाते समय उनके हाथ-पाँव हिलते देख मन में एक आस जागी थी कि वह जिंदा होंगे और एक रूपये की चार टॉफ़ी मेरी हथेली पर धर देंगे मगर वह नहीं उठे थे और घर की औरतों को बुक्का फाड़ रोते देख मेरा सात साल का मन सहम गया था. उस से भी ज्यादा दुःख पापा को पहली बार रोते देख हुआ था.

पापा रो रहे हैं…माने बहुत गंभीर बात है पर अगले ही पल मुस्तैदी से उन्हें मृत्यु के बाद किये जाने वाले आचारों में व्यस्त देख मन बहुत हद तक निर्विघ्न हो गया था. परन्तु अगले ही दिन बाहर दाज्जी के इस्तेमाल किये जाने वाले तकिये, चादर और कपड़े देखे तो मन कैसा अजीब हो गया था. एक रोज़ पहले तक जिस बिस्तर की सिलवटें निकालने के लिए उनके बेटे मशक्क़त करते थे कि सिलवटें उनके पिता के कृशकाय शरीर में घुंप कर उन्हें तकलीफ न पहुंचाए. जिस तकिये के गिलाफ को माँ घंटों सर्फ में डालकर ब्रश से रगड़ा करती थीं कि तेल के मैले निशान छूट जाएँ वही बेपरवाही से वहां कचरे की तरह पड़े थे. मैं अचकचा गयी थी कि क्या यह वाकई फेंके गए हैं कि गलती से गिर गए हैं. मैंने उस गठरी को उलटने-पलटने के लिए ज्यों ही हाथ बढ़ाया चाचा की गरजती आवाज़ सुनाई दी और मैं डर कर अन्दर भाग गयी. मुझे दाज्जी का प्रिय फूलदान देखना था और वह मोतियों से बना घोडा भी…क्या वह भी तो न फ़ेंक दिया होगा?

वहाँ गाँव में वही तो मेरा सहारा थे सिवाय उन उबाऊ कल्याण पत्रिकाओं के जिन्हें मन मार कर मुझे पढ़ना पढ़ता था क्यूंकि नन्दन, चम्पक जैसी पत्रिकाओं में पैसे ज़ाया करना वहां उचित नहीं माना जाता था. दीपावली की छुट्टियों में वहाँ जाने पर माँ को घर के कामों का अम्बार लगा मिलता और पापा को पूरे घर की सफेदी कर लड़ियों से सजाने की ज़िम्मेदारी. ऐसे में मेरा सहारा बस वे कुछ किताबें होतीं जिनमें से मैं छांटकर कहानी जैसी प्रसंग पढ़ लेती या सजावट के नाम पर बैठक में रखे वे खिलौने जिनसे खेल कर मैं उकताहट को दूर रखने का प्रयत्न करती.
खैर, वह फूलदान और मोती जड़ा घोड़ा भीतर बैठक में ही था…ठीक अपनी जगह. बालमन ने राहत की साँस ली ही थी कि मैंने महसूस की एक कसैली गंध…

वही जो बाहर पड़े कपड़ों में आ रही थी, वही जो कल मृत शरीर में भी थी जिसे मैं मन से हटा चुकी थी. वही गंध मैंने दोबारा उन निर्जीव चीज़ों में, दीवारों में महसूस की. वहाँ बिछे नंगे पलंग के नेवार के दागों में मैंने एक चरपरापन रेंगता महसूस किया. मुझे उबकाई आने को हुई तो मैं दूसरे कमरे में चली आई. पास रसोईघर में खालिस घी में तैयार होती इमरतियों की गंध भी उस गंध को ढक नहीं पा रही थी. मैंने हैरानी से चौक में जमा उन औरतों को देखा जो बातें करते-करते अचानक हर आगुन्तक के आते ही मुंह में पल्ला ठूंस अचानक रो देती थीं. मुझे उस ठुंसे हुए पल्लू का मुचड़ापन विरक्त कर गया. मृत्यु की गंध आपका पीछा आसानी से नहीं छोड़ती. आसमान भर हवा को चीर कर वह यूँ प्रकट हो उठती है जैसे कहानियों में मौजूद राक्षस.

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बड़े से घर की खुली छत पर पत्थर की दीवारों के बीच झांकती काई की गंध मुझे तसल्ली देती प्रतीत हुई पर वह जीर्ण-शीर्ण गंध मृत्यु की गंध पर अधिक समय तक के लिए पैबंद नहीं लगा सकी. मुंडेर पर बैठ आकाश को देखते हुए नज़र नीचे गयी तो दालान में पानी का हौद मेंढकों से अटा था और उनका हरा दानेदार शरीर लिसलिसे तरल से लिथड़ा था जिसकी वजह से वहाँ से उन्हें निकाल पाना कठिन हो रहा था. ताऊजी का बेटा एक डंडा लिए उनके सर पर चोट करने को तैयार खड़ा दिखाई दिया. मेंढकों की देह से मुझे मृत्यु का अँधेरा फूटता दिखाई दे रहा था. मैंने उन्हें रोक देना चाहा था पर नीचे से नहाने की पुकार हो गयी और मेरी आवाज़ गले में फँस कर रह गयी.

नहाने का काम पुरुष और बच्चे बाहर ही किया करते और औरतों के लिए जो स्नानघर था उसकी नाली बदबूदार झाग से अटी होती जिसकी तरफ नज़र पड़ते ही दोबारा नहाने का मन होता. जाने स्त्रियाँ कैसे उसके भीतर प्रवेश कर पाती होंगी. देर तक नहाने की शौक़ीन औरतें भी वहाँ दो लोटे पानी से खुद को भिगोकर नहाने की औपचारिकता निभाकर जल्दी से बाहर निकल आती थीं. मृत्यु की बासी गंध लिपट कर हर जगह चली आ रही थी. हमसे बड़े भाई-बहन ब्रह्मराक्षस की कहानियाँ सुना कर हमें डराते थे और हम नींद न आने पर भी दम साधे पड़े रहते कि आँखें खोलते ही हमें कोई कच्चा न चबा जाए. ऐसी ही किसी रात मृत्यु का कसैलापन खुद से झटकने की कोशिश में मैं शाम ढले एक कमरे में सो गयी.

नींद कितने घंटों बाद खुली कह नहीं सकती. गर्मी से खुली या फुसफुसाने की आवाज़ों से..यह भी याद नहीं. बाहर सड़क पर लगा पीला बल्ब अंदर जो रोशनी फ़ेंक रहा था उसमें दीख पड़ रही थी अपनी जाँघें फ्रॉक से ढकने की कोशिश करती दूर के रिश्ते की चाची की छुटकी बिटिया और एक आदमी जो उस फ्रॉक को जाँघों तक पहुँचने ही नहीं दे रहा था. कहीं यही तो ब्रह्मराक्षस नहीं…उसकी पीठ होने के कारण मैं उसका चेहरा नहीं देख पायी थी लेकिन मैं छुटकी का डरा चेहरा देख पा रही थी और उसकी न के बावजूद उस आदमी की छुटकी के हाथ में कुछ पकड़ाने की पुरज़ोर कोशिश.

मैंने छुटकी का हाथ पकड़ कर खींचा और छत की ओर भाग चली…जाते वक़्त पीछे मुड़ कर देखा तो हैरान रह गयी. क्रोध का सोता फूटा और चिल्ला कर धमकी दी कि ऊपर जाकर सबको बता दूँगी लेकिन किसी को कुछ भी कहाँ बता पायी. दबे स्वर में जिस-जिस से कहने की कोशिश की उसने झिड़क दिया और चुप रहने की हिदायत दे दी. पीछे उसकी धृष्ट हँसी सुनाई दी थी. वहीं छत के एक किनारे कै करते हुए इतने दिन से जमा मृत्यु की गंध कहीं बह गयी और उसके स्थान पर स्त्री होने के अहसास ने पैर जमा लिए.

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यह अहसास बाद इसके न जाने कितनी अनुभूतियों का गला घोंटकर हर दफ़ा सर उठाये खड़ा रहा. इस घटना के बरसों बाद जब हम इन बातों का अर्थ कुछ-कुछ समझने लगे थे और अपने बचाव को खुद की ज़िम्मेदारी मान हर अँधेरे कोने को अपना शत्रु मान बैठे थे उन्हीं दिनों एक घटना ऐसी हुई कि हम शारीरिक हिंसा के साथ मानसिक हिंसा का अर्थ पहली बार समझ सके. हम बड़े हो रहे थे और कक्षा में लड़के-लड़कियों के बीच प्रतिद्वंदिता का भाव बढ़ रहा था. ज़्यादातर लड़के पारंपरिक सोच वाले परिवारों से थे जहाँ पीढ़ियों से सांचे में ढालकर जैसे एक ही तरह के मर्द बनाये जाते रहे हों. जहाँ अंतर बस इतना था कि हर पीढ़ी के साथ, आधुनिकता का आवरण ओढ़े उनकी सोच में गंदगी की मात्रा बढती जा रही थी.

किसी भी मुद्दे को लेकर अक्सर लड़के और लड़कियों में तनातनी हो जाती. भले ही बात क्लास का मॉनिटर बनने की हो या देश के किसी मसले की…लड़कों के लिए उनकी कही बात आखिरी होती. यहाँ तक कि मुहब्बत को लेकर भी फ़लसफ़े एकदम जुदा थे. मुहब्बत का मतलब जहाँ लड़के लड़की के ऊपर आधिपत्य मानते थे वहीं लड़कियों के ज़हन में आज़ादी की कोंपले सर उठाने लगीं थीं. अपनी माँ को घर में पिता से दबते देखती लडकियाँ स्कूल में लड़कों से भिड़ जाने का दम-ख़म रखने लगी थीं. लड़कों की ऊंची आवाज़ का जवाब लड़कियों की ओर से सम्मिलित स्वर में दिया जाने लगा था. उन्हीं दिनों एक लड़की जिसके ख़्वाब आँखों में समाने के लिए बड़े थे और दुनिया की रिवायतों से उसका राब्ता न के बराबर था, लड़कों से दुश्मनी पाल बैठी थी. उसके पास हर सवाल का जवाब था और लड़कों की हर ज़्यादती के बदले एक और कारनामा.

वह न लड़कों की शिकायत करने से डरती न उनके गलत बर्ताव को सबके नोटिस में लाने से. यहाँ तक कि जो व्यवहार सामाजिक परिदृश्य में लड़कों के लिए स्वीकृत था वह उसे सही नहीं मान पाती थी. लड़के उस से खार खाने लगे थे. वे ताक में रहते कि कैसे उसे नुकसान पहुंचा सके. ‘बुली’ करना ज़माने से चला आ रहा है…उस वक़्त भी यह मौजूद था. आते-जाते फिकरे कसना, चरित्र को लेकर अफवाहें फैलाना, टीचर्स के सामने उसके बारे में बेहूदा बातें करना जैसे सब पैंतरे आजमाने के बाद भी जब वे उसका मनोबल तोड़ने में कामयाब नहीं हुए तो उनके सब्र का बाँध टूटने लगा.

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बायोलॉजी लैब की ओर जाते लम्बे सूने गलियारे में दो-तीन लड़कों ने उसे घेर लिया और उस पर वार करने का प्रयत्न करने लगे. डरी वह फिर भी नहीं थी. छूटने की कोशिश की बजाय वह लगातार पलटवार किये जा रही थी जिसने लड़कों का क्रोध और भड़का दिया. आखिर लड़कों के अहम् का सवाल था. उसकी एक सहेली के अचनाक आ पहुँचने पर लड़के थोडा अचकचा ज़रूर गए पर वे हाथ आये शिकार को आसानी से जाने देना नहीं चाहते थे. बायोलॉजी सर के आने पर लड़के भाग छूटे और हिम्मती लड़की अचानक फफक कर रो उठी. इसलिए नहीं कि उसका अपमान हुआ था बल्कि उन लड़कों का देय अभी बाकी रह गया था. वह अभी तक हारी नहीं थी..हारना अभी बाकी था. जब बायोलॉजी सर ने उसे सांत्वना देने लिए उसकी पीठ पर हाथ घुमाना शुरू किया और उसे चुप कराते हुए खुद से सटा लिया. उसने आग्नेय नेत्रों से उन्हें घूर कर देखा और लैब के गलियारों से होते हुए क्लासरूम में आ गयी जहाँ अभी हुई घटना का रीप्ले प्रस्तुत किया जा रहा था. लड़की को तब भी बोध नहीं था कि क्या-क्या होकर गुज़र चुका है.

यह उसे तब मालूम चला जब प्रिंसिपल से शिकायत करने पर फिजिक्स टीचर ने लडकी के माँ-बाप से कहा लड़कों को सजा होनी चाहिए पर आप अपनी लडकी को भी काबू में रखिये. अंग्रेजी की मैडम ने उसे बुलाकर लड़की होने के नियम-कायदे बतलाये और केमिस्ट्री की मैडम ने बाल झटकते हुए उसे देखकर अनदेखा करना शुरू कर दिया ज्यों वह क्लास में है ही नहीं. स्टाफ रूम के आगे से गुज़रते हुए हमें अक्सर उसका नाम और ठहाके सुनाई दे जाते. जो हुआ उसके अलग-अलग संस्करण प्रचलित हो गए थे और हर संस्करण में लड़की चरित्रहीन और हारी हुई दीख पड़ती थी.

यह उतना ही बुरा था जब एक रोज़ हम में से एक लड़की को बुलाकर एक टीचर ने ज़रा झुक कर चलने के लिए कहा था कि उसका पुष्ट सीना देख स्कूल में मौजूद पुरुष तलबगार न हो उठें और अगले दिन सारी लड़कियों के कंधे कुछ झुक गए थे. लड़कों को सात दिनों के लिए सस्पेंड कर दिया गया था लेकिन इस दौरान भी स्कूल के बाहर खड़े होकर लड़के जिस अंदाज़ में उसे घूरा करते उसके लिए ज़िन्दगी भर का सस्पेंशन भी कम था. तब मैंने एक लड़की को धीरे-धीरे मरते हुए देखा जो सिर्फ स्त्री होने की वजह से मर रही थी.

स्त्रियों को चुप रहना सिखाया जाता है. उनकी चुप्पी पितृसत्ता का तेज़ धार हथियार है और अब इतने साल, दशक बीत जाने के बाद भी जो स्त्रियाँ अपने विचारों को प्रकट करने में हिचकती नहीं हैं उन्हें मार दिया जाता है. आज भी स्त्री होने का अहसास मृत्यु-गंध में लिपटा हुआ है. क्या हम कभी इस से उबर पायेंगे?

दिव्या विजय हिन्दी की नई पीढ़ी की प्रतिभाशाली लेखिका हैं। कई पत्र-पत्रिकाओं में कहानियां और फिल्मों पर आलेख प्रकाशित। जयपुर में रहती हैं।

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