उस दिन मैं निर्वस्त्र उतर जाउंगी नदी में

Nude Women in River

मैं तुम्हारे सामने अपने पिंडलियाँ उघाड़ नदी में नहीं उतरूंगी
चाहे जितना भी शीतल हो पानी

मुझे मालूम है तुम उस वक़्त
काम की आसक्ति से देखोगे मेरी पिंडलियाँ
मेरी देह और मेरी पीठ पर छितरे मेरे बाल
मेरी गढ़न मेरे हर अंग के उतार चढ़ाव .
मेरी पीठ पर चुभती रहेंगी तुम्हारी आँखें जो मुझे बर्दाश्त नहीं होतीं कभी भी .

यह कोई बात लज्जा की नहीं
किसी परदे की भी नहीं
तुमसे मुझे कोई भय भी नहीं .
मुझे गवारा नहीं बस अपनी देह का सामान बन जाना
…और तुम जो लगते हो कायर कामी कुटिल वह भी सहन नहीं होता

मेरे सहयात्री …जिस दिन तुम मुझे मान लोगे स्त्री और जीवित मानवी
तुम मेरी अस्मिता को सराहना सीख जाओगे जिस दिन

उस दिन मैं निर्वस्त्र उतर जाउंगी नदी में तुम्हारे सामने

  • यह कविता है प्रज्ञा पांडेय की। प्रज्ञा हिन्दी कहानी पत्रिका निकट की कार्यकारी संपादक हैं, शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से। कविताएँ और सोशल मीडिया पर विभिन्न मुद्दों पर निरंतर लेखन। 
एक वैकल्पिक मीडिया जो महिलाओं से जुड़े मुद्दों और सोशल टैबू पर चल रही बहस में सक्रिय भागीदारी निभाता है। जो स्रियों के कार्यक्षेत्र, उपलब्धियों, उनके संघर्ष और उनकी अभिव्यक्ति को मंच देता है।
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