एक दोस्त के नाम लिखा गया ख़त जो हम सबको पढ़ना चाहिए

Letter to a friend

लाइक्स और कमेंट्स के इस दौर में अच्छा लेखन बनाए रखना भी एक साधना की तरह है। इस साधना में अगर दोस्तों का साथ मिल जाए तो क्या बात है। हम अजीत भारती का  सुपरिचित लेखिका भारती गौड़ के नाम लिखा गया यह ख़त शेयर कर रहे हैं जिसमें दोस्ती के सुंदर रंग तो हैं ही, यह भी समझने को मिलता है कि सोशल मीडिया पर रहते हुए अपनी लेखन शैली को क्यों मौलिक बनाए रखना चाहिए।

प्रिय भारती,

जानता हूँ कि तुम थोड़ी परेशान हो व्यक्तिगत कारणों से, और आज भी हमारा मिलना नहीं हो सका। लेकिन जो हृदय में है, जो मेरे ख़्यालों के चरागों को ज़िंदा करती है, जिसे याद करने से पहले सोचना भी नहीं होता, उसके न आने का भी मलाल क्यूँकर हो! तुम तो वो हो, जो कोई नहीं है। तुम मेरे लिए वहाँ भी हो, जहाँ मेरे लिए कोई नहीं होता।

ऐसे समय में, जब लोगों के दम्भ का स्तर आसमान छू रहा है, और चर्चाएँ सड़क से नीचे उतरती जा रही हैं, तुम्हें लिखता देखता हूँ तो अच्छा लगता है। तुम्हारे लेखन की संवेदना तक मैं जब पहुँच जाऊँगा, मैं बाक़ियों से बहुत आगे निकल जाऊँगा। कहते हैं कि उसकी अपनी शैली है, मेरी अपनी। लेकिन मेरा एक लालच है कि तुम-सा होकर लिखूँ। जब मिलोगी तो आत्मा में उतरकर महसूसने का हुनर तुमसे सीख लूँगा।

तुम्हारे लेखन में शैली से परे कुछ है जो बहुत लोगों को छूता है। शब्दों का चयन ज़बरदस्ती नहीं लगता, भाव ठूँसे हुए नहीं लगते, न ही कहीं से ये कोशिश दिखती है कि तुम अपने आप को आगे कर रही हो। जब तुम्हारा लिखा पढ़ता हूँ तो वो शब्द तुम्हें पार्श्व में छोड़कर अपनी कहानी बताते होते हैं। और मेरे लिए ऐसा कर पाना सहज नहीं है।

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कई लोग जब लिखते हैं तो वो अपने आप को बेचने की कोशिश करते हैं। उनके लेखन में वो खुद दिखते हैं, उनकी प्रतिभा या कला नहीं। जैसे कि शाहरूख की फ़िल्मों में शाहरूख होता है, कहानी, एक्टिंग या बाकी बातें नहीं।
जब तुम लिखती हो तो तुम गायब हो जाती हो, और ये सहज रूप से हो जाता है। वहाँ एक लेख होता है, जहाँ कुछ बातें होती हैं, कोई विषय होता है, और आप तक वो पहुँचता है। बाकी कई लोगों में लेख से ज्यादा वो आदमी खुद को पहुँचाता होता है, जो कि उस लेखन की असफलता का द्योतक है। जो पढ़ने वाले होते हैं, उनको पता चल जाता है कि यहाँ विषय प्रबल है या लेखक स्वयं।

इस कारण ईर्ष्या होती है तुमसे। लेकिन तुमसे जलूँ भी तो तुम्हें ही जला दूँगा, और ये मैं होने नहीं दूँगा!
फ़ेसबुक ने जहाँ तुमसे मिलवाया, कई बेहतरीन लेखकों के हस्ताक्षर दिखाए, वहीं एक तरह की कुण्ठा इतनी व्याप्त है कि इसके फ़ायदे और नुक़सान को नापते हुए मैं सोच में पड़ जाता हूँ। क्या समाज की सारी दबी इच्छाएँ आजकल ही प्रतिफलित हो रही हैं, या ये हमेशा से थीं, और आज इन्हें एक माध्यम मिल गया है?

सीखने की जगह अपने दिमाग के कमरे बंद कर बैठा इन्सान, खुद को लाइकों की नाव पर, वाह-वाही की पतवार से खेते हुए वहाँ जाना चाहता है, जहाँ साहित्य के सारे पूर्वज बैठे हुए हैं। मौलिकता खोजने से भी नहीं मिलती। चोरियों को नए नाम दिए जा रहे हैं, अनुवादों के अनुवादक अपने ही पाठकों को चैटबॉक्स में मैसेज करके बुलाकर कमेंट करवाते हैं (और फिर खुश भी होते हैं), और भड़काते हैं कि तुम हिन्दू-मुसलमान करो, तुम दुनिया-जहान करो…

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आखिर, आगे का समय हमारे बारे में क्या लिखेगा? सस्ती लोकप्रियता के लिए, दूसरों की अनभिज्ञता का फ़ायदा उठाने वाले, अपने आप को क्या जवाब देते होंगे? ये किस दौर में रह रहे हैं हम?

फिर तुम्हें पढ़ता हूँ, कई और लोगों को लिखते देखता हूँ बिना इस विचार के कि जो वो लिख रहे हैं उसमें वो नहीं हैं, उनके विचारों की प्राथमिकता है, तो लगता है कि मीडियोक्रिटी के समंदर में खोजने से मोती भी मिल ही जाते हैं।
बहुत कुछ सीखने को है, तुम लिखती रहो। लिखती हो तो लगता है कि समाज में बहुत कुछ ज़िंदा है।

तुम्हारा,
अजीत

  • अजीत भारती पत्रकार हैं। सोशल मीडिया पर अपनी बेबाक सामाजिक और राजनीतिक टिप्पणियों के कारण चर्चित हैं। यह पत्र उन्होंने अपनी मित्र, प्रखर रचनाकार और काउन्सलर भारती गौड़ को लिखा है। इसे हमने उनकी फेसबुक वॉल से लिया है। 
एक वैकल्पिक मीडिया जो महिलाओं से जुड़े मुद्दों और सोशल टैबू पर चल रही बहस में सक्रिय भागीदारी निभाता है। जो स्रियों के कार्यक्षेत्र, उपलब्धियों, उनके संघर्ष और उनकी अभिव्यक्ति को मंच देता है।

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