‘मेरा रंग’ के बारे में

 

Shalini Shrinet

नमस्कार, मेरा नाम शालिनी श्रीनेत है। मेरा रंग एक वैकल्पिक मीडिया है जो महिलाओं से जुड़े मुद्दों और सोशल टैबू पर चल रही बहस में सक्रिय भागीदारी निभाता है। यह स्रियों के कार्यक्षेत्र, उपलब्धियों, उनके संघर्ष और उनकी अभिव्यक्ति को मंच देता है। वेबसाइट के अलावा इसका एक फेसबुक पेज और यूट्यूब चैनल भी है।

हम किन विषयों पर चर्चा करते हैं?

मेरे इस कार्यक्रम में ऐसे मुद्दों पर बातें होती हैं जिससे आम आदमी अपने को जोड़ सकता है। मैं इस कार्यक्रम के जरिए महिलाओं से जुड़े तमाम मुद्दों को उठा रही हूं – जैसे वर्किंग गर्ल्स, छोड़े कपड़े, पीरियड्स, सांवलापन, लड़के-लड़कियों की परवरिश, एलजीबीटी, रेप, एसिड अटैक आदि। जाहिर सी बात जब इन मुद्दों पर विस्तार से चर्चा होती है तो लोग सोचने के लिए मजबूर होंगे। इसीलिए हमने सोशल मीडिया को चुना ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग इसे देख सकें और अपने साथियों को बता सकें, इस पर बातचीत कर सकें। वैसे मेरा रंग की चर्चा युवा पीढ़ी में अच्छी-खासी है, वे खुद भी हमसे संपर्क कर रहे हैं और जिन मुद्दों पर बातचीत हो चुकी है उसे सराह रहे हैं। तो इस कार्यक्रम के जरिए एक तरफ युवाओं को खुलकर अपनी बात रखने का मौका मिल रहा है, वहीं जो लोग इसे देखते हैं वे भी कहीं न कहीं उन मुद्दों के प्रति जागरुक होते हैं।

मेरा रंग के वीडियो

जो महिलाएं और लड़कियां समाज में किसी भी तरह का बदलाव लाने का प्रयास कर रही हैं, चाहे सोशल मीडिया के जरिए, चाहे लेखन के जरिए , चाहे सामाजिक कार्यों के जरिेए या फिर राजनीति के माध्यम से, उन्हें हम मेरा रंग के मंच पर आमंत्रित करते हैं और संबंधित मुद्दों पर विस्तार से बातचीत करते हैं। मेरा यह मानना है कि मीडिया स्त्रियों से जुड़े किसी भी मुद्दे पर गहराई से बातचीत नहीं करती, जबकि हम उन स्त्रियों (कभी-कभी पुरुषों को भी) को बुलाते हैं और उन मुद्दों को चिह्नित करते हैं – जिन पर वो लिखती हैं और कहीं न कहीं उससे प्रताड़ित और प्रभावित भी हैं। उन्हें अपनी बात कहने का मौका देते हैं। मेरा यह भी मानना है कि सिर्फ लिख देना और कहीं छप जाना आसान है क्योंकि उस पर कोई प्रति-प्रश्न नहीं होता, जबकि बातचीत या ऑनलाइन इंटरव्यू के दौरान उनके लिखे हुए पर तमाम सवाल किए जाते हैं जिसका वो जवाब देते हैं, जो कि मुश्किल है, आसान नहीं।

हमारा मकसद

मैं अपने प्रोग्राम के जरिए भारतीय संस्कृति की किसी तरह की अवहेलना नहीं करती पर भारतीय संस्कृति क्या है, लोगों से यह मेरा सवाल है। क्या पीरिड्स की बात करना, महिलाओं की आजादी की बात करना, एलजीबीटी पर चर्चा करना, बच्चों की परवरिश पर बात करना या रेप और एसिड अटैक के मुद्दे उठाना भारतीय संस्कृति के खिलाफ है? क्या संस्कृति का हवाला देकर इन संवेदनशील मुद्दों पर बातचीत करना बंद कर दें, तो हमारी संस्कृति को चोट नहीं पहुंचेगी? समाज में अलग-अलग लोग भारतीय संस्कृति की अलग-अलग परिभाषा बताते हैं, तो हमारी समझ में नहीं आता कि हम किस परिभाषा में फिट हों। वैसे इस प्रोग्राम के जरिए किसी भी संस्कृति का अपमान करना मेरा उद्देश्य नहीं है।

जाहिर सी बात है हमारी सोच बदलेगी, समाज बदलेगा। महिलाएं सुरक्षित रहेंगी तो निडर होकर आत्मविश्वास के साथ कहीं भी किसी भी क्षेत्र में कार्य करने के लिए सक्षम रहेंगी। आधी आबादी महिलाओं से ही है तो हमें समझना चाहिए कि उनकी तरक्की के साथ समाज और राष्ट्र दोनों का विकास होगा। आने वाले समय में हम तमाम और मुद्दे उठाएंगे और उन पर बातचीत करेंगे। हम इस कार्यक्रम के माध्यम से समाज और राष्ट्र को संदेश देना चाहेंगे कि अपनी सोच बदलिए, समाज बदलेगा। खुद को बदलिए, लोग अपने-आप बदलेंगे।

मेरे बारे में

मैं मिली-जुली सामाजिक पृष्ठभूमि से हूं। सफर देवरिया के एक गांव से शुरु हुआ और फिर अपने पत्रकार पति के साथ तमाम शहरों – जैसे गोरखपुर, इलाहाबाद, बरेली, लखनऊ, बैंगलौर, कानपुर से होते हुए अब दिल्ली में हूं। बचपन में अपने प्रधान पिता स्व. नारायण सिंह के साथ रहकर मैंने बहुत करीब से उनकी सामाजिक गतिविधियों को देखा और उससे प्रभावित भी हुई। वे किसी की मदद करने के लिए हर समय तत्पर रहते थे, चाहे दिन हो या रात, धूप हो या बारिश। दूसरी तरफ मैं अपने बड़े भाई स्व. एलएस सिंह से भी प्रभावित थी, जिन्होंने कड़ी मेहनत के बाद एयरफोर्स ज्वाइन किया। वे बेहद उदार व खुली सोच के थे। इंटर तक मैं गांव में पढ़ी। उसके बाद मेरी शादी हो गई। मेरी सास ने ही मुझे आगे पढ़ाया और मैंने गोरखपुर यूनीवर्सिटी से ग्रेजुएशन और रुहेलखंड विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र में पोस्ट ग्रेजुएशन किया।

इसके बाद लगातार दो स्वयंसेवी संगठनों से जुड़ी रही। इसके बाद कुछ समय तक अपना बिजनेस भी किया। तमाम शहरों में रहने के दौरान मैं वहां के स्थानीय लोगों के साथ घुलमिलकर वहां की भाषा और रीति-रिवाज को समझती थी और उनके रंग-ढंग में ढल जाती थी, जैसे बैंगलोर में घर के सामने रंगोली बनाना और बालों में गजरे लगाना। लगभग हर शहर में मेरे ऐसे बहुत सारे दोस्त हैं जिनसे आज भी हमारी बातचीत होती रहती है। होश संभालने से लेकर अभी तक जो भी मिला वह मेरे बारे में यह जरूर कहता था – बहुत मिलनसार है, सबकी मदद करती है। कहीं न कहीं ये बातें दिमाग में घर कर गई थीं। सो लगातार यह चलता रहा कि मैं कोई सोशल वर्क करूं, जहां पर किसी की किसी भी तरह से मदद कर सकूं। मेरी मां (सास) भी मुझे लगतार इसके लिए प्रोत्साहित करती रहती थीं। आज वो इस दुनिया में नहीं हैं मगर मैं जो भी हूं, उनके योगदान की वजह से ही हू्ं।

सहयोग

इस कार्यक्रम को हम अपने दम पर कर रहे हैं। इसके लिए मुझे कहीं से आर्थिक सहयोग नहीं मिलता और हमने अभी तक कोई प्रयास भी नहीं किया। कभी-कभी कैमरे की दिक्कत होती है, क्योंकि हमें कहीं और से कैमरे का इंतजाम करना पड़ता है, जिसके लिए हम फाइनल कट स्टूडियो के सचिन सिंह के आभारी हैं। हम यह चाह रहे हैं कि हमारा अपना कैमरा हो जाए। तब हम इस कार्यक्रम को और सुचारु रूप से कर सकेंगे।

फिलहाल इस काम में मेरा पूरा परिवार सहयोग कर रहा है, यहां तक कि बच्चे भी। मेरा बड़ा बेटा उद्भव – जो 12 साल का है – स्टूडियो तैयार करने में कभी-कभी मेरी मदद करता है। इसे शूट करने और एडिट करने का काम मेरे पति करते हैं। इस कार्य में मेरे घर वालों के साथ साथ मेरे मित्र भी सहयोग कर रहे हैं। वे न सिर्फ मेरा हर कार्यकम देख कर मेरी कमियां-खूबियां बताते हैं बल्कि समय-समय पर कई सुझाव भी देते हैं और लोगों को इस प्रोग्राम से जोड़ते भी हैं।

मेरा रंग को आपका सहयोग चाहिए। वह किसी भी रूप में हो सकता है। आप हमारे लिए लिखें, इसके बारे में लोगों को बताएं, औरों से लिखने के लिए कहें, हमें सुझाव दें या फिर किसी भी रूप में आर्थिक सहयोग करें। ताकि यह प्रयास जारी रहे।