हर आजाद फैसले की कीमत चुकानी पड़ती है…

Amrita Imroz

मेरे घर में मेरा एक कमरा है,और जब से मुझे एक अलग कमरा मिला है, अमृता प्रीतम मेरे कमरे में मौजूद हैं या फिर ये कहूँ कि अमृता के कमरे में मैं मौजूद हूँ . लेटे हुये कुछ लिखती हुई एक धुंधली सी अमृता प्रीतम की ब्लैक एंड वाइट तस्वीर जो उनकी मौत के समय किसी अखबार से काटी थी और तब से अमृता इस दुनिया से चली गयी और मेरे कमरे में आ गयी. मेरे टेबल पर एक मग है जिसमे अमृता की तस्वीर है और वो मेरे कमरे का सबसे खूबसूरत हिस्सा है.

पहली बार जब अमृता प्रीतम के बारे में सुना तो वही सुना, वो प्रेम, कथा जो पूरक है इक दुसरे के- अमृता इमरोज़. एक टीनएज लड़की को जब पता चला कि वो साथ साथ रहते हैं तब मेरे सामने वही स्वाभाविक प्रश्न “बिना शादी के” और फिर शुरू हुई अमृता को जानने की, उन्हें जीने की एक अनवरत कोशिश.

अमृता- इमरोज़ से मेरे इश्क से सब वाकिफ हैं. अमृता एक मुक्त व खुले विचारों की ऐसी स्त्री जो बेबाक लिखती है अपने प्रेम के बारे में…

“वह चुपचाप सिर्फ सिगरेट पीता रहता था, कोई आधी सिगरेट पीकर राखदानी में बुझा देता था, फिर नई सिगरेट सुलगा लेता था और उसके जाने के बाद केवल सिगरेटों के बड़े – बड़े टुकड़े कमरे में रह जाते थे।कभी…एक बार उसके हाथ को छूना चाहती थी, पर मेरे सामने मेरे ही संस्कारों की एक वह दूरी थी, जो तय नहीं होती थी। उसके जाने के बाद, मैं उसके छोड़े हुए सिगरेटों के टुकड़ों को सम्भाल कर अलमारी में रख लेती थी, और फिर एक – एक टुकड़े को अकेले बैठकर जलाती थी। और जब अंगुलियों के बीच पकड़ती थी, तो लगता था, जैसे उसका हाथ छू रही हूं।”

लगा मेरी खोज ख़त्म हुई. अमृता उन रेयर स्त्रियों में रही जो प्रेम में स्वतंत्र होती चली गयी जब उन्हें इमरोज से इश्क हुआ, तो कई बरस उनके साथ रही। जीवन की धूप – छांव में दोनों एक दूसरे का हाथ थामे रहे। एक दूसरे पर कुछ थोपे बिना, सदा साथ बने रहे और जाते जाते कह दिया “ मैं तैनू फिर मिलांगी…”

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हर वो शख्स जो जुड़ा है मुझसे वो जानता है कि अमृता प्रीतम सिर्फ एक कवियत्री नहीं हैं मेरे लिये, अमृता प्रीतम मेरा ज़िन्दगी को देखने का नजरिया भी है. मेरा रसीदी टिकेट को कोट करना, अमृता इमरोज़ के बारे में अपनी राइटिंग क्लासेज में बताना, आज आखा वारिस शाह नु को याद रखना : सबको पता है . हम सब अमृता पसंद करते हैं, और वही सब लोग अमृता से डरते भी हैं.

फिर एक दिन मैंने वो कह दिया जो एक मिडिल क्लास फॅमिली में टैबू है- मैंने लिव इन रिलेशनशिप की वकालत की. जेहन में एक लिखने में डूबी हुई अमृता के लिये 30 सालों तक चाय बनाते इमरोज़ थे और मैंने उस प्लेटोनिक प्यार का हवाला देते हुये कहा कि शादी करना क्या ज़रूरी है. और तब देखा मैंने अपने पापा की आँखों में डर और फिर एक डांट कि उल जुलूल बातों के चक्कर में न पड़ो.

हम सब हर दिन दो समानान्तर जीवन जी रहे होते हैं – एक, जो हमारे बाहर तमाशा चल रहा है और दूसरा ,जो हमारे भीतर कुलबुला रहा होता है। जब इन दोनों जीवनों के मध्य असमंजस की लहरें उफान लेने लगती हैं तो वही पैदा करता है डर . डर कि हमारी बेटी वैसी न बन जाये जैसा किताबों में पढ़ा और पसंद किया था. वो कलम को स्याह में डूबाकर स्वतंत्रता की इबारत न लिखे, वह डिफाइंड जेंडर रोल्स में बस अपने लिये एक किरदार चुन ले और सामाजिक किले की चार दिवारी में सुरक्षित रहे, जिंदा भली ही न रहे.

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यह डर देख कर मुझे रसीदी टिकेट का वो अंश याद आता है:

दिवाली अभी अभी गुजरी, मेरा एक बंद कमरा , कमरे में चाय के तीन कप पड़े हैं, ए फोर शीट के बिखरे पन्ने, बुकशेल्फ पर अमेज़न से कल ही आई नयी किताबें और दीवार पर फ्लिप चार्ट. ये मेरा कमरा है. ये बिलकुल मेरा ही कमरा हो सकता है. मुझे हर चीज़ सामने दीवार पर लिखी हुई साफ़ साफ़ चाहिए. याद दिलाना पड़ता है खुद को, मुझे कुछ ज्यादा ही. लिखे रहने से कुछ छूट जाने का, कुछ बचा रह जाने की उम्मीद लगी रहती है, इसीलिए याद दिलाना पड़ता है- फ्लिप चार्ट पर क्या लिखना है और रिश्तों में क्या मिटाना है.

सोचती हूँ कि वो ब्लैक एंड वाइट तस्वीर हटा दूँ तो क्या अमृता की आजादी से मेरा इश्क ख़त्म हो जायेगा. अमृता के लिये जीवन यथार्थ से यथार्थ तक पहुंचने का सफर रहा। और फिर अमृता क्या सिर्फ एक तस्वीर में जिंदा है. अमृता जिंदा हैं किसी अल्हड सी लेखनी में , अमृता जिंदा है कविताओं के पीछे छुपे नामों में, अमृता जिंदा है साहिर की आधी जली सिगरेट में, अमृता जिंदा है इमरोज़ के अकल्पनीय समर्पण में, अमृता जिन्दा है मेरे किताबों के पीले पन्नों में, अमृता जिंदा है हर चुप्पी में, अमृता जिंदा है उन फैसलों में जिनकी जुबान नहीं होती.

कहीं सुना था कि “हर आज़ाद फैसले की कीमत चुकानी पड़ती है’.

ये सुन के मुझे तुम क्यों याद आती हो अमृता?

यादों की निर्जन बस्ती में,पोटली लिए फिरा करती है, झुमका, रिंग, हँसी, काजल, इमरोज़ के इश्क से इश्क करती हैं…” डा. पूजा त्रिपाठी अपना यही परिचय देना पसंद करती हैं। वैसे प्रोफेशन से वे डॉक्टर हैं, लिखती हैं और चाइल्ड एब्यूज के प्रोजेक्ट पर काम भी कर रही हैं।

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