आज फिर चार बजे बाहर गैलरी में बनी खिड़की के पास कुर्सी बिछाकर बैठ गई। यह क्रम पिछले दो साल से अनवरत चल रहा। करूँ भी तो क्या? सुबह के काम की भागदौड़ और...

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